• March 28, 2026

सूर्य का रौद्र रूप: फरवरी 2026 की शुरुआत में एक के बाद एक कई शक्तिशाली सौर विस्फोट, ‘सोलर मैक्सिमम’ की आहट से वैज्ञानिक चिंतित

नई दिल्ली। ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित हमारा सूर्य इस समय अपनी प्रचंड अवस्था में है। फरवरी 2026 की शुरुआत के साथ ही सूर्य की सतह पर हलचल असामान्य रूप से बढ़ गई है। पिछले कुछ दिनों के भीतर खगोलविदों ने सूर्य पर रिकॉर्ड तोड़ तीव्रता की कई सौर ज्वालाएं (Solar Flares) दर्ज की हैं, जिन्होंने वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय को सतर्क कर दिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये गतिविधियां इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि वर्तमान सौर चक्र (Solar Cycle 25) अपने चरम चरण यानी ‘सोलर मैक्सिमम’ की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इन शक्तिशाली ज्वालाओं के कारण पृथ्वी पर रेडियो संचार, जीपीएस नेविगेशन और उपग्रह आधारित सेवाओं के बाधित होने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

अंतरिक्ष मौसम की निगरानी करने वाली संस्थाओं के अनुसार, 1 फरवरी 2026 से ही सूर्य पर विस्फोटों का एक सिलसिला शुरू हो गया था। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि इस संक्षिप्त अवधि में एक्स8.3, एक्स8.1, एक्स4.2 और एक्स1.5 श्रेणी की अत्यंत शक्तिशाली ज्वालाएं उत्पन्न हुई हैं। विशेष रूप से ‘एक्स-क्लास’ की सौर ज्वालाओं को सौर विस्फोटों की श्रेणी में सबसे विनाशकारी माना जाता है। इनमें से 1 और 2 फरवरी को दर्ज की गई एक्स8.3 और एक्स8.1 श्रेणी की ज्वालाएं अक्टूबर 2024 के बाद की सबसे बड़ी सौर घटनाएं मानी जा रही हैं। इन विस्फोटों से निकलने वाली ऊर्जा अरबों परमाणु बमों के बराबर होती है, जो अंतरिक्ष में तीव्र विकिरण और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लहरें भेजती हैं।

इस पूरी खगोलीय उथल-पुथल का मुख्य केंद्र सूर्य पर स्थित ‘एआर4366’ (AR4366) नामक सनस्पॉट समूह बना हुआ है। सनस्पॉट सूर्य की सतह पर वे क्षेत्र होते हैं जहां चुंबकीय क्षेत्र अत्यंत जटिल और शक्तिशाली होता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, एआर4366 क्षेत्र में ऊर्जा का संचय इतनी अधिक मात्रा में हो चुका है कि वहां से लगातार विस्फोट हो रहे हैं। 3 फरवरी को अमेरिकी समयानुसार सुबह 9 बजकर 8 मिनट पर एक्स1.5 श्रेणी की ज्वाला दर्ज की गई, जिसके तुरंत बाद 4 फरवरी को सुबह 7 बजकर 13 मिनट पर फिर से इसी तीव्रता का फ्लेयर देखा गया। इसी दिन दोपहर तक एक और विशाल एक्स4.2 श्रेणी की ज्वाला ने सूर्य की सतह को दहला दिया। लगातार चार दिनों तक इतनी उच्च तीव्रता वाले फ्लेयर्स का निकलना अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण घटना मानी जा रही है।

इस सौर अस्थिरता का सीधा प्रभाव हमारी आधुनिक तकनीक पर पड़ सकता है। जब ये सौर ज्वालाएं पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल (आयनोस्फीयर) से टकराती हैं, तो वे वहां के विद्युत आवेश को प्रभावित करती हैं। इससे शॉर्टवेव रेडियो संचार पूरी तरह ठप हो सकता है, जिसे ‘रेडियो ब्लैकआउट’ कहा जाता है। इसके अलावा, विमानों के नेविगेशन सिस्टम और समुद्री जहाजों द्वारा उपयोग किए जाने वाले जीपीएस संकेतों में भी त्रुटि आने की संभावना बढ़ जाती है। सबसे बड़ा खतरा पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे हजारों उपग्रहों को है। सौर विकिरण उपग्रहों के संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जला सकता है या उनकी कक्षा में बदलाव ला सकता है, जिससे इंटरनेट और वैश्विक संचार सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

इन खतरों को भांपते हुए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (NASA) हाई अलर्ट पर हैं। इसरो का आदित्य-एल1 मिशन और नासा की सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेटरी (SDO) चौबीसों घंटे सूर्य की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेटरी ने इन घटनाओं की अद्भुत तस्वीरें भी कैद की हैं। 131 और 193 एंगस्ट्रॉम तरंगदैर्घ्य के विशेष कैमरों से ली गई तस्वीरों में सूर्य की सतह पर गहरे नीले और चटक लाल रंग की चमक देखी गई है, जो वहां रिलीज हो रही भारी ऊर्जा को दर्शाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दिनों में यह सनस्पॉट और अधिक अस्थिर हो सकता है, जिससे और भी बड़े कोरोनल मास इजेक्शन (CME) की संभावना बनी हुई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, सोलर साइकिल 25 उम्मीद से कहीं अधिक सक्रिय साबित हो रहा है। आमतौर पर 11 साल के इस चक्र में एक समय ऐसा आता है जब सूर्य की गतिविधियां अपने उच्चतम स्तर पर होती हैं। वर्तमान संकेत बताते हैं कि हम उस शिखर के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। अंतरिक्ष एजेंसियों ने उपग्रह संचालकों को एहतियाती कदम उठाने और जरूरत पड़ने पर संवेदनशील प्रणालियों को ‘सेफ मोड’ में रखने की सलाह दी है। इसके अतिरिक्त, पावर ग्रिड संचालकों को भी सतर्क किया गया है, क्योंकि तीव्र सौर तूफान पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में हलचल पैदा कर बिजली के ट्रांसफार्मरों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।

वैश्विक वैज्ञानिक इस समय केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं कि क्या एआर4366 से निकलने वाला अगला विस्फोट सीधे पृथ्वी की दिशा में होगा। यदि ऐसा होता है, तो यह आने वाले हफ्तों में पृथ्वी पर ‘जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म’ यानी भू-चुंबकीय तूफान ला सकता है, जिसके परिणामस्वरूप ध्रुवीय क्षेत्रों में शानदार औरोरा (ध्रुवीय ज्योति) तो दिखेंगे, लेकिन तकनीक-निर्भर दुनिया के लिए चुनौतियां भी बढ़ जाएंगी।

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