महरंग बलोच को उम्रकैद, बलूचिस्तान में भड़का विरोध; 24 जून को शटर डाउन हड़ताल का ऐलान
इस्लामाबाद/क्वेटा: पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. महरंग बलोच को आतंकवाद-रोधी अदालत द्वारा उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए हैं। इस फैसले के खिलाफ पूरे क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं और कई जगहों पर लोग सड़कों पर उतर आए हैं। क्वेटा की एक आतंकवाद-रोधी अदालत ने महरंग बलोच के साथ उनके दो सहयोगियों सिबगतुल्लाह बलोच और बालोच कादिर को भी उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने उन्हें एक विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा में फ्रंटियर कॉर्प्स के एक अधिकारी की मौत के मामले में दोषी ठहराया है।
फैसले के खिलाफ उग्र विरोध
इस फैसले के बाद बलूच यकजेहती कमेटी (BYC) ने कड़ा विरोध जताया है और इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया है। संगठन ने आरोप लगाया है कि मामले में कई कानूनी खामियां हैं और एफआईआर में भी विसंगतियां मौजूद हैं। फैसले के विरोध में बलूचिस्तान के कई इलाकों में प्रदर्शन हुए हैं और 24 जून को पूरे प्रांत में शटर डाउन हड़ताल का ऐलान किया गया है। व्यापारियों, छात्रों, ट्रांसपोर्टरों और सामाजिक संगठनों से इस बंद को समर्थन देने की अपील की गई है।
कौन हैं महरंग बलोच?
डॉ. महरंग बलोच बलूचिस्तान की प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता और डॉक्टर हैं, जिन्होंने क्षेत्र में कथित जबरन गायब किए जाने, गैर-न्यायिक हत्याओं और मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ लगातार आवाज उठाई है। वह बलूच यकजेहती कमेटी की प्रमुख नेता भी हैं। उनका निजी जीवन संघर्षों से भरा रहा है। 2009 में उनके पिता का कथित तौर पर अपहरण कर हत्या कर दी गई थी, उस समय वह मात्र 16 वर्ष की थीं। 2016 में उनके भाई को भी अगवा किया गया था, जिसके बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया।
अंतरराष्ट्रीय पहचान और विवाद
महरंग बलोच को उनके शांतिपूर्ण आंदोलनों और मानवाधिकार अभियानों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। वहीं, आलोचकों का कहना है कि उनके खिलाफ कार्रवाई राजनीतिक असहमति को दबाने का प्रयास है। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब बलूचिस्तान लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। क्षेत्र में राष्ट्रवादी आंदोलनों और राज्य तंत्र के बीच तनाव लगातार बना हुआ है।
सरकार का पक्ष
पाकिस्तानी सरकार का कहना है कि अदालत ने स्वतंत्र रूप से निर्णय दिया है और यह सजा ठोस सबूतों के आधार पर सुनाई गई है। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने इस फैसले की आलोचना की है और इसे लोकतांत्रिक स्वतंत्रता पर हमला बताया है। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस मामले पर नजर बनी हुई है और आने वाले दिनों में कानूनी अपील और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना है।