वन नेशन-वन इलेक्शन पर बढ़ी हलचल, 2029 में लागू होने की चर्चा; JPC की बैठक में प्रियंका गांधी और चिदंबरम शामिल
नई दिल्ली: देश में ‘एक देश-एक चुनाव’ यानी वन नेशन-वन इलेक्शन को लेकर सियासी और संवैधानिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। 129वें संविधान संशोधन विधेयक पर विचार के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की सोमवार को अहम बैठक हो रही है। बैठक की अध्यक्षता JPC के चेयरमैन पीपी चौधरी कर रहे हैं।
बैठक में कांग्रेस महासचिव और JPC सदस्य प्रियंका गांधी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम, TMC सांसद सागरिका घोष और NCP (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले समेत समिति के अन्य सदस्य शामिल हैं।
वन नेशन-वन इलेक्शन का विपक्षी दल लगातार विरोध करते रहे हैं। ऐसे में JPC की बैठक को इस संवैधानिक प्रस्ताव के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
2029 में लागू हो सकता है वन नेशन-वन इलेक्शन?
इसी बीच वन नेशन-वन इलेक्शन को लेकर एक अहम चर्चा सामने आई है। रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि इसे 2034 के बजाय 2029 में ही लागू किया जा सकता है। यानी 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ ही राज्यों के विधानसभा चुनाव कराने की संभावना पर विचार किया जा रहा है।
JPC अध्यक्ष पीपी चौधरी ने दावा किया है कि अब तक समिति ने जिन हितधारकों से चर्चा की है, उनमें से 99 प्रतिशत लोगों ने वन नेशन-वन इलेक्शन का समर्थन किया है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो इसे 2029 में लागू किया जा सकता है।
हालांकि, 2029 में एक साथ चुनाव कराने के लिए कई राज्यों के मौजूदा चुनावी चक्र में बदलाव करना होगा। इसलिए इसे लागू करने से पहले संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ राज्यों के कार्यकाल को लेकर भी महत्वपूर्ण फैसले लेने होंगे।
भारत में पहले भी एक साथ होते थे चुनाव
वन नेशन-वन इलेक्शन भारत के लिए कोई बिल्कुल नई अवधारणा नहीं है। आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ ही कराए जाते थे।
1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा के साथ राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव भी हुए थे। हालांकि, 1967 के बाद कुछ राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग हुईं और कई जगह राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। इसके बाद चुनावी चक्र अलग-अलग होने लगा।
बाद में 1971 में लोकसभा के समय से पहले चुनाव और 1972 के विधानसभा चुनावों के कारण लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच का समन्वय पूरी तरह टूट गया।
वन नेशन-वन इलेक्शन के समर्थन में क्या तर्क?
वन नेशन-वन इलेक्शन के समर्थकों का तर्क है कि देश में लगातार होने वाले चुनावों से सरकारी मशीनरी और प्रशासनिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। बार-बार चुनाव होने के कारण आचार संहिता लागू होती है, जिससे कई विकास कार्यों और नीतिगत फैसलों की गति प्रभावित होने का दावा किया जाता है।
सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों की चुनावी ड्यूटी में तैनाती भी इसका एक प्रमुख मुद्दा है। चुनाव प्रक्रिया में बड़ी संख्या में शिक्षक और सरकारी कर्मचारी शामिल होते हैं, जिससे उनके नियमित कार्य प्रभावित होने की बात कही जाती है।
समर्थकों का मानना है कि यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं तो समय, धन और प्रशासनिक संसाधनों की बचत हो सकती है और सरकारें विकास कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकती हैं।
शिवराज सिंह चौहान ने भी किया समर्थन
वन नेशन-वन इलेक्शन को लेकर सोमवार को केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी बड़ा बयान दिया। हरिद्वार में संत समाज के कार्यक्रम में उन्होंने बार-बार होने वाले चुनावों को विकास और जनसेवा की गति में बाधा बताया।
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए वन नेशन-वन इलेक्शन जरूरी है। उन्होंने संत समुदाय से भी इस संवैधानिक सुधार के पक्ष में जनजागरूकता बढ़ाने में सहयोग की अपील की।
फिलहाल JPC की बैठक और प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन पर चर्चा जारी है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि वन नेशन-वन इलेक्शन को 2029 में लागू करने की दिशा में सरकार और समिति कितनी तेजी से आगे बढ़ती है।