दिल्ली में 30 साल बाद भी नहीं हुआ ट्री सेंसस, मानसून से पहले बढ़ी चिंता; सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अटका काम
नई दिल्ली: मुंबई में हाल ही में बारिश के दौरान पेड़ गिरने से 11 वर्षीय छात्र की मौत के बाद शहरी क्षेत्रों में पेड़ों की सुरक्षा और उनकी निगरानी को लेकर बहस तेज हो गई है। इसी बीच दिल्ली में भी ट्री सेंसस (Tree Census) का काम अब तक शुरू नहीं होने पर सवाल उठ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि दिल्ली प्रिजर्वेशन ऑफ ट्री एक्ट, 1994 के तहत यह कार्य करीब तीन दशक पहले ही पूरा हो जाना चाहिए था।
दिल्ली में भी हो चुके हैं ऐसे हादसे
पेड़ गिरने की घटनाएं केवल मुंबई तक सीमित नहीं हैं। अगस्त 2025 में दक्षिण दिल्ली के कालकाजी इलाके में भारी बारिश के दौरान पेड़ गिरने से एक बाइक सवार की मौत हो गई थी। वहीं, इसी वर्ष मार्च में आए तेज आंधी-तूफान के दौरान राजधानी में एक ही दिन में 100 से अधिक पेड़ गिर गए थे, जिससे यातायात, बिजली व्यवस्था और वाहनों को भारी नुकसान पहुंचा था। अब जबकि दिल्ली में मानसून सक्रिय हो चुका है और तेज बारिश व आंधी की चेतावनी जारी है, ऐसे में कमजोर और असुरक्षित पेड़ों को लेकर लोगों की चिंता बढ़ गई है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद नहीं शुरू हुआ सर्वे
सूत्रों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद दिल्ली में ट्री सेंसस की प्रक्रिया अभी तक शुरू नहीं हो सकी है। दिल्ली वन विभाग और देहरादून स्थित फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI) के बीच स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) को अंतिम रूप देने पर अभी भी विचार-विमर्श चल रहा है। अधिकारियों के सामने यह तय करना बाकी है कि पेड़ों के स्वास्थ्य का आकलन किस तरीके से होगा, जोखिम वाले पेड़ों की पहचान कैसे की जाएगी और सर्वेक्षण की प्रक्रिया क्या होगी।
पहले चरण के लिए 2.9 करोड़ रुपये मंजूर
केंद्र सरकार ने इस चार वर्षीय परियोजना के पहले चरण के लिए 2.9 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। परियोजना तीन चरणों में पूरी की जाएगी और इसका उद्देश्य दिल्ली के गैर-वन शहरी क्षेत्रों में मौजूद पेड़ों का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार करना है। इस डेटाबेस में प्रत्येक पेड़ की प्रजाति, आयु, ऊंचाई, तने का व्यास, जियो-लोकेशन और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दर्ज की जाएगी। इससे भविष्य में पेड़ों की निगरानी और संरक्षण में मदद मिलने की उम्मीद है।
1994 के कानून में है ट्री सेंसस का प्रावधान
दिल्ली प्रिजर्वेशन ऑफ ट्री एक्ट, 1994 के तहत ट्री अथॉरिटी को राजधानी में मौजूद सभी पेड़ों की गणना और उनका अद्यतन रिकॉर्ड बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि, कानून लागू होने के तीन दशक बाद भी राजधानी में कभी वैज्ञानिक स्तर पर व्यापक ट्री सेंसस नहीं कराया गया। बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और दिसंबर 2024 में अदालत ने ट्री अथॉरिटी को अधिनियम की धारा 7 के तहत लंबित ट्री सेंसस तत्काल शुरू करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद प्रक्रिया अब तक शुरू नहीं हो सकी है।
ट्री सेंसस क्यों है जरूरी?
विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल दिल्ली के पास ऐसा कोई व्यापक डेटाबेस नहीं है, जिससे यह पता चल सके कि शहर में कुल कितने पेड़ हैं, वे किन स्थानों पर हैं और उनमें से कितने बीमार, कमजोर या गिरने के खतरे में हैं। ट्री सेंसस के जरिए न केवल पेड़ों की संख्या बल्कि उनकी स्थिति और स्वास्थ्य का भी वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार होगा। इससे खतरनाक पेड़ों की समय रहते पहचान, अवैध कटाई पर निगरानी और वृक्षारोपण योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू करने में मदद मिलेगी।
सिर्फ गिनती नहीं, सुरक्षा पर भी हो फोकस
पर्यावरणविद् पद्मावती द्विवेदी का कहना है कि ट्री सेंसस का उद्देश्य केवल पेड़ों की संख्या गिनना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे संभावित हादसों को रोकने का प्रभावी माध्यम बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार, प्रत्येक पेड़ की प्रजाति, आयु, जड़ों की स्थिति, आसपास मौजूद कंक्रीट, उपलब्ध मिट्टी और स्वास्थ्य का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करना आवश्यक है। उनका मानना है कि स्थानीय समुदाय, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA), स्कूल और विशेषज्ञ इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं, तभी इसका वास्तविक लाभ मिलेगा।
बजट और कार्यप्रणाली भी चुनौती
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर ट्री सेंसस के लिए आवंटित 2.9 करोड़ रुपये पर्याप्त नहीं हो सकते। उनका मानना है कि यह एक बार होने वाली कवायद नहीं बल्कि लगातार निगरानी और नियमित अपडेट की प्रक्रिया होनी चाहिए। वहीं, दिल्ली ट्री सेंसस विशेषज्ञ समिति के सदस्य प्रदीप कृष्णन के अनुसार, सर्वेक्षण की कार्यप्रणाली, इस्तेमाल होने वाली तकनीक और जोखिम वाले पेड़ों की पहचान जैसे कई तकनीकी मुद्दों पर अभी अंतिम निर्णय लिया जाना बाकी है। ऐसे में राजधानी में ट्री सेंसस शुरू होने में अभी और समय लग सकता है।