October 4, 2026

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यूपी चुनाव 2027 से पहले सपा-कांग्रेस में सीटों को लेकर खींचतान तेज, 2017 का अनुभव फिर बना चर्चा का विषय

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है, और संभावना जताई जा रही है कि चुनाव समय से पहले भी कराए जा सकते हैं। ऐसे में सभी राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं, जबकि विपक्षी गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर खींचतान भी बढ़ गई है।

सपा-कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे पर मतभेद

गठबंधन में कांग्रेस की मजबूत दावेदारी ने समाजवादी पार्टी (सपा) की चिंता बढ़ा दी है। यूपी में कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सीट बंटवारे में “बराबरी” की बात कहकर राजनीतिक संकेत दिए हैं, जिससे सपा पर दबाव बढ़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कांग्रेस राज्य में करीब 150 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा जता सकती है, जबकि सपा का रुख अब तक यही है कि वह कांग्रेस को 70–80 सीटों से ज्यादा देने के पक्ष में नहीं है।

2017 का अनुभव बना अहम संदर्भ

2017 के विधानसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस को 100 सीटें दी थीं, लेकिन कांग्रेस केवल 7 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई थी। यही अनुभव अब सपा के रुख को प्रभावित कर रहा है, और पार्टी इतनी बड़ी हिस्सेदारी देने से हिचक रही है।

दोनों दलों की अपनी-अपनी मजबूरी

कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में 6 सीटें जीतकर अपना मनोबल बढ़ाया है और वह बेहतर स्ट्राइक रेट के आधार पर ज्यादा सीटों की मांग कर रही है। वहीं, सपा भी चाहती है कि वह ज्यादा सीटों पर खुद चुनाव लड़े ताकि उसका संगठनात्मक आधार मजबूत बना रहे। हालांकि, दोनों दलों के लिए यह भी साफ है कि अकेले चुनाव लड़ने पर नुकसान उठाना पड़ सकता है।

2022 और 2024 के नतीजों से सीख

2022 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस केवल 2 सीटें जीत पाई थी, जबकि 2024 लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को अपेक्षाकृत बेहतर सफलता मिली। इससे दोनों दलों को यह एहसास हुआ है कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन उनके लिए राजनीतिक रूप से जरूरी है।

गठबंधन की मजबूरी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा और कांग्रेस दोनों ही एक-दूसरे के लिए जरूरी हैं। जहां कांग्रेस को सपा के बड़े जनाधार की जरूरत है, वहीं सपा को भी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के समर्थन से राजनीतिक लाभ मिलता है। ऐसे में सीट बंटवारे को लेकर अंतिम समझौता दोनों दलों के लिए चुनौती बना हुआ है।

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