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दल-बदल कानून पर बहस तेज: प्रकाश आंबेडकर ने मौजूदा व्यवस्था पर उठाए सवाल

आम आदमी पार्टी (AAP) से राघव चड्ढा के बाहर जाने और बीजेपी में शामिल होने के बाद दल-बदल कानून को लेकर नई बहस छिड़ गई है। वंचित बहुजन आघाड़ी के प्रमुख प्रकाश आंबेडकर ने मौजूदा एंटी-डिफेक्शन फ्रेमवर्क में बदलाव की मांग की है।

प्रकाश आंबेडकर का कहना है कि वर्तमान कानून में कई तरह की व्याख्याएं संभव हैं, जिससे इसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि राघव चड्ढा जिस “लीगल फिक्शन” का सहारा ले रहे हैं—यानी दो-तिहाई विधायकों/सांसदों के समर्थन से मर्जर—वह संवैधानिक दृष्टि से दो राजनीतिक दलों के वास्तविक विलय को साबित नहीं करता।

दसवीं अनुसूची पर सवाल

आंबेडकर ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत एंटी-डिफेक्शन प्रावधान केवल विधायकों को एक निश्चित संख्या (दो-तिहाई) के आधार पर दल-बदल के बाद अयोग्यता से बचाते हैं। उनके अनुसार, यह प्रावधान केवल विधायी दल (लेजिस्लेटिव ग्रुप) के स्तर पर लागू होता है और इससे राजनीतिक दलों का वास्तविक संगठनात्मक विलय नहीं माना जा सकता।

“वास्तविक मर्जर” कैसे होना चाहिए?

प्रकाश आंबेडकर ने कहा कि किसी भी दो राजनीतिक दलों के बीच वास्तविक विलय पूरी पार्टी के स्तर पर होना चाहिए, न कि सिर्फ उसके विधायी समूह तक सीमित।

उन्होंने लिखा कि राजनीतिक दल एक संरचित संगठन होते हैं, जिनकी इकाइयां राष्ट्रीय, राज्य, जिला और स्थानीय स्तर तक फैली होती हैं। ऐसे में किसी वैध मर्जर के लिए जरूरी है कि पार्टी के संविधान के अनुसार निर्णय लिया जाए और सभी स्तरों की अधिकृत इकाइयों से मंजूरी प्राप्त हो।

उन्होंने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि एंटी-डिफेक्शन कानून की समीक्षा की जाए, क्योंकि इसकी अस्पष्टता रणनीतिक या गलत इस्तेमाल की गुंजाइश पैदा करती है।

राघव चड्ढा का कदम और कानूनी पहलू

गौरतलब है कि राघव चड्ढा ने शुक्रवार को AAP छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने की घोषणा की। वे अपने साथ छह अन्य राज्यसभा सांसदों को भी लेकर गए। नियमों के अनुसार, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद या विधायक एक साथ दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो दल-बदल कानून उनके खिलाफ लागू नहीं होता और उनकी सदस्यता बरकरार रहती है।

AAP के राज्यसभा में कुल 10 सांसद थे, ऐसे में सात सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना इस कानूनी प्रावधान के दायरे में आता है। यही कारण है कि इन सांसदों की सदस्यता पर कोई खतरा नहीं है।

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