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हरीश राणा केस: क्या है क्वाड्रिप्लेजिया? जानिए इस गंभीर स्थिति के कारण और प्रभाव

नई दिल्ली, 18 मार्च 2026: इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के बाद हरीश राणा का मामला देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। बताया जा रहा है कि वह पिछले 13 वर्षों से वेजिटेटिव स्टेट में हैं और केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे जीवित थे।

जानकारी के अनुसार, साल 2013 में चंडीगढ़ में एक हादसे के दौरान वह हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिर गए थे, जिसके बाद उनकी स्थिति गंभीर हो गई। उन्हें Quadriplegia नामक स्थिति हो गई, जिसमें शरीर के चारों अंग (दोनों हाथ और दोनों पैर) काम करना बंद कर देते हैं।

क्या है क्वाड्रिप्लेजिया?

विशेषज्ञों के अनुसार, क्वाड्रिप्लेजिया एक ऐसी गंभीर स्थिति है जिसमें व्यक्ति के हाथ और पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं। यह आमतौर पर गर्दन के पास स्थित स्पाइनल कॉर्ड में गंभीर चोट लगने के कारण होता है।

स्पाइनल कॉर्ड हमारे मस्तिष्क से शरीर के बाकी हिस्सों तक संदेश पहुंचाने का काम करता है। जब इसमें चोट लगती है, तो शरीर के अंगों तक संकेत पहुंचना बंद हो जाता है, जिससे लकवा जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

क्वाड्रिप्लेजिया के प्रमुख कारण

  • ऊंचाई से गिरना

  • तेज़ रफ्तार वाहन दुर्घटना

  • स्पाइनल कॉर्ड में ट्यूमर या ब्लीडिंग

  • नसों पर दबाव या गंभीर चोट

  • न्यूरोलॉजिकल बीमारियां जैसे मल्टीपल स्क्लेरोसिस

शरीर पर इसका असर

इस स्थिति में मरीज चल-फिर नहीं सकता और दैनिक कार्यों के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है। शरीर के अंगों में संवेदना खत्म हो जाती है, जिससे चोट लगने का एहसास भी नहीं होता। कई मामलों में पेशाब और मल त्याग का नियंत्रण भी खत्म हो जाता है। लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहने से बेड सोर्स (घाव) होने का खतरा बढ़ जाता है।

क्या है इसका इलाज?

क्वाड्रिप्लेजिया का इलाज पूरी तरह चोट की गंभीरता पर निर्भर करता है। कुछ मामलों में सर्जरी के जरिए नसों पर दबाव कम किया जा सकता है, जिससे आंशिक सुधार संभव होता है। इसके अलावा फिजियोथेरेपी भी मरीज की स्थिति में सुधार लाने में मदद करती है।

हालांकि, यदि स्पाइनल कॉर्ड को स्थायी नुकसान हो चुका हो, तो पूरी तरह ठीक होना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मामलों में मरीज को लंबे समय तक विशेष देखभाल और सपोर्ट सिस्टम की आवश्यकता होती है।

हरीश राणा का मामला न केवल चिकित्सा दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह जीवन, गरिमा और चिकित्सा निर्णयों से जुड़े गंभीर सवाल भी खड़े करता है।

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