पुलवामा हमले की 7वीं बरसी: शहीद पंकज त्रिपाठी के छोटे भाई ने बताया परिवार का दर्द, बच्चों का सपना और आखिरी विदाई की वो बात
महाराजगंज (उत्तर प्रदेश): आज 14 फरवरी 2026 को पुलवामा आतंकी हमले की 7वीं बरसी है। 14 फरवरी 2019 को जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमले में CRPF के 40 जवान शहीद हो गए थे। इनमें महाराजगंज जिले के त्रिपाठी परिवार के लाल कॉन्स्टेबल पंकज त्रिपाठी भी शामिल थे। तिरंगे में लिपटकर जब वे अंतिम बार घर लौटे, तो पीछे छोड़ गए थे तीन महीने की अजन्मी बेटी, तीन साल का बेटा, पत्नी और बुजुर्ग माता-पिता।
शहीद पंकज की मां इस सदमे को सहन नहीं कर पाईं और एक साल बाद ही ब्रेन हैमरेज से उनका भी निधन हो गया। आज उनके छोटे भाई शुभम त्रिपाठी ने से एक्सक्लूसिव बातचीत में भाई की यादों, आखिरी विदाई, परिवार के संघर्ष और बच्चों के सपनों की दास्तां सुनाई।
मुख्य अंश शुभम त्रिपाठी की बातचीत से:
- बचपन की यादें और CRPF जॉइन करने का फैसला
“भैया का बचपन से ही फौज में जाने का सपना था। हमारे पिताजी भी फौज में थे। वर्दी देखकर उनका जोश और बढ़ जाता था। घर में सबको गर्व था। वे परिवार के सबसे जिम्मेदार इंसान थे।” - छुट्टियों में सबसे पसंदीदा काम
“जब छुट्टी पर आते थे, तो सबसे पहले खेत देखने जाते थे। चाहे छुट्टी 10 दिन की हो या एक महीने की, वे सभी रिश्तेदारों से मिलते-जुलते थे।” - आखिरी विदाई की बात
“जब वे आखिरी बार ड्यूटी पर जा रहे थे, तो बस इतना कहा – ‘मैं तो जा रहा हूं, तुम परिवार का ध्यान रखना। अब जिम्मेदारी तुम्हारी है। पिताजी, अम्मा, सबका ख्याल रखना।’” - 14 फरवरी 2019 की वो रात
“मैं तब गोरखपुर के हॉस्टल में था। भैया 4-5 दिन पहले ही गए थे। दादाजी का निधन हुआ था, इसलिए छुट्टी बढ़वाई थी। जिस रात खबर आई, बहुत तेज आंधी-तूफान था। वो रात हम कभी नहीं भूल सकते।” - परिवार पर असर
“भैया के जाने के बाद सारी जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई। पिताजी हार्ट के मरीज हैं। अम्मा बीमार रहने लगीं और एक साल बाद उनका भी देहांत हो गया। मेरी पढ़ाई छूट गई, मैंने काम शुरू किया। आज मैं कंस्ट्रक्शन का काम करता हूं।” - सरकार से मिली सहायता
“सरकार ने जो मिलना था, वो मिला। गांव में जमीन, धनराशि मिली। भाभी को ग्राम विकास विभाग में क्लर्क की नौकरी मिल गई। गांव का प्राथमिक विद्यालय, खेल का मैदान, अमृत सरोवर और सुनौली बॉर्डर जाने वाले NH-24 पर तोरण द्वार उनके नाम पर है।” - 14 फरवरी को होने वाले कार्यक्रम
“हर साल स्मारक पर माल्यार्पण, फ्री स्वास्थ्य कैंप होता है। जिले के अधिकारी, जनप्रतिनिधि और लोग श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं।” - बच्चों की उम्र और सपने
“बेटा अब करीब 10 साल का है। बेटी जब भैया शहीद हुए थे, तब गर्भ में थी – अब उसका सातवां साल चल रहा है। दोनों का सपना फौज में जाना है। जब पूछते हैं पापा कहां हैं, तो हम कहते हैं – ड्यूटी पर हैं।” - देशवासियों और सरकार से अपील
“सभी लोग देश और जवानों का सम्मान करें। उनका हौसला बढ़ाएं। वे अपना परिवार छोड़कर हमारी सुरक्षा करते हैं। उनके परिवार की जिम्मेदारी हम सबकी है।”
शहीद पंकज त्रिपाठी की शहादत आज भी लाखों भारतीयों के दिलों में जिंदा है। उनका परिवार आज भी गर्व के साथ उनके बलिदान को याद करता है और देश की सुरक्षा के लिए समर्पित जवानों का सम्मान करने की अपील करता है।