मणिपुर: निर्माणाधीन सरकारी स्कूल गिराने के आरोप में भाजपा विधायक एल सुसिंद्रो मैतेई पर एफआईआर, बढ़ी राजनीतिक हलचल
इंफाल: मणिपुर के इंफाल ईस्ट जिले से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक पर निर्माणाधीन सरकारी स्कूल की इमारत को ढहाने का गंभीर आरोप लगा है। खुराई विधानसभा क्षेत्र से विधायक एल सुसिंद्रो मैतेई के खिलाफ पुलिस ने प्राथमिकी (FIR) दर्ज की है। आरोप है कि विधायक के सीधे निर्देशों पर एक खुदाई मशीन (Excavator) का उपयोग करके सरकारी धन से बन रहे शैक्षणिक ढांचे को जमींदोज कर दिया गया। यह घटना न केवल कानूनी विवाद का विषय बन गई है, बल्कि इसने राज्य की कानून व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
घटना का विवरण और शिकायतकर्ता के गंभीर आरोप
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, यह पूरा विवाद इंफाल ईस्ट जिले के खुरई हाइग्रुमाखोंग इलाके में स्थित एक जूनियर हाई स्कूल से जुड़ा है। इस मामले में औपचारिक शिकायत स्कूल परिसर के साइट सुपरवाइजर कोंसाम संतोष मैतेई द्वारा दर्ज कराई गई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि 18 जनवरी को विधायक के समर्थकों और उनके द्वारा निर्देशित लोगों ने निर्माण स्थल पर पहुंचकर आतंक मचाया और निर्माणाधीन ढांचे को एक भारी मशीन की मदद से गिरा दिया।
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि यह कोई अचानक हुई घटना नहीं थी। आरोप है कि विधायक एल सुसिंद्रो मैतेई कुछ समय पहले भी निर्माण स्थल पर आए थे और उन्होंने वहां चल रहे काम को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। उस दौरान उन्होंने निर्माण कार्य को तुरंत रोकने की चेतावनी दी थी और स्पष्ट शब्दों में कहा था कि यदि उनकी बात नहीं मानी गई और निर्माण जारी रहा, तो वे पूरी इमारत को गिरवा देंगे। सुपरवाइजर के अनुसार, विधायक की उस धमकी को 18 जनवरी को हकीकत में बदल दिया गया, जिससे सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा है।
कानूनी कार्रवाई: आपराधिक धाराओं के तहत मामला दर्ज
इस हाई-प्रोफाइल मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मणिपुर पुलिस ने विधायक के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। पुलिस ने इस मामले में आईपीसी (अब भारतीय न्याय संहिता के प्रासंगिक प्रावधानों) के तहत आपराधिक अतिक्रमण, घर में अवैध प्रवेश और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया है। इसके अतिरिक्त, सबसे महत्वपूर्ण रूप से ‘सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम, 1984’ की धाराएं भी जोड़ी गई हैं, जो विशेष रूप से सरकारी संसाधनों को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ लगाई जाती हैं।
एफआईआर में एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी दर्ज है कि विधायक ने कथित तौर पर इस कार्रवाई को छिपाने के बजाय इसका सार्वजनिक रूप से समर्थन किया है। शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि विधायक ने स्थानीय समाचार पत्रों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से यह स्वीकार किया कि निर्माणाधीन ढांचे को गिराने का आदेश उन्होंने ही दिया था। पुलिस अब इन डिजिटल साक्ष्यों और अखबारों की कतरनों की जांच कर रही है ताकि अदालत में विधायक की संलिप्तता को पुख्ता तौर पर साबित किया जा सके।
सरकारी फंड और केंद्र की योजना पर प्रहार
यह विवाद केवल एक इमारत के गिरने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी धन के दुरुपयोग और केंद्रीय योजनाओं के उल्लंघन का भी मामला है। जांच में सामने आया है कि इस जूनियर हाई स्कूल का निर्माण ‘नॉर्थ ईस्टर्न स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट स्कीम’ (NESIDS) के तहत किया जा रहा था। यह एक महत्वपूर्ण केंद्रीय योजना है, जिसे नॉर्थ ईस्टर्न काउंसिल (NEC) द्वारा वित्तपोषित किया जाता है। मणिपुर सरकार का शिक्षा इंजीनियरिंग विंग (Education Engineering Wing) इस परियोजना के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार था।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि यह परियोजना एक तय प्रशासनिक प्रक्रिया और तकनीकी स्वीकृति के बाद शुरू की गई थी, इसलिए किसी भी व्यक्ति, चाहे वह विधायक ही क्यों न हो, उसे इसे गिराने का कानूनी अधिकार नहीं है। बिना किसी आधिकारिक आदेश या प्रशासनिक अनुमति के सरकारी ढांचे को गिराना न केवल वित्तीय अपराध है, बल्कि यह राज्य की विकास प्रक्रिया में सीधे तौर पर बाधा डालने जैसा है। इस घटना से सरकारी खजाने को जो चपत लगी है, उसकी भरपाई कैसे होगी, यह भी एक बड़ा प्रश्न है।
मणिपुर की राजनीति और प्रशासन के सामने चुनौतियां
एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि पर सरकारी संपत्ति को नष्ट करने का आरोप लगना मणिपुर की राजनीति में एक नया भूचाल लेकर आया है। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है, उनका कहना है कि अगर सत्तापक्ष के विधायक ही सरकारी संपत्तियों को सुरक्षित नहीं रहने देंगे, तो राज्य में विकास कैसे संभव होगा। इस मामले ने प्रशासनिक हलकों में भी असहज स्थिति पैदा कर दी है, क्योंकि एक तरफ सरकारी विभाग निर्माण कर रहा था और दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के विधायक ने उसे अवैध मानकर या किसी अन्य व्यक्तिगत कारण से गिरवा दिया।
पुलिस सूत्रों का कहना है कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और सभी आवश्यक साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। निर्माण स्थल के आसपास के गवाहों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं और जिस खुदाई मशीन का उपयोग तोड़फोड़ में किया गया था, उसके मालिक और ऑपरेटर की भी पहचान की जा रही है। पुलिस ने इस संभावना से भी इनकार नहीं किया है कि आने वाले दिनों में विधायक एल सुसिंद्रो मैतेई को पूछताछ के लिए तलब किया जा सकता है।
निष्कर्ष और भविष्य की राह
मणिपुर में पहले से ही व्याप्त भू-राजनीतिक और सामाजिक तनाव के बीच इस तरह की घटनाएं प्रशासन की विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं। एक निर्माणाधीन स्कूल, जो भविष्य में बच्चों के लिए शिक्षा का मंदिर बनने वाला था, उसे राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की भेंट चढ़ा देना बेहद चिंताजनक है। क्या विधायक के पास इस ढांचे को गिराने का कोई वैध तर्क था, या यह विशुद्ध रूप से सत्ता का दुरुपयोग था, यह तो गहन जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा।
फिलहाल, इंफाल ईस्ट का यह मामला अब राज्य की राजनीति का केंद्र बिंदु बन चुका है। क्या भाजपा अपने विधायक के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगी या पुलिस निष्पक्षता से जांच को अंजाम दे पाएगी, इस पर पूरे प्रदेश की जनता की नजरें टिकी हुई हैं। यह केस भविष्य में इस बात का उदाहरण बनेगा कि क्या कानून एक आम नागरिक और एक शक्तिशाली विधायक के लिए समान रूप से काम करता है या नहीं।