शशि थरूर बनाम कांग्रेस: केरल चुनाव से पहले खुलकर सामने आए मतभेद, पार्टी बैठकों से दूरी पर बढ़ी सियासी हलचल
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर तथा पार्टी नेतृत्व के बीच लंबे समय से चली आ रही खटास अब खुलकर सामने आती नजर आ रही है। केरल में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस जहां अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटी है, वहीं शशि थरूर का लगातार पार्टी की अहम बैठकों से नदारद रहना कई सवाल खड़े कर रहा है। ताजा घटनाक्रम में कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित के बयान ने इस अंदरूनी मतभेद को और सार्वजनिक कर दिया है।
केरल चुनावी बैठक से थरूर की गैरहाजिरी
केरल विधानसभा चुनाव को लेकर हाल ही में कांग्रेस की एक अहम बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें पार्टी के कई वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं ने शिरकत की। हालांकि इस बैठक में तिरुवनंतपुरम से तीन बार के सांसद शशि थरूर मौजूद नहीं थे। थरूर की गैरहाजिरी को लेकर जब कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित से सवाल पूछा गया तो उन्होंने ऐसा बयान दे दिया, जिसने पार्टी के भीतर चल रहे तनाव को उजागर कर दिया।
संदीप दीक्षित ने कहा कि बैठक में वही नेता शामिल हुए जो जरूरी और मजबूत जनाधार वाले हैं। उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि जो नेता बड़े नहीं हैं या जिनकी जरूरत नहीं है, उनके बैठक में न आने से कोई फर्क नहीं पड़ता। इस बयान को शशि थरूर पर सीधा तंज माना जा रहा है।
संदीप दीक्षित के बयान से बढ़ी सियासी गर्मी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार संदीप दीक्षित ने कहा, “सभी मजबूत और जनाधार वाले वरिष्ठ नेता बैठक में मौजूद थे। जो जरूरी हैं, वे सभी आए। अगर कोई बड़ा नेता नहीं है और उसकी जरूरत नहीं है, तो उसके न आने से कोई फर्क नहीं पड़ता।” कांग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद के संदर्भ में इस तरह की टिप्पणी ने पार्टी के भीतर मतभेद की चर्चाओं को और हवा दे दी है।
हालांकि कांग्रेस नेतृत्व की ओर से इस बयान पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे शशि थरूर को साइडलाइन करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
कांग्रेस की बैठकों से दूरी बना रहे हैं थरूर
पिछले कुछ समय से शशि थरूर लगातार कांग्रेस की बैठकों और कार्यक्रमों से दूरी बनाए हुए हैं। केरल में चुनावी सरगर्मी तेज होने के बावजूद थरूर का चुनावी रणनीति से दूर रहना पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए भी असमंजस की स्थिति पैदा कर रहा है।
थरूर न केवल प्रदेश स्तर की बैठकों से अनुपस्थित हैं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर के कई मंचों पर भी उनकी सक्रियता पहले जैसी नहीं दिख रही। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या कांग्रेस में उनकी भूमिका सीमित कर दी गई है या वे स्वयं पार्टी से दूरी बना रहे हैं।
कांग्रेस में अपनी भूमिका से असंतुष्ट हैं थरूर?
शशि थरूर और कांग्रेस पार्टी के बीच मतभेद कोई नए नहीं हैं। बीते कुछ वर्षों से थरूर कई बार पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाते रहे हैं। हालांकि उन्होंने कभी खुलकर विद्रोही तेवर नहीं दिखाए, लेकिन उनके बयान अक्सर यह संकेत देते रहे हैं कि वे पार्टी में अपनी भूमिका से संतुष्ट नहीं हैं।
कुछ समय पहले थरूर ने एक बयान में कांग्रेस को चेतावनी दी थी कि यदि पार्टी ने अपने जनाधार का विस्तार नहीं किया तो उसे लगातार तीसरी बार विपक्ष में बैठना पड़ सकता है। उनके इस बयान को पार्टी नेतृत्व के लिए असहज करने वाला माना गया था।
नेतृत्व की कमी का उठाया मुद्दा
थरूर ने यह भी कहा था कि केरल कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं को यह महसूस होता है कि प्रदेश में मजबूत नेतृत्व का अभाव है। उनका यह बयान सीधे तौर पर राज्य के कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल खड़े करता है। इसके बाद से ही थरूर और पार्टी के बीच दूरी और स्पष्ट होती चली गई।
एक अन्य बयान में थरूर ने यह भी कहा था कि यदि पार्टी को उनकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं है, तो उनके पास अन्य विकल्प भी मौजूद हैं। उन्होंने मजाकिया लहजे में किताबें लिखने का जिक्र किया था, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे कांग्रेस नेतृत्व के प्रति उनकी नाराजगी के संकेत के तौर पर देखा।
एनडीए सरकार की नीतियों की तारीफ से बढ़ी अटकलें
शशि थरूर कई मौकों पर केंद्र की एनडीए सरकार की नीतियों की सराहना भी कर चुके हैं, जो कांग्रेस के आधिकारिक रुख से अलग नजर आती है। विदेश नीति, कुछ प्रशासनिक फैसलों और हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे मुद्दों पर थरूर ने सरकार की तारीफ की थी।
इन बयानों के बाद से ही यह अटकलें तेज हो गई हैं कि क्या थरूर वैचारिक रूप से कांग्रेस से दूर जा रहे हैं। हालांकि थरूर ने इन कयासों को कभी सीधे तौर पर स्वीकार या खारिज नहीं किया है।
क्या एनडीए की ओर बढ़ रहे हैं थरूर?
थरूर की चुप्पी, कांग्रेस बैठकों से दूरी और एनडीए सरकार की नीतियों की सराहना ने राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि थरूर कांग्रेस के भीतर अपने लिए सम्मानजनक भूमिका न मिलने से असहज हैं, जबकि कुछ इसे उनकी स्वतंत्र सोच और अंतरराष्ट्रीय अनुभव का परिणाम मानते हैं।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि शशि थरूर कांग्रेस छोड़कर एनडीए का दामन थामने जा रहे हैं, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम यह जरूर संकेत देता है कि पार्टी और थरूर के बीच सबकुछ सामान्य नहीं है।
केरल चुनाव में कांग्रेस के लिए चुनौती
केरल विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं। ऐसे में पार्टी के एक प्रमुख चेहरे का चुनावी परिदृश्य से गायब रहना कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। थरूर की लोकप्रियता खासतौर पर शहरी और शिक्षित वर्ग में काफी है।
पार्टी के भीतर चल रही खींचतान यदि समय रहते नहीं सुलझाई गई, तो इसका असर चुनावी प्रदर्शन पर भी पड़ सकता है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का एक वर्ग चाहता है कि नेतृत्व और थरूर के बीच संवाद स्थापित हो और मतभेदों को सार्वजनिक मंच पर आने से पहले सुलझा लिया जाए।
आगे की राह
फिलहाल शशि थरूर ने संदीप दीक्षित के बयान या अपनी गैरहाजिरी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह दूरी रणनीतिक है या किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की भूमिका।
इतना तय है कि केरल चुनाव से पहले कांग्रेस के भीतर यह खींचतान पार्टी के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरी है। अब देखना होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस स्थिति को कैसे संभालता है और क्या शशि थरूर एक बार फिर पार्टी के चुनावी अभियान में सक्रिय भूमिका निभाते नजर आते हैं या नहीं।