October 7, 2026

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महाराजगंज की जनता किसका करेगी राजतिलक!

नेपाल की सीमा से लगे पूर्वी उत्तर प्रदेश के जनपद महाराजगंज का इतिहास बेहद समृद्ध रहा है। महाकाव्य काल में यह क्षेत्र करपथ के नाम से जाना जाता था, जो कोशल राज्य का एक अंग हुआ करता था। मान्यता है कि इस क्षेत्र पर राज करने वाले प्राचीनतम सम्राट इक्ष्वांकु थे, जिनकी राजधानी अयोध्या थी। गोरखपुर के नजदीक और नेपाल बाॅर्डर तक फैला महाराजगंज कभी चीनी का कटोरा कहा जाता था। उप्र की संसदीय सीट संख्या 63 महाराजगंज में सातवें चरण के तहत 1 जून को मतदान होगा।

महाराजगंज संसदीय सीट का इतिहास

आजादी के बाद लोकसभा में यहां का पहला प्रतिनिधित्व शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता शिब्बन लाल सक्सेना ने किया। वह संविधान सभा के सदस्य भी रहे। पंकज चौधरी भाजपा के टिकट से छह बार सांसद रहे। हाई प्रोफाइल सीटों में शुमार की जाने वाली महराजगंज संसदीय सीट पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पंकज चौधरी सांसद हैं और वह केंद्र की मोदी सरकार में वित्त राज्य मंत्री भी हैं।

आजादी के बाद दूसरे आम चुनाव 1957 में परिसीमन के बाद गोरखपुर जिले का महराजगंज तहसील नए संसदीय क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में आया। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने महातम को चुनाव मैदन में उतारा। कांग्रेस ने गोरखपुर उत्तरी लोकसभा सीट के तत्कालीन वर्तमान सांसद हरिशंकर को फिर से टिकट दिया। पहले चुनाव में किसान मजदूर प्रजा पार्टी से चुनाव मैदान में उतरे प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना दूसरे आम चुनाव 1957 में निर्दल प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल किए। कांग्रेस की लहर के बाद भी हरिशंकर प्रसाद को हार का सामना करना पड़ा। पहली बार प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना सांसद निर्वाचित हुए।

वहीं दलों के हिसाब से बात करें तो महराजगंज में अभी तक हुए कुल 16 बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा छह बार, पांच बार कांग्रेस, एक बार समाजवादी पार्टी (सपा), एक बार जनता दल, एक बार भारतीय लोकदल (बीएलडी) और दो बार निर्दलीय ने चुनाव जीता। बसपा ने इस सीट पर अब तक अपना खाता नहीं खोल पाई है। 2014 और 2019 के चुनाव भाजपा के पंकज चौधरी ने जीतकर कुर्सी पर कब्जा किया।

पिछले दो चुनावों का हाल

महराजगंज लोकसभा सीट पर 2019 के चुनाव में भजपा ने पंकज चौधरी को मैदान में उतारा था, जबकि उनके सामने सपाके अखिलेश सिंह और कांग्रेस की ओर से सुप्रिया श्रीनेत ने चुनौती पेश की थी। लेकिन पंकज चौधरी ने 3 लाख 40 हजार 424 मतों के अंतर से बड़ी जीत हासिल की। पंकज को चुनाव में 726,349 (59.19 प्रतिशत) वोट मिले तो अखिलेश सिंह को 385,925 (31.45 प्रतिशत) वोट आए। कांग्रेस की सुप्रिया श्रीनेत्र को 72,516 (5.91 प्रतिशत) वोट मिले थे। कांग्रेस की प्रत्याशी की जमानत जब्त हुई।

