• January 31, 2026

मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: चुनाव आयोग ने कहा- नागरिकता की जांच सिर्फ वोटिंग के लिए, डिपोर्ट करने के लिए नहीं

नई दिल्ली: देश के विभिन्न राज्यों में चल रही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई जारी है। इस दौरान भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने स्पष्ट किया है कि मतदाताओं की नागरिकता की जो जांच की जा रही है, उसका उद्देश्य पूरी तरह से चुनावी है। आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को आश्वस्त किया कि इस प्रक्रिया का मकसद किसी भी व्यक्ति को गैर-नागरिक घोषित कर देश से बाहर निकालना (डिपोर्ट करना) कतई नहीं है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्या कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष आयोग ने अपनी दलीलें पेश करते हुए इस पूरी कवायद को लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक प्रशासनिक कदम बताया।

पुलिस की भूमिका नहीं, यह एक ‘सॉफ्ट-टच’ प्रक्रिया है

चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने अदालत को बताया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की यह प्रक्रिया कोई कठोर दंडात्मक कार्रवाई या पुलिस-शैली की जांच नहीं है। उन्होंने इसे एक ‘लिबरल और सॉफ्ट-टच’ प्रक्रिया करार दिया। आयोग ने साफ किया कि इस पूरी कवायद में पुलिस की कोई भागीदारी नहीं है, जिससे आम नागरिकों के मन में किसी भी प्रकार का डर या असुरक्षा का भाव पैदा न हो। यह पूरी जिम्मेदारी चुनाव आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों की है, जो नागरिकता के मानदंडों की जांच केवल मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए कर रहे हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट को जानकारी दी कि बिहार जैसे राज्यों में यह प्रक्रिया पहले ही सफलतापूर्वक संपन्न हो चुकी है और वर्तमान में कुछ अन्य राज्यों में इसे लागू किया जा रहा है। आयोग का कहना है कि इसका एकमात्र लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल वैध और पात्रता रखने वाले भारतीय नागरिक ही मतदाता सूची में शामिल रहें, ताकि चुनाव की निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठ सके।

नागरिकता और मतदान के अधिकार का कानूनी आधार

सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु पर चर्चा हुई कि क्या केवल आयु (18 वर्ष) पूरी कर लेना ही मतदान का अधिकार पाने के लिए पर्याप्त है। इस पर चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि वोट देने का अधिकार केवल उम्र से नहीं जुड़ा है। भारतीय कानून के अनुसार, मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के लिए नागरिकता, मतदाता सूची में सही तरीके से पंजीकरण और कानून के तहत निर्धारित पात्रता की शर्तों को पूरा करना अनिवार्य है।

आयोग ने अपनी दलील में स्पष्ट किया कि संविधान ने उसे मतदाता पंजीकरण के उद्देश्य से नागरिकता की जांच करने का अधिकार दिया है। हालांकि, आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि उसके पास मतदाता पंजीकरण से इतर किसी अन्य कानूनी कार्रवाई या किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता पर अंतिम न्यायिक निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। आयोग का कार्य केवल यह तय करना है कि संबंधित व्यक्ति भारत के लोकतंत्र में वोट डालने के योग्य है या नहीं।

लाल बाबू हुसैन मामले की प्रासंगिकता और आयोग का स्पष्टीकरण

याचिकाकर्ताओं की ओर से 1995 के प्रसिद्ध ‘लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचन आयोग’ मामले का हवाला दिया गया था। उस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि यदि किसी व्यक्ति का नाम पहले से मतदाता सूची में है, तो उसे प्रथम दृष्टया नागरिक माना जाना चाहिए। यदि उसकी नागरिकता पर कोई सवाल उठता है, तो सबूत देने की जिम्मेदारी उस पर होगी जो सवाल उठा रहा है।

इस पर चुनाव आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि 1995 के मामले और वर्तमान एसआईआर प्रक्रिया की परिस्थितियां काफी अलग हैं। आयोग के वकील ने दलील दी कि लाल बाबू हुसैन केस में जांच पुलिस द्वारा की गई थी और उस समय पुलिस की कोई ठोस रिपोर्ट रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं थी। इसके विपरीत, वर्तमान में पुनरीक्षण का कार्य स्वयं चुनाव आयोग कर रहा है। आयोग ने कोर्ट को बताया कि वे 2002 और उससे पहले की मतदाता सूचियों में नाम होने को नागरिकता के एक मजबूत और पर्याप्त साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर रहे हैं। पुराने रिकॉर्ड में नाम होना इस बात का प्रमाणिक महत्व रखता है कि व्यक्ति लंबे समय से लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा रहा है।

राजनीतिक दलों से सहयोग की अपील और कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों की भूमिका पर भी अपनी बात रखी। आयोग ने कहा कि राजनीतिक दलों को एसआईआर प्रक्रिया का विरोध करने या इसे लेकर भ्रम फैलाने के बजाय लोगों की मदद करनी चाहिए। आयोग के अनुसार, दलों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पात्र नागरिकों के नाम सूची में दर्ज हों और प्रक्रिया सरल बनी रहे।

इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने भी सहमति जताई। अदालत ने टिप्पणी की कि लोकतंत्र की सफलता मतदाता सहभागिता बढ़ाने पर निर्भर करती है और इसमें राजनीतिक दलों की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची को त्रुटिहीन बनाने की दिशा में सभी हितधारकों को मिलकर काम करना चाहिए ताकि कोई भी वास्तविक नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रहे।

निष्कर्ष: पारदर्शिता और लोकतांत्रिक शुचिता का संकल्प

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की दलीलों ने यह साफ कर दिया है कि एसआईआर का उद्देश्य किसी को डराना या प्रताड़ित करना नहीं है। आयोग ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि वे पुरानी सूचियों और उपलब्ध दस्तावेजों के प्रति उदार दृष्टिकोण अपना रहे हैं। यह मामला अभी अदालत के अधीन है, लेकिन आयोग के रुख से यह संकेत मिलता है कि वह तकनीकी और कानूनी शुद्धता के साथ-साथ ‘सॉफ्ट-टच’ दृष्टिकोण बनाए रखना चाहता है। भविष्य में इस मामले पर आने वाला अंतिम फैसला यह तय करेगा कि भारत में नागरिकता की जांच और मतदाता सूची के प्रबंधन के बीच का संतुलन कैसा होगा।

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