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सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषित नदियों पर स्वतः संज्ञान कार्यवाही बंद की, NGT को सौंपी निगरानी की जिम्मेदारी

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश की प्रदूषित नदियों, खासकर यमुना नदी में बढ़ते प्रदूषण के मुद्दे पर 2021 में शुरू की गई अपनी स्वतः संज्ञान (suo motu) कार्यवाही को समाप्त कर दिया है। कोर्ट ने इस मामले की निगरानी और अनुपालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) को सौंप दी है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि एक ही विषय पर अलग-अलग और समानांतर कार्यवाहियां चलने से निर्देशों की निरंतरता और एकरूपता प्रभावित हो रही थी। इसलिए बेहतर होगा कि NGT इस मामले को फिर से खोले और अनुपालन की प्रभावी निगरानी करे।
पीठ ने याद दिलाया कि अदालत ने यमुना नदी में बढ़ते प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लेते हुए दायरा बढ़ाकर देश की अन्य नदियों में सीवेज के निर्वहन के मुद्दे को भी शामिल किया था। इस दौरान उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली तथा केंद्र सरकार को नोटिस जारी किए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि स्वच्छ और गरिमापूर्ण वातावरण में जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है।
बिना शोधन का सीवेज नदियों में नहीं छोड़ा जाएअदालत ने स्पष्ट किया कि जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड वैधानिक रूप से बाध्य हैं कि वे यह सुनिश्चित करें कि बिना शोधन (ट्रीटमेंट) के सीवेज नदियों में न छोड़ा जाए।
कोर्ट ने कहा कि NGT को न्यायिक और अर्ध-न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं, जो ऐसे पर्यावरणीय मामलों की प्रभावी निगरानी कर सकती है। मुख्य न्यायाधीश ने जोर दिया कि केवल निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्थिति रिपोर्ट के माध्यम से निरंतर निगरानी भी जरूरी है।
पीठ ने माना कि समानांतर स्वतः
संज्ञान कार्यवाही जारी रखने के बजाय NGT द्वारा अनुपालन की निगरानी अधिक उपयुक्त और प्रभावी होगी। साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस फैसले से अपीलीय उपाय और न्यायिक पुनरावलोकन के अधिकार यथावत बने रहेंगे।यह निर्णय प्रदूषित नदियों की सफाई और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों में NGT की भूमिका को और मजबूत करता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने समानांतर सुनवाई से बचने का रास्ता अपनाया है।

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