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मदुरै हाईकोर्ट का अहम फैसला: ‘नो कास्ट, नो रिलीजन’ प्रमाण पत्र के लिए पहले औपचारिक रूप से त्यागना होगा धर्म

मदुरै: तमिलनाडु की मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने ‘नो कास्ट, नो रिलीजन‘ (जाति नहीं, धर्म नहीं) प्रमाण पत्र से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिससे अब कानूनी और सामाजिक बहस छिड़ सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा प्रमाण पत्र प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्ति को पहले औपचारिक रूप से अपना धर्म त्यागना होगा।
याचिका का आधारयाचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि उसके माता-पिता हिंदू हैं, लेकिन वह अधिकारियों से एक ऐसा प्रमाण पत्र चाहता है जिसमें जाति या धर्म का कोई उल्लेख न हो। वह ‘नो कास्ट, नो रिलीजन’ प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करना चाहता था। तहसीलदार ने उसके आवेदन को खारिज कर दिया था, जिसके खिलाफ याचिका दायर की गई थी।कोर्ट का फैसला और तर्कन्यायमूर्ति कृष्णन रामासामी की एकल पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत विवेक की स्वतंत्रता में न केवल धर्म अपनाने का अधिकार है, बल्कि धर्म त्यागने का भी अधिकार शामिल है। लेकिन प्रमाण पत्र जारी करने से पहले इस त्याग को औपचारिक रूप से दर्ज करना जरूरी है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या उसने अपना धर्म त्याग दिया है। याचिकाकर्ता ने नकारात्मक जवाब दिया। न्यायमूर्ति ने टिप्पणी की, “जब तक याचिकाकर्ता हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अपना धर्म त्याग नहीं देता, तब तक जाति और धर्म को छोड़कर प्रमाण पत्र जारी करने का अनुरोध विचारणीय नहीं है।” कोर्ट ने यह भी कहा कि धर्म त्याग का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है।
तहसीलदार के आदेश पर क्या हुआ?कोर्ट ने तहसीलदार के आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया और रिट याचिका खारिज कर दी। हालांकि, याचिकाकर्ता को स्वतंत्रता दी गई कि वह अपना धर्म त्याग कर प्रमाण प्रस्तुत कर नया आवेदन कर सकता है। जस्टिस ने कहा कि यदि त्याग के प्रमाण के साथ नया आवेदन किया जाता है, तो अधिकारी उस पर विचार कर सकते हैं।
फैसले का महत्वयह फैसला ‘नो कास्ट, नो रिलीजन’ प्रमाण पत्र की मांग करने वालों के लिए एक शर्त तय करता है। इससे पहले मद्रास हाईकोर्ट ने ऐसे प्रमाण पत्र जारी करने के पक्ष में कई फैसले दिए थे, लेकिन इस मामले में औपचारिक धर्म त्याग को अनिवार्य बताया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक प्रक्रियाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है।
यह मामला जाति-धर्म मुक्त पहचान की मांग को लेकर चल रही बहस में नया मोड़ ला सकता है।

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