बाबू जगजीवन राम जयंती: दलित नेता से प्रधानमंत्री पद के दावेदार तक, लेकिन एक विवाद ने बदल दी राजनीति की दिशा
नई दिल्ली: देश के पहले दलित उप-प्रधानमंत्री रहे बाबू जगजीवन राम की आज जयंती है। उनका जन्म 5 अप्रैल 1908 को बिहार के आरा जिले के चंदवा गांव में हुआ था। वे स्वतंत्रता सेनानी, संविधान सभा के सदस्य, केंद्रीय मंत्री और देश के रक्षा मंत्री जैसे कई अहम पदों पर रहे।
प्रधानमंत्री बनने का मौका क्यों छूट गया?
1979 में मोरारजी देसाई के इस्तीफे के बाद बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे। राजनीतिक गलियारों में यह भी माना जाता था कि इंदिरा गांधी और चरण सिंह भी उनकी बढ़ती ताकत से भली-भांति परिचित थे।
लेकिन इसी दौरान उनके बेटे सुरेश राम से जुड़ा एक विवाद सामने आया, जिसने उनकी छवि को बड़ा झटका दिया।
क्या था विवाद?
बताया जाता है कि सुरेश राम की एक कॉलेज छात्रा के साथ निजी तस्वीरें सार्वजनिक हो गई थीं। इन तस्वीरों को मेनका गांधी द्वारा प्रकाशित पत्रिका सूर्या में छापा गया। उस समय यह खबर अन्य मीडिया में सीमित रही, लेकिन सूर्या में तस्वीरें प्रकाशित होने के बाद यह मामला तेजी से फैल गया।
तस्वीरों के सार्वजनिक होने से राजनीतिक माहौल में हड़कंप मच गया और इसका सीधा असर बाबू जगजीवन राम की साख पर पड़ा।
छवि पर असर और राजनीतिक नुकसान
पत्रिका में यह भी दावा किया गया कि सुरेश राम पहले से शादीशुदा थे और जिस युवती के साथ उनकी तस्वीरें सामने आईं, उसकी उम्र काफी कम थी। इस विवाद ने बाबू जगजीवन राम की राजनीतिक संभावनाओं को कमजोर कर दिया और उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना अधूरा रह गया।
बताया जाता है कि इस मामले पर उन्होंने अपने करीबी कृष्णकांत से कहा था—
“एक और बेटे ने अपने बाप को डुबो दिया।”
किताबों में भी दर्ज है यह घटना
इस पूरे प्रकरण का जिक्र वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी की किताब How Prime Ministers Decide में मिलता है। वहीं खुशवंत सिंह ने भी अपनी आत्मकथा Truth, Love and a Little Malice में इस घटना का उल्लेख किया है।
निधन और विरासत
6 जुलाई 1986 को 78 वर्ष की उम्र में बाबू जगजीवन राम का निधन हो गया। उन्होंने अपने जीवन में सामाजिक न्याय, समानता और राजनीति में दलितों की भागीदारी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज भी उन्हें भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है।