राजस्थान के सरकारी खजाने में वर्षों से पड़ा है 64.44 करोड़ का सोना-चांदी, CAG रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
जयपुर: राजस्थान के सरकारी खजाने में 64.44 करोड़ रुपये मूल्य का सोना और चांदी वर्षों से जमा है, लेकिन उसका नियमानुसार निस्तारण अब तक नहीं किया गया है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा समीक्षा रिपोर्ट में इस संबंध में बड़ा खुलासा हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अपराधियों से जब्त की गई और बाद में अदालतों द्वारा राजकीय संपत्ति घोषित की गई बहुमूल्य सामग्री लंबे समय से सरकारी कोषागार में रखी हुई है। हालांकि, सरकार ने निर्धारित नियमों के अनुसार न तो इनकी बिक्री की और न ही किसी अन्य उद्देश्य के लिए इनका उपयोग किया।
सरकारी खजाने में कितना सोना-चांदी?
CAG की रिपोर्ट के अनुसार, जयपुर स्थित राज्य के रिजर्व कोषागार में—
- 29.011 किलोग्राम सोना, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 42.36 करोड़ रुपये है।
- 972.747 किलोग्राम चांदी, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 22.08 करोड़ रुपये आंकी गई है।
इस प्रकार, दोनों की कुल अनुमानित कीमत 64.44 करोड़ रुपये है।
कैसे पहुंचा सरकारी तिजोरी तक यह खजाना?
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह सोना-चांदी पुलिस और विभिन्न प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा अलग-अलग मामलों में जब्त किया गया था। बाद में संबंधित अदालतों ने इन्हें राजकीय संपत्ति घोषित कर दिया, जिसके बाद इन्हें राज्य के रिजर्व कोषागार में जमा करा दिया गया।
वित्त विभाग ने इनकी वैल्यूएशन भी करवा ली थी, लेकिन मई 2025 तक भी इनके निस्तारण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।
क्या कहते हैं नियम?
राजस्थान कोषागार नियमावली-2012 के नियम 122 के तहत जयपुर (शहर) को राज्य का रिजर्व कोषागार घोषित किया गया है। सामान्य और आपराधिक मामलों में न्यायालयों द्वारा राजकीय संपत्ति घोषित किए गए सोना, चांदी, हीरे और अन्य बहुमूल्य सामान यहीं सुरक्षित रखे जाते हैं।
नियमों के अनुसार—
- पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं को पुरातत्व विभाग को सौंपा जाना चाहिए।
- सोना और चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं को मुंबई स्थित सरकारी टकसाल भेजकर शुद्ध धातु में परिवर्तित किया जाना चाहिए।
- इसके बाद उनकी बिक्री कर राजस्व प्राप्त किया जाना चाहिए।
CAG ने जताई गंभीर चिंता
CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वैल्यूएशन होने के बावजूद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी और करोड़ों रुपये की संपत्ति वर्षों से सरकारी तिजोरी में बंद पड़ी है।
रिपोर्ट में इसे गंभीर वित्तीय लापरवाही बताते हुए राज्य सरकार को आवश्यक कदम उठाने और नियमों के अनुरूप जल्द से जल्द इस संपत्ति का निस्तारण सुनिश्चित करने की सिफारिश की गई है।
CAG की इस टिप्पणी के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इतने बड़े मूल्य की संपत्ति वर्षों से सरकारी खजाने में निष्क्रिय क्यों पड़ी रही और इसके निस्तारण में देरी की जिम्मेदारी किसकी है।