October 7, 2026

ataltv.com

Hindi News, Breaking Hindi News, हिंदी न्यूज़, Hindi Samachar, हिंदी समाचार, Latest News in Hindi, ताजा हिंदी ख़बरें

बीसीसीआई विवाद में अनुराग ठाकुर की ‘सुप्रीम’ वापसी: 9 साल बाद कोर्ट ने हटाया प्रतिबंध, क्रिकेट प्रशासन में फिर सक्रिय हो सकेंगे पूर्व अध्यक्ष

नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ भाजपा नेता अनुराग ठाकुर के लिए न्यायपालिका के गलियारों से एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई प्रशासन से जुड़े एक लंबे समय से लंबित मामले में सुनवाई करते हुए अपने जनवरी 2017 के उस ऐतिहासिक आदेश में संशोधन कर दिया है, जिसके तहत अनुराग ठाकुर पर बोर्ड की गतिविधियों में शामिल होने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। शीर्ष अदालत के इस ताजा फैसले के बाद अब अनुराग ठाकुर भारतीय क्रिकेट बोर्ड के मामलों में भाग लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। यह फैसला न केवल ठाकुर के व्यक्तिगत करियर के लिए अहम है, बल्कि भारतीय क्रिकेट प्रशासन के भविष्य के समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ‘अनुपातिकता के सिद्धांत’ (Doctrine of Proportionality) का पालन करते हुए अपना आदेश सुनाया। न्यायमूर्ति की पीठ ने उल्लेख किया कि जनवरी 2017 में अदालत ने अनुराग ठाकुर को बीसीसीआई के कामकाज से ‘सीज एंड डिसिस्ट’ यानी पूरी तरह दूर रहने का कड़ा निर्देश दिया था। हालांकि, अदालत ने इस तथ्य पर विशेष गौर किया कि उस समय अनुराग ठाकुर ने बिना किसी शर्त के अपनी गलती के लिए ‘बिना शर्त माफी’ (Unqualified Apology) मांग ली थी। इसी माफीनामे और बीते समय को आधार मानते हुए अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि नौ साल पहले लगाया गया वह प्रतिबंध अब आवश्यक नहीं रह गया है और उसमें ढील दी जानी चाहिए।

क्या था 2017 का विवाद और बर्खास्तगी की वजह? अनुराग ठाकुर और बीसीसीआई के बीच कानूनी संघर्ष की शुरुआत तब हुई थी जब जस्टिस लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू करने को लेकर बोर्ड और सुप्रीम कोर्ट के बीच गतिरोध पैदा हो गया था। जनवरी 2017 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए अनुराग ठाकुर (तत्कालीन अध्यक्ष) और अजय शिर्के (तत्कालीन सचिव) को उनके पदों से बर्खास्त कर दिया था। कोर्ट ने तब माना था कि बीसीसीआई नेतृत्व जानबूझकर सुधारों की राह में रोड़ा अटका रहा है।

उस समय मामला केवल सुधारों तक सीमित नहीं था, बल्कि अनुराग ठाकुर पर अदालत को गुमराह करने और गलत हलफनामा दायर करने के भी गंभीर आरोप लगे थे। दिसंबर 2016 में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की थी कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि ठाकुर ने अदालत के समक्ष असत्य कथन कहे हैं। अदालत ने यहां तक चेतावनी दी थी कि यदि ‘गलत बयानी’ का मामला साबित हो गया, तो उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है।

विवाद का एक मुख्य बिंदु अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के हस्तक्षेप से जुड़ा था। आईसीसी के तत्कालीन अध्यक्ष शशांक मनोहर ने एक हलफनामे में दावा किया था कि अनुराग ठाकुर ने उनसे एक पत्र लिखने का अनुरोध किया था, जिसमें बीसीसीआई में सीएजी (CAG) प्रतिनिधि की नियुक्ति को ‘सरकारी हस्तक्षेप’ करार देने की बात कही गई थी। जबकि अनुराग ठाकुर ने अदालत में हलफनामा देकर ऐसी किसी भी कोशिश से इनकार किया था। इसी विरोधाभास ने अदालत को नाराज कर दिया था।

लोढ़ा समिति और बीसीसीआई का प्रतिरोध जुलाई 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई में पारदर्शिता लाने के लिए लोढ़ा समिति की अधिकांश सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था। इन सिफारिशों में ‘एक राज्य एक वोट’, ’70 वर्ष की आयु सीमा’, और ‘कार्यकाल के बीच तीन साल का कूलिंग-ऑफ पीरियड’ जैसे कड़े प्रावधान शामिल थे। कोर्ट ने बोर्ड को इन नियमों को लागू करने के लिए छह महीने का समय दिया था। हालांकि, अक्टूबर 2016 में बीसीसीआई की विशेष आम सभा (SGM) में इन अहम सुझावों को खारिज कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने उस समय बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था, “सुधर जाओ, वरना हम अपने आदेश से सुधार देंगे।” इसके बावजूद बोर्ड पदाधिकारियों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और प्रक्रिया में ढिलाई बरती। अंततः लोढ़ा पैनल की मांग पर कोर्ट ने बोर्ड के शीर्ष नेतृत्व को हटाने का कठोर निर्णय लिया।

अनुराग ठाकुर का क्रिकेट सफर अनुराग ठाकुर का बीसीसीआई में सफर काफी तेजी से आगे बढ़ा था। वे बोर्ड के सबसे युवा अध्यक्षों में से एक रहे हैं। उन्होंने मई 2016 से जनवरी 2017 तक अध्यक्ष पद संभाला। जगमोहन डालमिया के आकस्मिक निधन के बाद वे निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए थे। इससे पहले वे 2011 में संयुक्त सचिव और 2015-16 के दौरान बोर्ड के सचिव के पद पर भी अपनी सेवाएं दे चुके थे। हिमाचल प्रदेश क्रिकेट संघ (एचपीसीए) के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने धर्मशाला में अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

वर्तमान फैसले के मायने फरवरी 2026 में आया सुप्रीम कोर्ट का यह संशोधित आदेश अनुराग ठाकुर के लिए एक राजनीतिक और प्रशासनिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। नौ साल के लंबे अंतराल के बाद अब उनके लिए क्रिकेट प्रशासन के दरवाजे फिर से खुल गए हैं। हालांकि, लोढ़ा समिति के नियम अभी भी प्रभावी हैं, लेकिन बोर्ड की गतिविधियों में भाग लेने की स्वतंत्रता मिलने से वे आगामी चुनावों या रणनीतिक निर्णयों में भूमिका निभा सकते हैं।

क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि बीसीसीआई के मौजूदा ढांचे में अनुराग ठाकुर का अनुभव और उनकी राजनीतिक पैठ उन्हें एक बार फिर प्रभावशाली बना सकती है। अदालत के इस नरम रुख ने यह संदेश दिया है कि ‘बिना शर्त माफी’ और अनुशासनात्मक सुधार के बाद न्यायिक प्रतिबंधों को स्थायी नहीं रखा जाना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright © All rights reserved. | Newsphere by AF themes.