इससे पहले 2014 के संसदीय चुनाव में भी भाजपा के टिकट पर पंकज चौधरी को जीत मिली थी। तब के चुनाव में पंकज के सामने बसपा के टिकट पर काशी नाथ शुक्ला और सपा के अखिलेश सिंह थे जबकि कांग्रेस ने हर्षवर्द्धन को मैदान में उतारा था। पंकज चौधरी ने 471,542 (44.47 प्रतिशत) वोट हासिल किए तो काशी नाथ को 231,084 (21.80 प्रतिशत) वोट मिले जबकि अखिलेश सिंह को 213,974 (20.18 प्रतिशत) वोट आए। कांग्रेस चौथे नंबर पर रही थी।

किस पार्टी ने किसको बनाया उम्मीदवार

भाजपा ने अपने सीटिंग सांसद व केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी को नौवीं बार टिकट देकर प्रत्याशी घोषित किया है, वहीं सपा कांग्रेस गठबंधन में यह सीट कांग्रेस के खाते में गई है। कांग्रेस ने अपने प्रदेश उपाध्यक्ष और पार्टी से फरेन्दा विधानसभा से विधायक वीरेंद्र चौधरी पर अपना दांव लगाया है। वहीं बसपा ने मो0 मौसमे आलम को मैदान में उतारा है।

महाराजगंज सीट का जातीय समीकरण

महाराजगंज संसदीय सीट पर लगभग 20 लाख वोटर हैं। जातीय समीकरण की बात की जाए तो इस सीट पर ओबीसी वोटर 56 फीसद से भी ज्यादा है। इनमें ज्यादातर कुर्मी, पटेल, चौरसिया, यादव, मौर्य, सुनार और चौहान आते हैं। सवर्ण जातियों में 12 फ़ीसद ब्राह्मण और कुछ फीसद क्षत्रिय और कायस्थ समुदाय के लोग हैं। यहां दलितों में सबसे ज्यादा जाटव वोटर आते हैं।

विधानसभा सीटों का हाल

महाराजगंज संसदीय सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें आती हैं। जिसमें फरेन्दा, नौतनवां, सिसवां, महाराजगंज और पनियरा शामिल हैं। फरेन्दा सीट कांग्रेस और नौतनवां निषाद पार्टी के कब्जे में है। बाकी सीटों पर भाजपा काबिज है। बता दें, निषाद पार्टी एनडीए में शामिल है।

जीत का गणित और चुनौतियां

महराजगंज में कुर्मी वोटरों की अच्छी-खासी तादाद है। सियासी रणनीति में माहिर भाजपा प्रत्याशी पंकज चौधरी कुर्मी समुदाय से आते हैं जिससे पिछड़ी जाति के बड़े नेताओं में उनकी गिनती होती है। भाजपा-कांग्रेस दोनों के ही प्रत्याशी ओबीसी हैं। पंकज के पास भाजपा के परंपरागत और बिरादरी के वोट के साथ ही प्रधानमंत्री मोदी व मुख्यमंत्री योगी का काम है। कांग्रेस पहले मुकाबले से पूरी तरह बाहर थी, हालांकि सपा से गठबंधन के बाद अब उसकी स्थिति पहले से बेहतर दिखाई दे रही है। कांग्रेस प्रत्याशी को सजातीय वोटरों के अलावा ब्राह्मण, दलित, यादव और मुस्लिम वोटरों का सहारा है। मौसमे आलम को बसपा के काडर वोटों के साथ मुस्लिम वोट का भरोसा है। मुस्लिम वोटों में होने वाले बिखराव को रोकना कांग्रेस प्रत्याशी के लिए बड़ी चुनौती होगा।

राजनीतिक विशलेषक राघवेन्द्र मिश्र के मुताबिक, इस बेल्ट में ज्यादातर लोगों का मानना है कि मोदी-योगी अच्छा काम कर रहे हैं। विकास हुआ है। जिले में हुए निवेशक सम्मेलन के माध्यम से 170 निवेशकों ने 2100 करोड़ की लागत से इकाइयों को स्थापित करने के लिए अनुबंध किया था। जिसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।

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