दादा-दादी का जरूरत से ज्यादा प्यार बना सकता है बच्चे को जिद्दी! एक्सपर्ट्स ने दी अहम सलाह
बच्चों की परवरिश में दादा-दादी और नाना-नानी की भूमिका बेहद खास होती है। उनका प्यार, अनुभव और स्नेह बच्चों के भावनात्मक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है। लेकिन पेरेंटिंग एक्सपर्ट्स का कहना है कि जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार और नियमों में ढील कभी-कभी बच्चे के व्यवहार पर नकारात्मक असर भी डाल सकती है।
जब नियमों में होने लगे टकराव
हैप्पी माइंड्स की फाउंडर और पेरेंटिंग एक्सपर्ट श्वेता गांधी के अनुसार, कई परिवारों में ऐसा देखने को मिलता है कि माता-पिता बच्चों के लिए कुछ नियम तय करते हैं, लेकिन दादा-दादी अनजाने में उन नियमों को नजरअंदाज कर देते हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि मां बच्चे को स्क्रीन देखने से मना करती है और उसी समय दादी उसे मोबाइल दे देती हैं, या चॉकलेट खाने से रोकने पर उसे खाने की अनुमति मिल जाती है, तो बच्चे के मन में यह संदेश जाता है कि माता-पिता के नियम अंतिम नहीं हैं।
बच्चे के मन में कम हो सकती है नियमों की अहमियत
विशेषज्ञों का मानना है कि जब बच्चे बार-बार देखते हैं कि एक सदस्य के मना करने के बावजूद कोई दूसरा व्यक्ति अनुमति दे देता है, तो वे नियमों को गंभीरता से लेना बंद कर सकते हैं। धीरे-धीरे उनके मन में यह धारणा बन सकती है कि “ना” का मतलब हमेशा “ना” नहीं होता। इसका असर आगे चलकर बच्चे के अनुशासन, व्यवहार और निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ सकता है।
5 साल की उम्र के बाद दिखने लगते हैं असर
विशेषज्ञों के अनुसार, पांच साल की उम्र के बाद बच्चों की समझ और तर्क क्षमता तेजी से विकसित होती है। ऐसे में यदि उन्हें लगातार नियमों से बच निकलने का रास्ता मिलता रहा हो, तो वे जिद करने लगते हैं और सीमाओं को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करते हैं। नतीजतन, स्क्रीन टाइम, खाने-पीने की आदतों या दैनिक दिनचर्या को लेकर बच्चे अधिक जिद्दी और चिड़चिड़े हो सकते हैं।
परवरिश में जरूरी है एकजुटता
पेरेंटिंग एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चे को भविष्य में एक जिम्मेदार, संस्कारी और समझदार इंसान बनाना है तो पूरे परिवार को एक टीम की तरह काम करना होगा। यदि माता-पिता किसी बात के लिए मना करते हैं, तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी उस निर्णय का सम्मान करना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि दादा-दादी प्यार कम करें, बल्कि प्यार और अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखें।
रिसर्च भी करती है इस बात की पुष्टि
ऑस्ट्रेलिया की University of Queensland की एक रिसर्च में पाया गया कि जब माता-पिता और दादा-दादी बच्चों की परवरिश को लेकर एक जैसी सोच और नियमों के साथ काम करते हैं, तो बच्चों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं। रिसर्च के मुताबिक, ऐसी स्थिति में माता-पिता का आत्मविश्वास बढ़ता है, बच्चों का व्यवहार बेहतर होता है और परिवार के सदस्यों के बीच रिश्ते भी अधिक मजबूत बनते हैं।
क्या है सबसे जरूरी बात?
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को प्यार, सुरक्षा और स्वतंत्रता देना जरूरी है, लेकिन साथ ही स्पष्ट सीमाएं और नियम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। जब पूरा परिवार एक ही दिशा में काम करता है, तब बच्चे न केवल अनुशासित बनते हैं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी अधिक संतुलित और आत्मविश्वासी होते हैं।