• March 19, 2026

बंगाल में आशा कार्यकर्ताओं का भारी बवाल: स्वास्थ्य भवन मार्च रोकने के लिए पुलिस की कड़ी घेराबंदी, स्टेशनों पर ही हिरासत में ली गईं महिलाएं

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार और राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ मानी जाने वाली आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं के बीच लंबे समय से जारी गतिरोध बुधवार को चरम पर पहुंच गया। अपनी लंबित मांगों को लेकर साल्ट लेक स्थित स्वास्थ्य विभाग के मुख्यालय ‘स्वास्थ्य भवन’ तक विरोध मार्च निकालने पर अड़ीं हजारों आशा कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए राज्य प्रशासन ने पूरी ताकत झोंक दी है। बुधवार सुबह से ही कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में पुलिसिया कार्रवाई का दौर शुरू हो गया, जिसके तहत राज्य के विभिन्न जिलों से आ रही प्रदर्शनकारी महिलाओं को रेलवे स्टेशनों पर ही रोक दिया गया या हिरासत में ले लिया गया। इस कार्रवाई ने राज्य में एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विवाद को जन्म दे दिया है, जहां प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर उनकी लोकतांत्रिक आवाज को कुचलने का आरोप लगाया है।

रेलवे स्टेशनों पर अभूतपूर्व सुरक्षा और बैरिकेडिंग

बुधवार तड़के से ही कोलकाता के दो प्रमुख रेलवे स्टेशनों—सियालदह और हावड़ा—पर युद्ध जैसी स्थिति देखी गई। उत्तर बंगाल और सुंदरबन जैसे दूरदराज के इलाकों से ट्रेन के जरिए कोलकाता पहुंच रही आशा कार्यकर्ताओं को स्टेशनों से बाहर निकलने से रोकने के लिए पुलिस ने भारी बैरिकेडिंग कर दी थी। प्रदर्शनकारी महिलाओं का आरोप है कि पुलिस उन्हें स्टेशन परिसर के भीतर ही बंधक जैसा व्यवहार कर रही है। पश्चिमी दिनाजपुर से आई एक आशा कार्यकर्ता ने अपना दुख साझा करते हुए बताया कि उन्हें सुबह 6:30 बजे से ही स्टेशन से बाहर नहीं निकलने दिया गया।

जब इन कार्यकर्ताओं को बाहर जाने का रास्ता नहीं मिला, तो सैकड़ों महिलाएं स्टेशन परिसर में ही पटरियों के पास और प्लेटफॉर्म पर धरने पर बैठ गईं। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का तर्क है कि कानून-व्यवस्था और यातायात को सुचारू बनाए रखने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य था। हालांकि, प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह उनकी आवाज को दबाने की सोची-समझी साजिश है ताकि वे स्वास्थ्य भवन तक मार्च न कर सकें।

स्वास्थ्य भवन के पास कड़ी घेराबंदी और हिंसक टकराव की आशंका

कोलकाता के साल्ट लेक सेक्टर 5 स्थित स्वास्थ्य भवन के आसपास के इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया है। स्वास्थ्य विभाग के मुख्यालय तक पहुंचने वाले सभी रास्तों को पुलिस ने सील कर दिया है। ट्रैफिक को डायवर्ट किया गया है और भारी संख्या में रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की तैनाती की गई है। इसके बावजूद, जो प्रदर्शनकारी पुलिस की शुरुआती घेराबंदी तोड़कर मुख्यालय के करीब पहुंचने में सफल रहीं, उन्हें तुरंत बसों में भरकर हिरासत में ले लिया गया।

पुलिस की इस सख्ती के कारण साल्ट लेक के कई इलाकों में तनाव की स्थिति बनी हुई है। आशा कार्यकर्ताओं का संगठन इस बात पर अड़ा है कि जब तक स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष अधिकारी उनसे मुलाकात नहीं करते और उनकी मांगों पर लिखित आश्वासन नहीं देते, वे पीछे नहीं हटेंगी। यह विरोध मार्च पिछले कई हफ्तों से चल रहे आंदोलन की अगली कड़ी है, जिसने ममता सरकार की स्वास्थ्य नीति और श्रम प्रबंधन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मानदेय और बीमा की मांग: क्यों नाराज हैं आशा कार्यकर्ता?

पश्चिम बंगाल की करीब 1.6 लाख आशा कार्यकर्ता लंबे समय से अपने काम की शर्तों और वेतन को लेकर संघर्ष कर रही हैं। वर्तमान में उन्हें मिलने वाला वेतन ‘प्रदर्शन-आधारित मानदेय’ (Incentive based) पर निर्भर है, जिसे वे अपर्याप्त और अपमानजनक मानती हैं। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग है कि उनके काम की प्रकृति को देखते हुए उनका मासिक मानदेय कम से कम 15,000 रुपये तय किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि वे टीकाकरण से लेकर शिशु मृत्यु दर कम करने तक के महत्वपूर्ण सरकारी कार्यों को जमीन पर उतारती हैं, लेकिन उनके खुद के परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।

वेतन के अलावा, दूसरी प्रमुख मांग ‘स्वास्थ्य और जीवन सुरक्षा’ को लेकर है। आशा कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि ड्यूटी के दौरान किसी भी अप्रिय घटना या मृत्यु की स्थिति में उनके परिवार को कम से कम पांच लाख रुपये का बीमा कवर (Insurance Cover) मिलना चाहिए। कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे जोखिम भरे माहौल में काम करती हैं, लेकिन सरकार उनके भविष्य को लेकर उदासीन है। इन्हीं मांगों को लेकर राज्यभर में 23 दिसंबर 2025 से ही आशा कार्यकर्ताओं ने काम बंद कर रखा है, जिससे ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।

आंदोलन का घटनाक्रम और सरकार का रुख

यह पहली बार नहीं है जब आशा कार्यकर्ता सड़कों पर उतरी हैं। इससे पहले 8 जनवरी को भी उन्होंने स्वास्थ्य भवन तक मार्च करने की कोशिश की थी, जिसे पुलिस ने बलपूर्वक रोका था। इसके बाद 12 जनवरी को भी एक बड़ा प्रदर्शन हुआ था, जिसमें कार्यकर्ताओं ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से सीधी बातचीत की मांग की थी। बार-बार मिल रही उपेक्षा के बाद ही कार्यकर्ताओं ने बुधवार को ‘निर्णायक’ मार्च का एलान किया था।

राज्य सरकार का कहना है कि वे आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका का सम्मान करते हैं और उनकी मांगों पर विचार किया जा रहा है, लेकिन किसी को भी सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। सरकार के मंत्रियों का आरोप है कि इस आंदोलन को विपक्षी दलों द्वारा हवा दी जा रही है। वहीं, आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी लड़ाई विशुद्ध रूप से अपने पेट की भूख और सम्मान की रक्षा के लिए है।

निष्कर्ष और आगे की राह

बुधवार की इस कार्रवाई के बाद पश्चिम बंगाल में तनाव और बढ़ने की आशंका है। स्वास्थ्य सेवाओं का ठप होना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यदि पुलिसिया कार्रवाई इसी तरह जारी रही, तो यह आंदोलन ग्रामीण बंगाल में ममता सरकार के खिलाफ एक बड़े आक्रोश में बदल सकता है। फिलहाल सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत की मेज पर बैठेगी या फिर यह संघर्ष और उग्र रूप लेगा।

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