यूजीसी विवाद: कपिल सिब्बल का केंद्र पर तीखा हमला, बोले— ‘बिना परामर्श फैसले लेना सरकार की आदत’
नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब एक बड़े राजनीतिक और कानूनी टकराव में तब्दील हो गया है। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की कार्यशैली को आड़े हाथों लेते हुए आरोप लगाया है कि महत्वपूर्ण नीतियां बनाने से पहले संबंधित पक्षों से सलाह-मशविरा न करना इस सरकार की पहचान बन चुकी है। सिब्बल का यह बयान ऐसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के 2026 के नए नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है और उन्हें पहली नजर में ‘अस्पष्ट’ और ‘खतरनाक परिणामों वाला’ करार दिया है।
कपिल सिब्बल ने एक विशेष साक्षात्कार में अपनी बात रखते हुए कहा कि 2014 के बाद से देश में एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई है, जहां व्यापक चर्चा और लोकतांत्रिक परामर्श के बजाय सीधे फैसले थोप दिए जाते हैं। उन्होंने यूजीसी के नए विवादित नियमों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार अपने विचार किसी से साझा नहीं करती और यही कारण है कि उच्च शिक्षण संस्थानों से जुड़े संवेदनशील फैसलों को भी बिना किसी पूर्व विमर्श के लागू करने की कोशिश की जाती है। सिब्बल ने चेतावनी दी कि यदि समाज के किसी भी वर्ग, विशेषकर हाशिए पर रहने वाले समुदायों को नजरअंदाज कर नीतियां बनाई जाती हैं, तो यह न केवल समाज के लिए बल्कि देश के भविष्य के लिए भी आत्मघाती साबित होगा।
यूजीसी के जिन नियमों पर यह पूरा बवाल मचा है, उन्हें 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया था। इन नए नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए एक ‘संसदीय कमेटी’ बनाना अनिवार्य कर दिया गया है, जिसका मुख्य कार्य परिसर में होने वाले भेदभाव की शिकायतों की जांच करना और समानता को बढ़ावा देना है। हालांकि सरकार का तर्क है कि इन समितियों में ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग और महिलाओं के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा, लेकिन विपक्षी नेताओं और छात्र संगठनों का आरोप कुछ और ही है। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि नए नियमों में ‘जाति आधारित भेदभाव’ की परिभाषा को बेहद सीमित कर दिया गया है, जिससे भेदभाव करने वालों को बचने का रास्ता मिल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए नियमों पर रोक लगा दी है और इसे समाज के ताने-बाने पर खतरनाक असर डालने वाला बताया है। अदालत ने केंद्र सरकार और यूजीसी से 19 मार्च तक इस पर विस्तृत जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने माना है कि याचिकाओं में कानून से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं, जिनकी गहन न्यायिक समीक्षा अनिवार्य है। सिब्बल ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत जैसा विविध देश तभी विकसित बन सकता है जब नीतियां समावेशी हों। उन्होंने स्पष्ट किया कि समाज में विभाजन पैदा करने वाली किसी भी कोशिश का परिणाम देशहित में नहीं होगा।
कपिल सिब्बल ने इस दौरान केवल शिक्षा जगत ही नहीं, बल्कि सूचना के अधिकार (RTI) पर मंडराते संकट की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने आर्थिक सर्वेक्षण में आरटीआई कानून की समीक्षा की बात कहे जाने पर गहरी चिंता जताई। सिब्बल के अनुसार, आरटीआई लोकतंत्र का एक बुनियादी अधिकार है जो नागरिकों को सरकार के कामकाज की पारदर्शिता और जवाबदेही जांचने की शक्ति प्रदान करता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस अधिकार को सीमित करने या इसकी समीक्षा के नाम पर इसे कमजोर करने का प्रयास किया गया, तो यह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई और लोकतांत्रिक मूल्यों को बड़ा नुकसान पहुंचाएगा।
दूसरी ओर, सरकार इस विवाद को शांत करने की कोशिश में जुटी है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने छात्र संगठनों के विरोध प्रदर्शनों के बीच भरोसा दिलाया है कि सरकार किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव नहीं होने देगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन नियमों का उद्देश्य परिसरों को सुरक्षित और समावेशी बनाना है और इनके दुरुपयोग को रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाएंगे। हालांकि, शिक्षा मंत्री के आश्वासनों के बावजूद देशभर के विश्वविद्यालयों में छात्र संगठनों का विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूजीसी और आरटीआई जैसे मुद्दों पर कपिल सिब्बल का यह हमला विपक्ष की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत सरकार को ‘अधिनायकवादी निर्णय प्रक्रिया’ के घेरे में खड़ा किया जा रहा है। 13 जनवरी के नोटिफिकेशन के बाद से ही अकादमिक जगत में यह बहस तेज है कि क्या ये नई समितियां स्वायत्त संस्थानों के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप का जरिया बनेंगी या वास्तव में समानता का मार्ग प्रशस्त करेंगी। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद यह मामला अब पूरी तरह से कानूनी पेचीदगियों और संवैधानिक व्याख्याओं के बीच उलझा हुआ है।
अब सबकी नजरें 19 मार्च को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार को यह साबित करना होगा कि उसके द्वारा लाए गए नियम संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल हैं। तब तक, कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ नेताओं की ये टिप्पणियां देश में नीतियों के निर्माण में पारदर्शिता और परामर्श की कमी के मुद्दे को गरमाए रखेंगी।