16 जुलाई से शुरू होगी जगन्नाथ रथ यात्रा: जानिए 100 यज्ञ के बराबर पुण्य, रथों की खासियत और धार्मिक महत्व
पुरी: इस वर्ष भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होने जा रही है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र यात्रा में भाग लेने और रथ खींचने वाले भक्तों को 100 यज्ञ करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के तीन अलग-अलग रथ शामिल होते हैं। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन सुभद्रा की इच्छा पर उन्हें रथ में बैठाकर नगर भ्रमण कराया था, जिसके बाद इस परंपरा की शुरुआत हुई। इसका उल्लेख स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी मिलता है।
रथ यात्रा में तीन अलग-अलग रथ होते हैं:
तीनों रथ नीम की लकड़ी से बनाए जाते हैं, जिसे औषधीय और पवित्र माना जाता है। इन रथों में किसी भी प्रकार की कील या धातु का उपयोग नहीं किया जाता।
रथ निर्माण की शुरुआत अक्षय तृतीया से होती है, जबकि लकड़ी का चयन बसंत पंचमी को किया जाता है।
रथ यात्रा से पहले पुरी के गजपति राजा द्वारा ‘छर पहनरा’ नामक अनुष्ठान किया जाता है, जिसमें वे रथों की पूजा करते हैं और सोने की झाड़ू से मार्ग की सफाई करते हैं। इसे अत्यंत पवित्र परंपरा माना जाता है।
रथ यात्रा लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित गुंडीचा मंदिर तक जाती है, जिसे भगवान का मौसी का घर माना जाता है। मान्यता है कि यहीं पर तीनों विग्रहों का निर्माण हुआ था। यहां भगवान सात दिनों तक विश्राम करते हैं, जिसके बाद ‘बहुड़ा यात्रा’ के जरिए वापस मुख्य मंदिर लौटते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त रथ यात्रा में शामिल होकर रथ खींचते हैं, उन्हें अत्यंत पुण्य की प्राप्ति होती है। वहीं, स्कंद पुराण के अनुसार, रथ यात्रा में भगवान के दर्शन और भजन-कीर्तन करने से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।