पायलटों की कमी दूर करने की बड़ी योजना, फ्लाइट ट्रेनिंग नियमों में ढील का प्रस्ताव
देश में एयरलाइंस सेक्टर में पायलटों की कमी लंबे समय से एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसी समस्या के समाधान के लिए केंद्र सरकार की एक उच्च स्तरीय समिति ने पायलट ट्रेनिंग से जुड़े नियमों में बदलाव का ड्राफ्ट तैयार किया है। इस प्रस्ताव के अनुसार, पायलटों की ट्रेनिंग को अधिक आधुनिक और सिम्युलेटर-आधारित बनाने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य ट्रेनिंग की अवधि को कम करना और कमर्शियल पायलटों की उपलब्धता बढ़ाना है।
200 घंटे की ट्रेनिंग घटाकर 100–120 घंटे का प्रस्ताव
वर्तमान नियमों के तहत कमर्शियल पायलट लाइसेंस (CPL) हासिल करने के लिए उम्मीदवारों को कम से कम 200 घंटे की वास्तविक उड़ान का अनुभव जरूरी होता है। लेकिन नए प्रस्ताव में इसे घटाकर 100 से 120 घंटे करने की बात कही गई है। बाकी ट्रेनिंग आधुनिक फ्लाइट सिम्युलेटर पर कराई जाएगी, जहां पायलट बिना जोखिम के असली जैसे परिस्थितियों में अभ्यास कर सकते हैं।
MPL (मल्टी-क्रू पायलट लाइसेंस) पर फोकस
समिति ने मल्टी-क्रू पायलट लाइसेंस (MPL) मॉडल को भी बढ़ावा देने की सिफारिश की है। यह प्रणाली 2006 में इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन (ICAO) द्वारा शुरू की गई थी और कई देशों में पहले से लागू है। इस मॉडल में पायलटों को सीधे मल्टी-क्रू ऑपरेशन के लिए तैयार किया जाता है, यानी वे बड़े वाणिज्यिक विमानों में सह-पायलट के रूप में काम करने के लिए प्रशिक्षित होते हैं।
सिम्युलेटर ट्रेनिंग कैसे काम करती है?
फ्लाइट सिम्युलेटर एक हाई-टेक सिस्टम होता है जो वास्तविक विमान के कॉकपिट जैसा अनुभव देता है। इसमें स्क्रीन, कंट्रोल सिस्टम और मूवमेंट टेक्नोलॉजी होती है, जिससे पायलट असली उड़ान जैसा अनुभव प्राप्त करते हैं। इसमें इंजन फेलियर, खराब मौसम और आपात स्थिति जैसी परिस्थितियों की सुरक्षित ट्रेनिंग दी जाती है।
एयरलाइंस को क्या होगा फायदा?
एयर इंडिया, इंडिगो, अकासा एयर और स्पाइसजेट जैसी एयरलाइंस लगातार विस्तार कर रही हैं, लेकिन पायलटों की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। इस नए सिस्टम से पायलट जल्दी तैयार होंगे और एयरलाइंस की मांग पूरी हो सकेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, MPL सिस्टम लागू होने से पायलटों की ट्रेनिंग पाइपलाइन तेज होगी और फ्लाइट कैंसिलेशन जैसी समस्याओं में कमी आ सकती है।
यात्रियों पर असर
अगर यह प्रस्ताव मंजूर हो जाता है, तो लंबे समय में यात्रियों को भी फायदा होगा। पायलटों की कमी दूर होने से उड़ानों की रद्दीकरण दर कम हो सकती है और एयर ट्रैवल अधिक स्थिर हो सकता है। फिलहाल यह प्रस्ताव समीक्षा चरण में है और एयरलाइंस से प्रतिक्रिया मांगी गई है। अंतिम रिपोर्ट DGCA को सौंपी जाएगी, जिसके बाद इस पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।