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KGMU में टकराव के आसार: कुलपति कार्यालय में तोड़फोड़ और FIR न होने से डॉक्टरों में भारी आक्रोश, आज हो सकता है कार्य बहिष्कार का एलान

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी स्थित प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) इस समय एक गंभीर प्रशासनिक और सुरक्षा संकट के दौर से गुजर रहा है। पिछले शुक्रवार को विश्वविद्यालय परिसर में हुए भारी हंगामे, प्रदर्शन और कथित तोड़फोड़ के मामले में अब तक पुलिस द्वारा प्राथमिकी (FIR) दर्ज न किए जाने से चिकित्सा जगत में गहरा असंतोष व्याप्त है। केजीएमयू के शिक्षकों, कर्मचारियों और रेजिडेंट डॉक्टरों ने इस देरी को संस्थान की गरिमा और सुरक्षा पर हमला करार दिया है। आज यानी सोमवार को विभिन्न संगठनों की एक उच्च-स्तरीय बैठक बुलाई गई है, जिसमें सामूहिक आंदोलन और स्वास्थ्य सेवाओं के बहिष्कार जैसा बड़ा फैसला लिया जा सकता है।

शुक्रवार के हंगामे की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

विवाद की शुरुआत पिछले शुक्रवार को हुई, जब धर्मांतरण और यौन शोषण के एक कथित मामले को लेकर राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव केजीएमयू पहुंची थीं। उनके पहुंचने के साथ ही बड़ी संख्या में उनके समर्थक और विभिन्न हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता भी परिसर में दाखिल हो गए। आरोप है कि इन बाहरी तत्वों ने कुलपति कार्यालय के बाहर जमकर नारेबाजी की और करीब तीन घंटे तक कार्यालय को अपने कब्जे में रखा।

विश्वविद्यालय प्रशासन का दावा है कि इस विरोध प्रदर्शन के दौरान स्थिति अनियंत्रित हो गई और प्रदर्शनकारियों ने कार्यालय में तोड़फोड़ की। इस अफरा-तफरी के बीच संस्थान के कामकाज में भारी बाधा आई और कुलपति का सीयूजी (CUG) मोबाइल फोन भी कहीं गुम या चोरी हो गया। चीफ प्रॉक्टर प्रो. आरएएस कुशवाहा ने घटना की गंभीरता को देखते हुए शुक्रवार को ही पुलिस को लिखित तहरीर दे दी थी, लेकिन तीन दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज न किए जाने ने आग में घी डालने का काम किया है।

डॉक्टरों और कर्मचारी संघों की ‘आर-पार’ की लड़ाई

एफआईआर दर्ज होने में हो रही देरी को लेकर केजीएमयू शिक्षक संघ और कर्मचारी परिषद ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। केजीएमयू शिक्षक संघ के अध्यक्ष प्रो. केके सिंह ने स्पष्ट किया है कि एक शिक्षण और चिकित्सा संस्थान के भीतर इस तरह की गुंडागर्दी और तोड़फोड़ को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि जब संस्थान के सर्वोच्च कार्यालय पर हमला हुआ है और तहरीर देने के बावजूद पुलिस मौन है, तो ऐसे में सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?

सोमवार को होने वाली इस बैठक में शिक्षक संघ, रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (RDA) और कर्मचारी संघ के पदाधिकारी शामिल होंगे। माना जा रहा है कि यदि दोपहर तक पुलिस की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो डॉक्टर ओपीडी (OPD) और अन्य गैर-आपातकालीन सेवाओं के बहिष्कार का एलान कर सकते हैं। चिकित्साकर्मियों का कहना है कि वे मरीजों को परेशान नहीं करना चाहते, लेकिन काम करने के सुरक्षित माहौल की मांग करना उनका मौलिक अधिकार है।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम और एलआईयू की सक्रियता

केजीएमयू में संभावित आंदोलन और तनावपूर्ण माहौल को देखते हुए सोमवार सुबह से ही परिसर में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। जिला प्रशासन किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए हाई अलर्ट पर है। स्थानीय खुफिया इकाई (LIU) के अधिकारी भी परिसर में सादे कपड़ों में तैनात हैं और विभिन्न समूहों की गतिविधियों पर पैनी नजर रख रहे हैं।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि वे मामले की जांच कर रहे हैं और तहरीर के आधार पर साक्ष्यों का मिलान किया जा रहा है। हालांकि, डॉक्टरों का आरोप है कि राजनीतिक दबाव के कारण पुलिस कार्रवाई करने से कतरा रही है। परिसर के मुख्य द्वारों और कुलपति कार्यालय के आसपास बैरिकेडिंग कर दी गई है ताकि बाहरी तत्वों के प्रवेश को रोका जा सके।

स्वास्थ्य सेवाओं पर मंडराता संकट

यदि केजीएमयू के डॉक्टर और कर्मचारी आज हड़ताल पर जाते हैं, तो इसका सीधा असर उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्यों से आने वाले हजारों मरीजों पर पड़ेगा। केजीएमयू न केवल लखनऊ बल्कि पूरे उत्तर भारत का एक प्रमुख चिकित्सा केंद्र है, जहाँ हर दिन ओपीडी में 5,000 से अधिक मरीज आते हैं। सर्जरी से लेकर गंभीर रोगों के इलाज तक, सब कुछ ठप होने की आशंका है।

अस्पताल प्रशासन ने हालांकि वैकल्पिक व्यवस्था करने की बात कही है, लेकिन रेजिडेंट डॉक्टरों के बिना सेवाओं को सुचारू रूप से चलाना लगभग असंभव होगा। अब सबकी नजरें दोपहर में होने वाली संगठनों की बैठक पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि केजीएमयू में सफेद कोट वाले ये रक्षक स्टेथोस्कोप संभालेंगे या विरोध की तख्तियां।

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