महिला आरक्षण विधेयक पर संसद में सियासी संग्राम तेज

देश की राजनीति में एक बार फिर महिला आरक्षण का मुद्दा सुर्खियों में है। संसद में महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए गए हैं। प्रस्ताव है कि यह व्यवस्था वर्ष 2029 से लागू की जाएगी। इसे भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है, लेकिन इस पर संसद में तीखी बहस जारी है।

विधेयक पेश होते ही विपक्षी दलों ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने मांग उठाई कि महिला आरक्षण के भीतर मुस्लिम और पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से उप-कोटा तय किया जाए। विपक्ष का कहना है कि बिना उप-वर्गीकरण के यह आरक्षण सभी वर्गों की महिलाओं तक समान रूप से नहीं पहुंच पाएगा।

सरकार की ओर से जवाब देते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि समाजवादी पार्टी को वास्तव में मुस्लिम महिलाओं की चिंता है, तो उन्हें अपने पार्टी टिकटों में प्राथमिकता देनी चाहिए। उनके इस बयान के बाद सदन का माहौल और अधिक गरमा गया और दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।

इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में विधेयक के महत्व पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने इसे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को सशक्त बनाने वाला कदम बताया और कहा कि महिलाओं की नीति निर्माण में भागीदारी आज की आवश्यकता है। उनके अनुसार, यह विधेयक उसी दिशा में एक बड़ा प्रयास है।

प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कोई नया प्रस्ताव नहीं है, बल्कि पिछले 25-30 वर्षों से इस पर चर्चा हो रही है। उन्होंने पूछा कि जब पहले अवसर थे, तब इसे लागू क्यों नहीं किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल अपनी सीटों के नुकसान के डर से इस बिल का विरोध कर रहे हैं।

अपने संबोधन में पीएम मोदी ने पंचायत स्तर पर महिला आरक्षण के सकारात्मक परिणामों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब स्थानीय स्तर पर इस व्यवस्था को स्वीकार किया जा चुका है और इसके अच्छे नतीजे सामने आए हैं, तो संसद और विधानसभाओं में इसे लागू करने में हिचक क्यों होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जो दल इस विधेयक का विरोध करेंगे, उन्हें आने वाले चुनावों में इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

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