October 6, 2026

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लखनऊ विश्वविद्यालय में UGC के नए नियमों पर संग्राम: छात्रों ने गेट नंबर 1 पर किया प्रदर्शन, बोले— ‘छात्रों को आपस में लड़ाने की साजिश’

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी स्थित प्रतिष्ठित लखनऊ विश्वविद्यालय मंगलवार को उस समय अखाड़े में तब्दील हो गया, जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए नियमों के विरोध में सैकड़ों छात्र सड़कों पर उतर आए। विश्वविद्यालय के गेट नंबर एक के पास हुए इस विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने केंद्र सरकार और यूजीसी के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारी छात्रों का आरोप है कि उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए लाए गए ये नए कानून न केवल अव्यावहारिक हैं, बल्कि ये परिसर के भीतर विद्यार्थियों को जातीय और सामाजिक आधार पर आपस में लड़ाने का काम करेंगे।

छात्रों का आक्रोश मुख्य रूप से यूजीसी के उन नए दिशा-निर्देशों को लेकर है, जिन्हें कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के नाम पर लागू किया गया है। इन नियमों के तहत यूजीसी ने देश भर के शिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों की शिकायतों के समाधान के लिए विशेष समितियों, समर्पित हेल्पलाइन और निगरानी दलों का गठन करें। हालांकि, लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों का एक बड़ा वर्ग इसे ‘विभाजनकारी नीति’ के रूप में देख रहा है।

विरोध का मुख्य कारण: भेदभाव मिटेगा या बढ़ेगा?

प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने तर्क दिया कि विश्वविद्यालय परिसर एक ऐसी जगह होती है जहाँ छात्र अपनी जाति, धर्म और क्षेत्रीय पहचान को पीछे छोड़कर केवल एक ‘विद्यार्थी’ के रूप में शिक्षा ग्रहण करते हैं। छात्रों का कहना है कि सरकार द्वारा विशेष श्रेणियों के लिए अलग से निगरानी दल और हेल्पलाइन बनाना यह संकेत देता है कि परिसर में सामान्य रूप से भेदभाव मौजूद है, जो कि सत्य नहीं है। छात्रों ने आशंका जताई कि इन विशेष समितियों के गठन से छात्रों के बीच एक मानसिक दीवार खड़ी हो जाएगी, जिससे सामाजिक विभाजन और अधिक गहरा होगा।

गेट नंबर एक पर प्रदर्शन कर रहे एक छात्र नेता ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “सरकार इन कानूनों के जरिए परिसरों में ऐसा माहौल बनाना चाहती है जहाँ छात्र एक-दूसरे को संशय की दृष्टि से देखें। हम यहाँ पढ़ने आते हैं, न कि यह गिनने कि कौन किस वर्ग से है। यदि किसी के साथ अन्याय होता है, तो उसके लिए पहले से ही प्रॉक्टर कार्यालय और छात्र कल्याण समितियां मौजूद हैं। नई समितियों का गठन केवल टकराव पैदा करने के लिए किया जा रहा है।”

सरकार का पक्ष: निष्पक्षता और जवाबदेही की दलील

दूसरी ओर, केंद्र सरकार और यूजीसी इन बदलावों को उच्च शिक्षा में क्रांतिकारी कदम बता रहे हैं। सरकार का तर्क है कि कई बार दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले आरक्षित वर्ग के मेधावी छात्र परिसरों में सूक्ष्म भेदभाव (Micro-aggression) का शिकार होते हैं, जिसकी वे कहीं रिपोर्ट नहीं कर पाते। नए नियमों का उद्देश्य संस्थानों के भीतर अधिक निष्पक्षता और जवाबदेही लाना है। यूजीसी का मानना है कि विशेष हेल्पलाइन और निगरानी दलों के होने से वंचित वर्गों के छात्रों में सुरक्षा की भावना बढ़ेगी और वे बिना किसी मानसिक दबाव के अपनी पढ़ाई पूरी कर सकेंगे।

यूजीसी के अधिकारियों के अनुसार, ये नियम किसी वर्ग के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि समावेशी शिक्षा सुनिश्चित करने का एक तंत्र हैं। इन समितियों को यह जिम्मेदारी सौंपी जाएगी कि वे समय-समय पर परिसरों में संवेदीकरण (Sensitization) कार्यक्रम आयोजित करें ताकि जातिगत पूर्वाग्रहों को समाप्त किया जा सके।

विशेषज्ञों और आलोचकों की चिंता

लखनऊ विश्वविद्यालय में हुए इस हंगामे ने देश भर के शिक्षाविदों के बीच भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है। कई आलोचकों का मानना है कि विश्वविद्यालय परिसरों में नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। आशंका व्यक्त की जा रही है कि इन समितियों का उपयोग राजनीतिक हितों के लिए किया जा सकता है, जिससे शैक्षणिक वातावरण प्रभावित होगा। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन नियमों को सही ढंग से लागू नहीं किया गया, तो यह ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ की स्थिति पैदा कर सकता है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों के भीतर कुंठा पैदा होने का खतरा है।

मंगलवार को हुए इस प्रदर्शन के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। छात्रों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए परिसर के आसपास भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। प्रदर्शनकारी छात्रों ने चेतावनी दी है कि यदि यूजीसी इन ‘काले कानूनों’ को वापस नहीं लेती है, तो वे आने वाले दिनों में आंदोलन को और तेज करेंगे और राजभवन का घेराव करेंगे।

फिलहाल, लखनऊ विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों से शांति बनाए रखने की अपील की है और कहा है कि वे छात्रों की चिंताओं को उच्च अधिकारियों तक पहुँचाएंगे। हालांकि, इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा नीति में किए जाने वाले सामाजिक बदलावों को लेकर कैंपस की जमीन पर अभी भी आम सहमति का अभाव है।

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