पूर्व आईपीएस अधिकारी के.पी. रघुवंशी की किताब ‘ट्रबलशूटर’ में बड़ा खुलासा: UPA सरकार पर बाल ठाकरे और इंद्रेश कुमार को गिरफ्तार करने का दबाव लगाने का आरोप
मुंबई/नई दिल्ली: पूर्व भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी और महाराष्ट्र एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) के पूर्व प्रमुख के.पी. रघुवंशी ने अपनी अधिकृत जीवनी Troubleshooter: The Untold Encounters of IPS Officer K.P. Raghuvanshi में केंद्र की पूर्व UPA सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। किताब में दावा किया गया है कि उन्होंने राजनीतिक दबाव में शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे और आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार जैसे प्रमुख हिंदुत्व चेहरों को गिरफ्तार करने से इनकार किया, जिसकी वजह से उन्हें अपनी नौकरी और पद की ‘कीमत’ चुकानी पड़ी। यह जीवनी पत्रकार जितेंद्र दीक्षित ने लिखी है और हाल ही में जारी की गई है।
35 साल के करियर में प्रमुख भूमिकाएं
1980 बैच के आईपीएस अधिकारी रघुवंशी ने अपने लंबे करियर में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने स्पेशल टास्क फोर्स की अगुवाई की, जिसे 1992-93 के मुंबई दंगों पर बनी श्रीकृष्ण आयोग की सिफारिशें लागू करने का जिम्मा सौंपा गया था। वे महाराष्ट्र एटीएस और ठाणे पुलिस आयुक्तालय के प्रमुख भी रहे। इसके अलावा, गढ़चिरोली में नक्सल विरोधी कमांडो फोर्स सी-60 की स्थापना में उनकी अहम भूमिका रही है।
1980 बैच के आईपीएस अधिकारी रघुवंशी ने अपने लंबे करियर में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने स्पेशल टास्क फोर्स की अगुवाई की, जिसे 1992-93 के मुंबई दंगों पर बनी श्रीकृष्ण आयोग की सिफारिशें लागू करने का जिम्मा सौंपा गया था। वे महाराष्ट्र एटीएस और ठाणे पुलिस आयुक्तालय के प्रमुख भी रहे। इसके अलावा, गढ़चिरोली में नक्सल विरोधी कमांडो फोर्स सी-60 की स्थापना में उनकी अहम भूमिका रही है।
मालेगांव ब्लास्ट मामले में इंद्रेश कुमार पर दबाव
किताब के अनुसार, 2010 में रघुवंशी को उनके कार्यकाल पूरा होने से पहले ही महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख पद से हटा दिया गया। दावा है कि UPA सरकार के एक वरिष्ठ कांग्रेसी मंत्री ने उन पर 2008 के मालेगांव ब्लास्ट मामले में आरएसएस पदाधिकारी इंद्रेश कुमार को गिरफ्तार करने का दबाव डाला। रघुवंशी ने सबूतों की कमी का हवाला देकर गिरफ्तारी से इनकार कर दिया। इसके बाद मंत्री को शक हुआ कि रघुवंशी आरोपियों से मिले हुए हैं। किताब में उल्लेख है कि एटीएस में पिछली तैनाती के दौरान रघुवंशी ने एक आरोपी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित को अधिकारियों के लिए वर्कशॉप लेने के लिए बुलाया था। उस समय पुरोहित मिलिट्री इंटेलिजेंस में थे और रघुवंशी उन्हें ट्रेनिंग के लिए उपयोगी मानते थे। बाद में पुरोहित की गिरफ्तारी के बाद उनकी एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें रघुवंशी उनका स्वागत करते दिख रहे थे, जिससे मंत्री का संदेह और गहरा गया।
किताब के अनुसार, 2010 में रघुवंशी को उनके कार्यकाल पूरा होने से पहले ही महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख पद से हटा दिया गया। दावा है कि UPA सरकार के एक वरिष्ठ कांग्रेसी मंत्री ने उन पर 2008 के मालेगांव ब्लास्ट मामले में आरएसएस पदाधिकारी इंद्रेश कुमार को गिरफ्तार करने का दबाव डाला। रघुवंशी ने सबूतों की कमी का हवाला देकर गिरफ्तारी से इनकार कर दिया। इसके बाद मंत्री को शक हुआ कि रघुवंशी आरोपियों से मिले हुए हैं। किताब में उल्लेख है कि एटीएस में पिछली तैनाती के दौरान रघुवंशी ने एक आरोपी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित को अधिकारियों के लिए वर्कशॉप लेने के लिए बुलाया था। उस समय पुरोहित मिलिट्री इंटेलिजेंस में थे और रघुवंशी उन्हें ट्रेनिंग के लिए उपयोगी मानते थे। बाद में पुरोहित की गिरफ्तारी के बाद उनकी एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें रघुवंशी उनका स्वागत करते दिख रहे थे, जिससे मंत्री का संदेह और गहरा गया।
बाल ठाकरे पर भी गिरफ्तारी का दबाव
किताब में एक पुरानी घटना का भी जिक्र है, जिसमें महाराष्ट्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने 1993 के मुंबई दंगों के संबंध में बाल ठाकरे को गिरफ्तार करने की मांग की थी। रघुवंशी ने इस दबाव का भी विरोध किया।किताब का दावा: इनकार की ‘कीमत’ चुकानी पड़ी
रघुवंशी का कहना है कि इन मामलों में राजनीतिक दबाव का विरोध करने के कारण उन्हें ट्रांसफर और पद से हटाने जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ा। हालांकि, किताब में इन आरोपों के लिए कोई प्रत्यक्ष दस्तावेजी सबूत नहीं दिए गए हैं, बल्कि यह उनके व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है।
किताब में एक पुरानी घटना का भी जिक्र है, जिसमें महाराष्ट्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने 1993 के मुंबई दंगों के संबंध में बाल ठाकरे को गिरफ्तार करने की मांग की थी। रघुवंशी ने इस दबाव का भी विरोध किया।किताब का दावा: इनकार की ‘कीमत’ चुकानी पड़ी
रघुवंशी का कहना है कि इन मामलों में राजनीतिक दबाव का विरोध करने के कारण उन्हें ट्रांसफर और पद से हटाने जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ा। हालांकि, किताब में इन आरोपों के लिए कोई प्रत्यक्ष दस्तावेजी सबूत नहीं दिए गए हैं, बल्कि यह उनके व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है।
यह खुलासा राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है, खासकर मालेगांव ब्लास्ट जैसे संवेदनशील मामलों और जांच एजेंसियों पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों के संदर्भ में। रघुवंशी 2010 के बाद सेवानिवृत्त हो चुके हैं और अब अपनी जीवनी के माध्यम से इन घटनाओं को सार्वजनिक कर रहे हैं।