छत्तीसगढ़ में माओवाद के विरुद्ध बड़ी सफलता: सुकमा में 65 लाख के इनामी नक्सलियों समेत 26 कैडरों का आत्मसमर्पण
छत्तीसगढ़ : छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले से सुरक्षाबलों के लिए एक बड़ी और उत्साहजनक खबर सामने आई है। राज्य सरकार की पुनर्वास नीति और ‘पूना नार्कोम’ (नई सुबह) अभियान के बढ़ते प्रभाव के चलते नक्सली विचारधारा का साथ छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इसी कड़ी में सुकमा पुलिस के समक्ष कुल 26 नक्सलियों ने अपने हथियार डाल दिए और हिंसा का रास्ता त्याग कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का संकल्प लिया। आत्मसमर्पण करने वाले इन नक्सलियों में सात महिलाएं भी शामिल हैं, जो विभिन्न माओवादी संगठनों में सक्रिय भूमिका निभा रही थीं। पुलिस के अनुसार, सरेंडर करने वाले इन नक्सलियों में से 13 कैडर ऐसे हैं जिन पर शासन द्वारा कुल 65 लाख रुपये का सामूहिक इनाम घोषित किया गया था। यह आत्मसमर्पण बस्तर संभाग में नक्सलवाद की कमर तोड़ने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
पूना मार्गेम पहल और पुनर्वास नीति का असर
सुकमा के पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण ने इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी साझा करते हुए बताया कि ये सभी नक्सली छत्तीसगढ़ शासन की ‘आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति’ से गहराई से प्रभावित थे। इसके साथ ही सुकमा जिले में स्थानीय स्तर पर चलाए जा रहे ‘पूना मार्गेम’ (जिसका अर्थ गोंडी भाषा में नई राह होता है) अभियान ने इन कैडरों के मन में विश्वास जगाने का काम किया। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि नक्सली अब संगठन की खोखली विचारधारा और शोषणकारी व्यवस्था से ऊब चुके हैं। उन्हें यह अहसास हो रहा है कि हिंसा के रास्ते पर चलकर वे केवल विनाश की ओर जा रहे हैं, जबकि सरकार द्वारा प्रदान की जा रही सुविधाओं और पुनर्वास योजनाओं से वे अपने परिवार के साथ एक सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सकते हैं। एसपी किरण चव्हाण ने बताया कि आत्मसमर्पण करने वाले इन कैडरों में से कई दशकों से जंगलों में सक्रिय थे और अब वे अपने बच्चों के भविष्य और शांतिपूर्ण जीवन के लिए बाहर आए हैं।
10 लाख की इनामी लाली उर्फ मुचाकी का आत्मसमर्पण
इस आत्मसमर्पण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी लाली उर्फ मुचाकी आयते लखमू है। 35 वर्षीय मुचाकी कंपनी पार्टी समिति की एक सक्रिय सदस्य थी और नक्सली संगठन के भीतर उसे एक प्रभावशाली कैडर माना जाता था। उसकी खतरनाक गतिविधियों और संगठन में कद को देखते हुए सरकार ने उस पर 10 लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा था। मुचाकी का आत्मसमर्पण सुरक्षाबलों के लिए बड़ी रणनीतिक जीत है क्योंकि वह सुरक्षा बलों पर किए गए कई बड़े हमलों की साजिशकर्ता और हमलावर रही है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, मुचाकी हिंसा की कई ऐसी घटनाओं में शामिल रही है जिन्होंने देश को झकझोर कर रख दिया था। संगठन में उसकी पकड़ और इलाके की भौगोलिक समझ का इस्तेमाल नक्सली बड़ी वारदातों को अंजाम देने के लिए करते थे, लेकिन अब उसके सरेंडर से संगठन को बड़ा झटका लगा है।
खूनी हमलों का इतिहास और बड़ी नक्सली वारदातें
मुचाकी आयते लखमू के आपराधिक इतिहास की बात करें तो उसका नाम वर्ष 2017 में ओडिशा के कोरापुट रोड पर हुए एक भीषण आईईडी (IED) विस्फोट में प्रमुखता से आया था। इस हमले में नक्सलियों ने सुरक्षाकर्मियों के एक वाहन को निशाना बनाया था, जिसमें 14 जवान शहीद हो गए थे। मुचाकी न केवल इस हमले की योजना में शामिल थी, बल्कि उसने मौके पर सक्रिय रूप से नेतृत्व भी किया था। इसके अलावा, आत्मसमर्पण करने वालों में एक और बड़ा नाम हेमला लखमा का है, जिस पर 8 लाख रुपये का इनाम था। लखमा वर्ष 2020 में सुकमा के मिनपा इलाके में हुए उस घातक हमले में शामिल था, जिसमें 17 सुरक्षाकर्मियों ने अपनी शहादत दी थी। मिनपा हमला सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी क्षति थी और लखमा उस समय से ही पुलिस की ‘मोस्ट वांटेड’ सूची में था। इन बड़े कैडरों के बाहर आने से अब कई पुराने अनसुलझे मामलों की कड़ियां जुड़ने की उम्मीद है।
