• January 31, 2026

मतदाता सूची की शुद्धता पर चुनाव आयोग का कड़ा रुख: लापरवाह बीएलओ पर होगी सीधी एफआईआर, सेवा से निलंबन की भी तैयारी

नई दिल्ली: भारतीय निर्वाचन आयोग ने देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण बुनियाद, यानी ‘मतदाता सूची’ की विश्वसनीयता को लेकर अब तक का सबसे सख्त रुख अख्तियार किया है। आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता सूची की शुचिता और सटीकता से खिलवाड़ करने वाले बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) को अब किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। आयोग ने उन अधिकारियों के खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई की एक विस्तृत नियमावली जारी कर दी है, जो जानबूझकर आदेशों की अवहेलना करते हैं या जिनकी लापरवाही के कारण पात्र मतदाताओं के नाम कट जाते हैं या फर्जी प्रविष्टियां दर्ज हो जाती हैं।

निर्वाचन आयोग द्वारा राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) को भेजे गए एक उच्चस्तरीय पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि बीएलओ चुनावी मशीनरी की सबसे निचली लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। आंकड़ों के अनुसार, एक बीएलओ औसतन 970 मतदाताओं या लगभग 300 घरों के रिकॉर्ड के रखरखाव और उसे समय-समय पर अपडेट करने के लिए जिम्मेदार होता है। ऐसे में यदि जमीनी स्तर पर यह अधिकारी अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन रहता है, तो इसका सीधा असर पूरी चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर पड़ता है। आयोग का मानना है कि मतदाता सूची में जानबूझकर की गई त्रुटियां लोकतंत्र की नींव को कमजोर करती हैं, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

आयोग ने उन परिस्थितियों को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है, जिनके तहत बीएलओ पर गाज गिर सकती है। यदि कोई अधिकारी अपने कर्तव्य में बार-बार लापरवाही बरतता है, वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दिए गए वैधानिक निर्देशों की जानबूझकर अवहेलना करता है, या फिर अनुशासनहीनता और कदाचार का दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई शुरू की जाएगी। इसके अलावा, चुनाव कानूनों और नियमों के उल्लंघन के साथ-साथ ऐसी कोई भी चूक जो मतदाता सूची की सटीकता को संदिग्ध बनाती हो, उसे भी इस कार्रवाई के दायरे में रखा गया है। आयोग ने साफ किया है कि मतदाता सूची की शुचिता बनाए रखना केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि एक संवैधानिक उत्तरदायित्व है।

दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया को अब और अधिक तेज और पारदर्शी बना दिया गया है। नई व्यवस्था के तहत, जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) को यह अधिकार दिया गया है कि वह संबंधित बीएलओ को तुरंत प्रभाव से निलंबित कर सकता है। निलंबन के साथ ही डीईओ को अनुशासनात्मक प्राधिकारी को विभागीय जांच और कार्रवाई की सिफारिश भेजनी होगी। इस प्रक्रिया की सबसे अहम बात यह है कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी को इस सिफारिश पर छह महीने के भीतर अंतिम निर्णय लेना होगा और उसकी विस्तृत रिपोर्ट आयोग को सौंपनी होगी। इससे जांच प्रक्रिया में होने वाली देरी और अधिकारियों को मिलने वाले अनुचित लाभ पर लगाम लगेगी।

सिर्फ विभागीय कार्रवाई ही नहीं, बल्कि आपराधिक कदाचार की स्थिति में जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है। चुनाव आयोग ने निर्देश दिया है कि यदि किसी बीएलओ की संलिप्तता किसी बड़े फर्जीवाड़े या आपराधिक साजिश में पाई जाती है, तो जिला निर्वाचन अधिकारी, मुख्य निर्वाचन अधिकारी की अनुमति लेकर संबंधित बीएलओ के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करवा सकता है। यह कानूनी कार्रवाई जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत की जाएगी, जिसमें चुनावी कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। यह कदम उन अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है जो राजनीतिक दबाव या व्यक्तिगत लाभ के चलते मतदाता सूची में हेरफेर करते हैं।

आयोग ने राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) की शक्तियों में भी इजाफा किया है। अब सीईओ स्वतः संज्ञान लेते हुए या डीईओ की रिपोर्ट के आधार पर किसी भी बीएलओ के खिलाफ सीधी कार्रवाई का आदेश दे सकते हैं। आयोग ने यह शर्त भी लगा दी है कि एक बार शुरू हुई अनुशासनात्मक प्रक्रिया को सीईओ की पूर्व सहमति के बिना समाप्त या बंद नहीं किया जा सकेगा। इससे स्थानीय स्तर पर होने वाली भाई-भतीजावाद या राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावनाओं को खत्म किया जा सकेगा। चुनाव आयोग ने यह सुनिश्चित किया है कि हर दंडात्मक कार्रवाई का रिकॉर्ड केंद्रीय स्तर पर संधारित किया जाए।

निर्वाचन आयोग का यह कड़ा फैसला हाल के वर्षों में मतदाता सूची को लेकर उठने वाले विवादों और शिकायतों के मद्देनजर आया है। आयोग का स्पष्ट संदेश है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए एक त्रुटिहीन मतदाता सूची अनिवार्य शर्त है। अधिकारियों की जवाबदेही तय होने से न केवल मतदाता सूची की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि आम जनता का चुनाव प्रणाली पर भरोसा भी और अधिक मजबूत होगा। आयोग ने सभी राज्य सरकारों को निर्देशित किया है कि वे इन नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें ताकि भविष्य में होने वाले चुनावों में किसी भी तरह की विसंगति की गुंजाइश न रहे।

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