• January 31, 2026

माघ मेले में शंकराचार्य विवाद: प्रशासनिक कार्रवाई से गरमाई बहस, धर्माचार्यों और कथावाचकों की प्रतिक्रियाओं से मामला और संवेदनशील

प्रयागराज में चल रहे विश्व प्रसिद्ध माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच हुआ टकराव अब केवल एक प्रशासनिक विवाद न रहकर धार्मिक, सामाजिक और वैचारिक बहस का रूप ले चुका है। यह मामला अब शंकराचार्य की पदवी, संतों की गरिमा, प्रशासनिक अधिकार और सनातन परंपराओं की मर्यादा तक जा पहुंचा है। विवाद के तूल पकड़ने के बाद देश के प्रमुख धर्माचार्य, कथावाचक और योगगुरु भी इस मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखने लगे हैं।

कैसे शुरू हुआ विवाद

माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने अनुयायियों और शिष्यों के साथ संगम क्षेत्र पहुंचे थे। इसी दौरान स्नान व्यवस्था और भीड़ नियंत्रण को लेकर मेला प्रशासन और शंकराचार्य के शिविर से जुड़े लोगों के बीच कहासुनी हो गई। आरोप है कि इस दौरान साधु-संतों और ब्रह्मचारियों के साथ अभद्रता और मारपीट हुई, जिससे धार्मिक समुदाय में गहरा रोष फैल गया।

मामला यहीं नहीं रुका। टकराव के बाद मेला प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के एक आदेश का हवाला देते हुए शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी किया। नोटिस में उनसे यह स्पष्ट करने को कहा गया कि उन्होंने स्वयं को शंकराचार्य किस आधार पर घोषित किया है। इसी बिंदु पर विवाद ने और गंभीर मोड़ ले लिया।

शंकराचार्य पदवी पर उठे सवाल

प्रशासन द्वारा जारी नोटिस में यह कहा गया कि शंकराचार्य की पदवी एक संवैधानिक और ऐतिहासिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश दिए हैं। इसी आधार पर अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से उनके शंकराचार्य होने के दावे से संबंधित दस्तावेज और प्रमाण मांगे गए।

इस कार्रवाई को संत समाज के एक बड़े वर्ग ने धार्मिक परंपराओं में प्रशासनिक हस्तक्षेप बताया, जबकि प्रशासन का कहना है कि यह कदम कानून और व्यवस्था बनाए रखने की दृष्टि से जरूरी था।

स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने दिया समर्थन

गोवर्धनमठ पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज ने इस पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अपना “लाडला” बताया। माघ मेले में स्थित अपने शिविर में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि साधु-संतों के साथ मारपीट और ब्रह्मचारियों की चोटियां पकड़कर उन्हें खींचना पूरी तरह अनुचित है।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चाहे शंकराचार्य हों या कोई सामान्य साधु, सभी के साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि स्नान और अन्य धार्मिक गतिविधियों में मर्यादा का पालन सभी को करना चाहिए। उनके इस बयान को शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है।

देवकीनंदन ठाकुर की तीखी लेकिन संतुलित प्रतिक्रिया

प्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने भी इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी, हालांकि उन्होंने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की। प्रयागराज में आयोजित विराट हिंदू सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि यह स्थिति उनके लिए धर्म संकट जैसी है, क्योंकि दोनों पक्ष उनके अपने हैं।

उन्होंने कहा, “एक तरफ भगवान रूपी शंकराचार्य हैं, जिन पर टिप्पणी करना उचित नहीं है। मेरे गुरु ने मुझे बड़ों का सम्मान करना सिखाया है।” वहीं दूसरी ओर उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि प्रशासन भी लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्था की चिंता कर रहा है।

देवकीनंदन ठाकुर ने साफ शब्दों में कहा कि इस विवाद को और बढ़ाया नहीं जाना चाहिए, बल्कि आपसी संवाद से सुलझाया जाना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से अपील की कि जिन लोगों के माथे पर तिलक, सिर पर शिखा और शरीर पर भगवा हो, उनकी बात धैर्यपूर्वक सुनी जाए। साधु-संतों के साथ मारपीट किसी भी स्थिति में उचित नहीं है।

बाबा रामदेव ने एकजुटता की दी सलाह

योगगुरु बाबा रामदेव ने भी शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि तीर्थ स्थलों पर किसी भी शंकराचार्य या साधु को विवाद में नहीं पड़ना चाहिए। आपसी मतभेदों से सनातन धर्म की छवि धूमिल होती है।

रामदेव ने कहा, “हम सभी को आपस में लड़ने के बजाय सनातन धर्म की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए। आंतरिक विवादों से केवल विरोधियों को ही लाभ मिलता है।” उनका यह बयान संत समाज में शांति और समन्वय की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

प्रशासन की दलील और संत समाज की नाराजगी

मेला प्रशासन का कहना है कि उनकी प्राथमिकता श्रद्धालुओं की सुरक्षा, कानून व्यवस्था और मेले का सुचारु संचालन है। अधिकारियों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति या संस्था को नियमों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। वहीं संत समाज का एक बड़ा वर्ग इसे धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं पर आघात मान रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासनिक नियम और धार्मिक परंपराएं आमने-सामने आ रही हैं, या यह केवल संवाद की कमी का परिणाम है।

आगे क्या?

फिलहाल यह विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। नोटिस का जवाब, संभावित कानूनी प्रक्रिया और संत समाज की प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में इस मामले की दिशा तय करेगी। हालांकि अधिकांश धर्माचार्य और कथावाचक यही मानते हैं कि बातचीत और आपसी सम्मान के जरिए ही इस विवाद का समाधान संभव है।

माघ मेला, जो आध्यात्मिक शांति और समरसता का प्रतीक माना जाता है, इस विवाद के चलते सुर्खियों में है। अब यह देखना होगा कि क्या सभी पक्ष मिलकर इस मुद्दे को सुलझाते हैं या यह विवाद और गहराता है।

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