इनामी कैडरों का विवरण और संगठन में उनकी भूमिका
पुलिस द्वारा साझा किए गए विवरण के अनुसार, इन 26 नक्सलियों में से 13 बेहद महत्वपूर्ण और इनामी कैडर थे। मुचाकी के अलावा चार अन्य प्रमुख नाम – हेमला लखमा (41), अस्मिता उर्फ कमलू सन्नी (20), रामबती उर्फ पदम जोगी (21) और सुंदरम पाले (20) हैं। इन चारों ही नक्सलियों पर 8-8 लाख रुपये का इनाम घोषित था। यह सभी नक्सली माओवादियों की सबसे खतरनाक विंग ‘पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी’ (PLGA) की बटालियन, दक्षिण बस्तर डिवीजन, माड़ डिवीजन और आंध्र-ओडिशा सीमा (AOB) डिवीजन में अलग-अलग पदों पर सक्रिय थे। उनके कार्यक्षेत्र में अबूझमाड़ के दुर्गम इलाके, सुकमा के घने जंगल और ओडिशा के सीमावर्ती क्षेत्र शामिल थे। इन क्षेत्रों में वे न केवल सुरक्षा बलों की गतिविधियों पर नजर रखते थे, बल्कि रसद जुटाने और स्थानीय ग्रामीणों को डरा-धमकाकर संगठन से जोड़ने का काम भी करते थे।
नक्सलियों के अन्य वर्गों पर घोषित पुरस्कार
65 लाख की कुल इनामी राशि में अन्य छोटे कैडर भी शामिल थे जिनकी भूमिका भी संगठन में महत्वपूर्ण थी। आत्मसमर्पण करने वाले अन्य कैडरों में से तीन नक्सली ऐसे थे जिन पर 5-5 लाख रुपये का इनाम था। इसके अलावा एक कैडर पर 3 लाख रुपये, एक अन्य पर 2 लाख रुपये और तीन कैडरों पर 1-1 लाख रुपये का इनाम घोषित था। शेष 13 नक्सली निचले स्तर के कैडर थे जो संगठन के लिए संदेशवाहक, संतरी या भोजन की व्यवस्था करने जैसे कार्यों में शामिल थे। पुलिस का मानना है कि जब बड़े नेता या मध्यम स्तर के कमांडर आत्मसमर्पण करते हैं, तो निचले स्तर के कार्यकर्ताओं का मनोबल पूरी तरह टूट जाता है। यही कारण है कि सुकमा पुलिस की यह सफलता नक्सलवाद के बुनियादी ढांचे पर प्रहार करने जैसी है।
तत्काल सहायता और भविष्य का पुनर्वास
आत्मसमर्पण करने की प्रक्रिया के तुरंत बाद, जिला प्रशासन और पुलिस विभाग की ओर से इन सभी 26 पूर्व नक्सलियों को तत्काल सहायता के रूप में 50,000 रुपये की अनुग्रह राशि प्रदान की गई। यह राशि उन्हें मुख्यधारा में अपने जीवन की नई शुरुआत करने के लिए दी जाती है। एसपी किरण चव्हाण ने स्पष्ट किया कि यह केवल शुरुआत है। छत्तीसगढ़ सरकार की नीति के अनुसार, इन सभी को भविष्य में रहने के लिए आवास, कौशल विकास प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएंगे ताकि वे फिर कभी हथियार उठाने के बारे में न सोचें। इसके अतिरिक्त, जिन नक्सलियों पर पूर्व में इनाम था, उन्हें नियमानुसार उस इनामी राशि का लाभ भी उनके पुनर्वास के लिए दिया जाएगा। सरकार का लक्ष्य है कि ये लोग समाज में वापस लौटकर सम्मान के साथ खेती या अन्य छोटे व्यवसाय कर सकें और अपने परिवारों की देखभाल कर सकें।
दक्षिण बस्तर और सीमावर्ती इलाकों में माओवाद का कमजोर होता आधार
यह सामूहिक आत्मसमर्पण इस बात का स्पष्ट संकेत है कि दक्षिण बस्तर, जो कभी माओवाद का अभेद्य किला माना जाता था, अब वहां उनकी पकड़ ढीली हो रही है। अबूझमाड़ और आंध्र-ओडिशा सीमा जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और विकास कार्यों ने नक्सलियों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है। सड़कों का निर्माण, मोबाइल टावरों की स्थापना और नए सुरक्षा कैंपों के खुलने से नक्सलियों का सूचना तंत्र ध्वस्त हो गया है। सुकमा पुलिस के अनुसार, आने वाले समय में और भी कई नक्सली आत्मसमर्पण करने की तैयारी में हैं क्योंकि वे अब यह समझ चुके हैं कि लड़ाई का कोई अंत नहीं है और राज्य की नीतियां उनके व्यक्तिगत कल्याण के लिए बेहतर विकल्प पेश कर रही हैं। स्थानीय पुलिस और प्रशासन का ‘पूना मार्गेम’ अभियान अब एक जन आंदोलन का रूप ले रहा है, जिससे प्रभावित होकर नक्सली कैडर स्वेच्छा से थानों और कैंपों तक पहुंच रहे हैं।