T-Dome Vs Iron Dome: ताइवान का T-Dome बना चीन की चिंता की नई वजह, जानिए क्यों इसे इजरायल के आयरन डोम से बेहतर बताया जा रहा है।
चीन (China) और ताइवान (Taiwan) के बीच चल रहे भू-राजनीतिक तनाव के बीच, ताइवान ने अपनी रक्षा क्षमताओं को अभूतपूर्व स्तर पर ले जाने का ऐलान किया है। ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते (Lai Ching-te) ने देश की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी रक्षा प्रणाली ‘टी-डोम’ (T-Dome) की घोषणा की है। इस अत्याधुनिक प्रणाली की तुलना इजरायल (Israel) की प्रसिद्ध ‘आयरन डोम’ (Iron Dome) से की जा रही है, लेकिन यह मिसाइलों, ड्रोनों, लड़ाकू विमानों और साइबर हमलों तक—हर दिशा से ताइवान की रक्षा करने वाला एक मल्टी-लेयर एयर-डिफेंस सिस्टम होगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि 40 बिलियन डॉलर से अधिक के बजट वाली यह परियोजना चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के किसी भी संभावित हमले को रोकने में रणनीतिक ‘गेमचेंजर’ साबित होगी। तो चलिए जानते हैं इस तकनीक और इसके महत्व के बारे में…
चीन का सैन्य दबाव और नई सुरक्षा की जरूरत
एशिया-प्रशांत क्षेत्र (Asia-Pacific Region) में ताइवान (Taiwan) लंबे समय से चीन (China) के सैन्य दबाव का सामना कर रहा है। चीन ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है और लगातार सैन्य अभ्यास तथा धमकियों के माध्यम से अपनी संप्रभुता स्थापित करने की कोशिश करता है। पिछले कुछ वर्षों में चीन की सेना (PLA) ने ताइवान के एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन ज़ोन (ADIZ) में लड़ाकू विमानों के प्रवेश की घटनाओं को तेज कर दिया है, जिससे युद्ध का खतरा अधिक वास्तविक हो गया है। ताइवान, जो एक लोकतांत्रिक और स्वतंत्र द्वीप है, अपनी सुरक्षा को मजबूत करने के लिए तेजी से रक्षा आधुनिकीकरण (Defense Modernization) पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इस अनिश्चित माहौल में, ‘टी-डोम’ (T-Dome) का विकास आत्मरक्षा (Self-Defense) के लिए एक नई, तकनीक-आधारित सुरक्षा प्रणाली की तत्काल आवश्यकता को दर्शाता है।
क्या है ताइवान का ‘T-Dome’ सिस्टम?
राष्ट्रपति लाई चिंग-ते (Lai Ching-te) ने ‘टी-डोम’ (T-Dome) को ताइवान का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा प्रोजेक्ट बताया है। यह एक साधारण डिफेंस सिस्टम नहीं, बल्कि एक मल्टी-लेयर एयर-डिफेंस सिस्टम (Multi-Layer Air-Defense System) होगा।
| विशेषता | विवरण |
| सुरक्षा कवरेज | मिसाइलों (क्रूज और बैलिस्टिक), ड्रोनों, फाइटर जेट्स और साइबर अटैक्स तक |
| तकनीक | अत्याधुनिक रडार, सैटेलाइट-आधारित मॉनिटरिंग और AI-आधारित इंटरसेप्शन सिस्टम |
| उद्देश्य | हमले से पहले चेतावनी, रियल-टाइम इंटरसेप्शन, और दुश्मन के हथियारों को हवा में नष्ट करना |
| बजट | 40 बिलियन डॉलर से अधिक का प्रस्तावित निवेश |
| तुलना | इजरायल के आयरन डोम से अधिक व्यापक और जटिल |
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह प्रणाली आने वाले वर्षों में ताइवान की सुरक्षा रणनीति की रीढ़ (Backbone) बनेगी, जो देश को चीन के सैन्य दबाव से बचाने के लिए एक शक्तिशाली ढाल प्रदान करेगी।
चीन को रणनीतिक संदेश
सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि ‘टी-डोम’ (T-Dome) का ऐलान महज एक रक्षा परियोजना नहीं है, बल्कि चीन (China) को यह रणनीतिक संदेश देने का भी एक तरीका है कि ताइवान किसी भी हमले का मुकाबला करने के लिए तैयार है। ताइपे (Taipei) स्थित सुरक्षा विशेषज्ञ जे. माइकल कोल (J. Michael Cole) ने कहा कि, जहां इजरायल का आयरन डोम मुख्य रूप से कम दूरी के रॉकेटों को रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया है, वहीं टी-डोम को “कई गुना व्यापक खतरों” को रोकने के लिए विकसित किया जा रहा है। इसमें अत्याधुनिक रडार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित इंटरसेप्शन तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने स्पष्ट किया है कि चीन के लगातार बढ़ते सैन्य दबाव को देखते हुए टी-डोम की तैनाती में तेजी लाई जाएगी, जिससे यह परियोजना देश की सुरक्षा के लिए और भी आवश्यक हो जाती है।
2027 से पहले पूरा होना मुश्किल
ताइवान (Taiwan) ने भले ही टी-डोम (T-Dome) परियोजना की शुरुआत कर दी है, लेकिन यह एक विशाल निवेश और उच्च स्तरीय इंजीनियरिंग का प्रोजेक्ट है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि पूरी प्रणाली को 2027 (Year 2027) से पहले पूरी तरह से संचालित (Fully Operational) कर पाना मुश्किल होगा। ताइवान सरकार इस समय रडार अपग्रेड (Radar Upgrade), मिसाइल इंटरसेप्टर विकास (Missile Interceptor Development), साइबर डिफेंस इन्फ्रास्ट्रक्चर (Cyber Defence Infrastructure) और कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम (Command-and-Control System) पर तेजी से काम कर रही है। चीन लगातार चेतावनी दे रहा है कि ताइवान को किसी “बाहरी सुरक्षा व्यवस्था” पर निर्भर नहीं होना चाहिए, लेकिन ताइवान ने इसे अपने नागरिकों और लोकतांत्रिक व्यवस्था की सुरक्षा के लिए अत्यावश्यक कदम बताया है। आने वाले वर्षों में, टी-डोम एशिया-प्रशांत (Asia-Pacific) क्षेत्र की सुरक्षा रणनीतियों में बड़ा बदलाव ला सकता है।