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आवारा कुत्तों का आतंक: सुप्रीम कोर्ट की गेटेड कम्युनिटी को लेकर बड़ी टिप्पणी, कहा- ‘कल कोई घर में भैंस भी ला सकता है’

नई दिल्ली: देश के विभिन्न हिस्सों में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने एक नया मोड़ ले लिया है। बुधवार को जस्टिस की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए बेहद तल्ख और महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि पशु प्रेम और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच एक संतुलन होना अनिवार्य है। विशेष रूप से ‘गेटेड कम्युनिटी’ (निजी सोसायटियों) में कुत्तों को रखने और उनके घूमने को लेकर कोर्ट ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाने का सुझाव दिया है। सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों ने अब देश भर के पशु प्रेमियों और सुरक्षा की चिंता करने वाले नागरिकों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है।

व्यक्तिगत विवेक और सामुदायिक अधिकारों के बीच संतुलन

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता वंदना जैन ने दलील दी कि देश में आवारा कुत्तों की आबादी लगभग 6.2 करोड़ तक पहुंच चुकी है और स्थिति अब नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि वे कुत्तों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा और बच्चों के प्रति बढ़ते खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब पशु प्रेम की बात होती है, तो उसमें सभी जानवर शामिल होने चाहिए, न कि केवल कुत्ते।

अदालत ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए कहा, “मैं अपने घर में कोई जानवर रखना चाहता हूं या नहीं, यह मेरा व्यक्तिगत विवेक है। लेकिन यही बात गेटेड कम्युनिटी पर भी समान रूप से लागू होती है।” कोर्ट ने तर्क दिया कि यदि किसी बंद सोसायटी में रहने वाले अधिकांश लोग असुरक्षित महसूस करते हैं, तो वहां रहने वाले अल्पसंख्यक निवासियों की इच्छा उन पर थोपी नहीं जा सकती।

‘कल कोई भैंस भी ला सकता है’: कोर्ट का तल्ख उदाहरण

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प लेकिन गंभीर उदाहरण दिया। पीठ ने कहा कि यदि किसी गेटेड कम्युनिटी में रहने वाले 90 प्रतिशत निवासियों को लगता है कि कुत्तों का खुलेआम घूमना बच्चों और बुजुर्गों के लिए खतरनाक हो सकता है, लेकिन केवल 10 प्रतिशत निवासी कुत्ता रखने या उन्हें परिसर में घुमाने पर जोर देते हैं, तो यह सामूहिक सुरक्षा का उल्लंघन है।

अदालत ने तंज कसते हुए कहा, “इस तर्क से तो कल को कोई अपनी पसंद का हवाला देकर घर में भैंस भी ला सकता है। वे कह सकते हैं कि मुझे ताजे दूध की जरूरत है और भैंस पालना मेरा अधिकार है।” कोर्ट का आशय स्पष्ट था कि किसी व्यक्ति का शौक या पशु प्रेम दूसरों की असुविधा या सुरक्षा के लिए खतरा नहीं बनना चाहिए। अदालत ने सुझाव दिया कि सोसायटियों में मतदान या बहुमत के आधार पर निर्णय लेने का कोई कानूनी प्रावधान होना चाहिए ताकि यह तय किया जा सके कि कुत्तों को परिसर में अनुमति दी जाए या नहीं।

‘मानवता आखिर है क्या’: 18 दिसंबर की सुनवाई का कड़ा रुख

यह मामला पिछले काफी समय से शीर्ष अदालत में लंबित है। इससे पहले 18 दिसंबर 2025 को हुई सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया था। उस समय दिल्ली नगर निगम (MCD) द्वारा बनाए गए कुछ कड़े नियमों को पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने ‘अमानवीय’ करार दिया था। इस पर अदालत ने बेहद सख्त लहजे में कहा था कि वे अगली सुनवाई में एक वीडियो चलाएंगे जिसमें कुत्तों के हमलों के शिकार हुए लोगों और विशेषकर बच्चों की स्थिति दिखाई जाएगी।

कोर्ट ने उस समय सवाल पूछा था कि “मानवता आखिर है क्या?” क्या मानवता केवल जानवरों के प्रति दया दिखाना है, या उन मासूमों की जान बचाना भी मानवता है जो इन हमलों का शिकार हो रहे हैं? अदालत ने स्पष्ट किया कि नियम बनाते समय उन लोगों के दर्द को भी समझना होगा जिन्होंने अपने प्रियजनों को इन हमलों में खोया है या जो जीवन भर के लिए अपंग हो गए हैं।

आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी और नियंत्रण की चुनौती

अधिवक्ता वंदना जैन ने कोर्ट को अवगत कराया कि वर्तमान में भारत में 6.2 करोड़ से अधिक आवारा कुत्ते हैं। नसबंदी और टीकाकरण के सरकारी अभियान जमीनी स्तर पर प्रभावी साबित नहीं हो रहे हैं। कई शहरों में कुत्तों के काटने की घटनाएं दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन गई हैं। विशेष रूप से बच्चों और पार्क में टहलने वाले बुजुर्गों के लिए स्थिति भयावह हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात को स्वीकार किया कि पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियमों और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच एक बड़ी खाई है। अदालत अब इस दिशा में विचार कर रही है कि क्या स्थानीय निकायों और सामुदायिक संघों (RWA) को अधिक शक्तियां दी जानी चाहिए ताकि वे अपने स्तर पर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठा सकें।

पशु प्रेम बनाम सार्वजनिक सुरक्षा की कानूनी जंग

सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों ने पशु अधिकार कार्यकर्ताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब तक कई मामलों में अदालतों ने कुत्तों को खाना खिलाने और उनके संरक्षण के पक्ष में फैसले दिए थे, लेकिन मौजूदा पीठ का झुकाव सार्वजनिक सुरक्षा की ओर अधिक दिखाई दे रहा है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी समुदाय के भीतर बहुमत की राय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यह मामला अब केवल कुत्तों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह नागरिक अधिकारों और सामुदायिक प्रबंधन के एक बड़े कानूनी प्रश्न के रूप में उभर रहा है। क्या एक सोसायटी अपने नियमों के जरिए किसी विशेष जानवर के प्रवेश को प्रतिबंधित कर सकती है? क्या मतदान के जरिए लिया गया फैसला कानूनी रूप से बाध्यकारी होगा? इन सभी सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले से स्पष्ट होंगे।

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