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यूपी: रेशम से रौशन होगी किसानों की जिंदगी- सीएम योगी

-प्रदेश में करीब 30 गुना बढ़ेगा ककून धागाकरण
लखनऊ: चंद रोज पहले गोरखपुर में रेशम कृषि मेला आयोजित हुआ था। इसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रेशम से किसानों की जिंदगी रौशन करने के प्रति प्रतिबद्धता भी जताई। मालूम हो कि प्रदेश में 9 एग्रो क्लाइमेटिक जोन हैं। इनमें से  नेपाल की तराई का क्षेत्र रेशम की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। किसानों को रेशम की खेती पसंद भी आ रही है। 20 वर्षों में उत्पादन में 14 गुना वृद्धि इसका प्रमाण है। बेहतर प्रयास के जरिए अगले 5 वर्षों में इसमें 10 गुना वृद्धि संभव है।
प्रदेश सरकार की ओर से किये जा रहे प्रयास
उत्तर प्रदेश में रेशम की पैदावार व आपूर्ति बढ़ाने के लिए प्रदेश सरकार ने कर्नाटक सरकार के साथ एक करार किया है। कर्नाटक में सवा लाख टन कोया और 80 हजार टन को या वह रेशम का धागा बनता है। करार के मुताबिक यहां के बुनकरों को कर्नाटक से ओरिजिनल रेशम मिला है। रेशम की बेहतर उत्पादकता प्राप्त करने के लिए प्रदेश सरकार शीघ्र ही किसानों के एक बड़े दल को प्रशिक्षण के लिए कर्नाटक भेजेगी।
फिलहाल प्रदेश के 57 जिलों में रेशम उत्पादन का काम होता रहा है। वैज्ञानिक अध्ययन के बाद अब इसे रेशम उत्पादन जलवायु अनुकूल 31 जिलों में गहनता से बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक कृषि फार्मों पर ही रेशम उत्पादन अधिक होता रहा है, अब इसे आम किसानों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। किसान अपनी खेती के साथ रेशम कीटपालन भी कर सकते हैं। रेशम के कारोबार को बढ़ावा देने के लिए वाराणसी में सिल्क एक्सचेंज भी खोला गया है।
रेशम उत्पादन में यूपी
जब उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड अलग हुआ तो यूपी में मात्र 22 टन रेशम उत्पादन होता था। आज यह बढ़कर 350 टन हो गया है। हमारा लक्ष्य अगले तीन-चार साल में रेशम उत्पादन दोगुना करने का है।

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भविष्य की योजना
 योजनाबद्ध तरीके से योगी सरकार रेशम से 50 हजार किसान परिवारों की जिंदगी को रौशन करेगी। सरकार-2.0 ने बेहद चुनौतीपूर्ण लक्ष्य रखा है। इसके अनुसार ककून धागाकरण का लक्ष्य करीब 30 गुना बढ़ाया गया है। अभी 60 मीट्रिक टन ककून से धागा बन रहा है। अगले पांच साल में इसे बढ़ाकर 1750 मीट्रिक टन किया जाना है। इसके लिए रीलिंग मशीनों की संख्या 2 से बढ़ाकर 45 यानी 23 गुना किए जाने का लक्ष्य है। इस चुनौतीपूर्ण लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकार पूरी शिद्दत से लगी है। गोरखपुर में आयोजित कार्यक्रम उसी प्रयास की एक कड़ी थी।

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