• March 25, 2026

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान भारी हंगामा: राहुल गांधी के ‘अप्रकाशित संस्मरण’ के दावों पर सत्तापक्ष का तीखा प्रहार

नई दिल्ली: संसद के निचले सदन लोकसभा में आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अभूतपूर्व हंगामा देखने को मिला। सदन की कार्यवाही जैसे ही शुरू हुई और विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपना वक्तव्य देना प्रारंभ किया, वैसे ही सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई। विवाद की जड़ पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे की एक कथित किताब और उसके अंश रहे, जिसे राहुल गांधी ने सदन के पटल पर उद्धृत करने का प्रयास किया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह सहित सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे संसदीय नियमों का उल्लंघन और सदन को गुमराह करने वाला कृत्य करार दिया।

राहुल गांधी ने अपने संबोधन की शुरुआत में ही आक्रामक तेवर अपनाते हुए पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के संस्मरणों का उल्लेख किया। उन्होंने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि उनके पास एक ऐसी किताब के अंश हैं, जो देश की सुरक्षा और सीमाओं की स्थिति की वास्तविकता बयां करते हैं। राहुल गांधी ने सत्तापक्ष की ओर इशारा करते हुए कहा कि वे जो पढ़ने जा रहे हैं, उसे सभी को ध्यान से सुनना चाहिए, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि वास्तविक देशभक्त कौन है और कौन नहीं। इस टिप्पणी ने सदन के भीतर तत्काल तनाव पैदा कर दिया और सत्तापक्ष के सांसदों ने शोर-शराबा शुरू कर दिया।

विवाद तब और गहरा गया जब राहुल गांधी ने डोकलाम विवाद और चीन की घुसपैठ का जिक्र करते हुए कथित किताब से कुछ अंश पढ़ने शुरू किए। उन्होंने दावा किया कि उस समय चार चीनी टैंक भारत की सीमा के भीतर घुस रहे थे और वे भारतीय सेना के मोर्चों से मात्र 100 मीटर की दूरी पर थे। राहुल गांधी के इस बयान पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपनी सीट से उठकर तुरंत हस्तक्षेप किया। राजनाथ सिंह ने बेहद कड़े लहजे में कहा कि राहुल गांधी जिस सामग्री का हवाला दे रहे हैं, वह एक ऐसी किताब का हिस्सा है जो अभी तक प्रकाशित ही नहीं हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संसदीय परंपराओं और नियमों के अनुसार, सदन में किसी भी ऐसी अप्रकाशित सामग्री या पुस्तक का उल्लेख नहीं किया जा सकता, जिसकी प्रामाणिकता सिद्ध न हो। रक्षा मंत्री ने आरोप लगाया कि विपक्ष के नेता तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं और सदन को जानबूझकर गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।

सदन में बढ़ते हंगामे के बीच गृह मंत्री अमित शाह ने भी राहुल गांधी के दावों पर आपत्ति दर्ज कराई। वहीं, स्पीकर ओम बिरला ने स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए राहुल गांधी को नियमों का हवाला दिया। स्पीकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि लोकसभा की यह परंपरा रही है कि यहाँ केवल उन्हीं तथ्यों और दस्तावेजों का उल्लेख किया जा सकता है जो सार्वजनिक डोमेन में हों या जिनके प्रकाशन की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी हो। उन्होंने राहुल गांधी को आगाह किया कि वे नियमों के दायरे में रहकर अपनी बात रखें। स्पीकर ने इस बात पर जोर दिया कि संसद नियमों और स्थापित परंपराओं से चलती है, न कि व्यक्तिगत सूचनाओं या अप्रकाशित लेखों के आधार पर।

सत्तापक्ष के कड़े विरोध के बावजूद राहुल गांधी अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि उनका स्रोत पूरी तरह भरोसेमंद है और इसमें एक पूर्व आर्मी जनरल के संस्मरण शामिल हैं। राहुल गांधी ने सरकार पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर वे एक उद्धरण (कोट) से इतना क्यों डर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग आतंकवाद से लड़ने का दावा करते हैं, वे एक किताब के पन्नों से घबरा रहे हैं। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार उन्हें सच बोलने से रोक रही है और उनके भाषण में बार-बार बाधा डालकर उनकी आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान समाजवादी पार्टी के प्रमुख और सांसद अखिलेश यादव विपक्ष के नेता राहुल गांधी के समर्थन में खड़े नजर आए। अखिलेश यादव ने कहा कि चीन के साथ सीमा विवाद का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है और इसे केवल तकनीकी आधार पर नहीं दबाया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि यदि विपक्ष के नेता के पास कोई महत्वपूर्ण जानकारी है जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी है, तो उन्हें उसे सदन के सामने रखने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की सीमाओं की सुरक्षा पर चर्चा होना लोकतंत्र के हित में है।

विवाद में संसदीय कार्य मंत्री ने भी हस्तक्षेप किया और स्पीकर के पूर्व के फैसलों की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि सदन में किसी पत्रिका या समाचार पत्र के लेखों को तब तक कोट नहीं किया जा सकता जब तक कि उनकी सत्यता की जिम्मेदारी सदस्य स्वयं न ले। उन्होंने कहा कि बिना प्रकाशित हुई किताब का हवाला देना न केवल नियमों के खिलाफ है बल्कि यह संसदीय गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है। सरकार का तर्क था कि राहुल गांधी जिस किताब की बात कर रहे हैं, वह अभी तक बाजार में नहीं आई है, इसलिए उसके दावों की पुष्टि करना असंभव है।

राहुल गांधी ने सदन में अपने भाषण के दौरान बार-बार यह दोहराया कि सरकार डरी हुई है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो उन्हें बोलने दिया जाना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि आखिर “सच्चाई” सामने आने से सत्तापक्ष को क्या परेशानी है। इस दौरान सदन में नारों और शोर-शराबे का दौर चलता रहा, जिससे कार्यवाही में कई बार व्यवधान आया। सत्तापक्ष के सदस्यों का कहना था कि रक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बिना किसी ठोस आधार के बयानबाजी करना सेना के मनोबल को प्रभावित कर सकता है।

अंततः, स्पीकर ओम बिरला ने सदन को शांत कराते हुए यह व्यवस्था दी कि किसी भी अप्रकाशित दस्तावेज को रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि सदस्यों को केवल उन तथ्यों पर बात करनी चाहिए जिनके प्रमाण उपलब्ध हों। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चुनौती देते हुए कहा कि यदि राहुल गांधी के पास वह किताब है, तो वे उसे सदन की मेज पर रखें ताकि उसकी जांच की जा सके। यह पूरा सत्र भारत-चीन संबंधों और सैन्य इतिहास के राजनीतिकरण के इर्द-गिर्द सिमट गया, जिसने एक बार फिर संसद में तीखी वैचारिक और रणनीतिक भिड़ंत को उजागर किया।

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