नोएडा वॉटरलॉगिंग हादसा: सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत पर एनजीटी सख्त, नोएडा प्राधिकरण और सिंचाई विभाग समेत पांच विभागों को नोटिस
नोएडा/नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के हाई-टेक शहर नोएडा में व्याप्त प्रशासनिक लापरवाही और जलभराव की समस्या ने एक होनहार सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान ले ली है। इस घटना की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) ने स्वतः संज्ञान लिया है। एनजीटी ने नोएडा प्राधिकरण, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB), सिंचाई विभाग, पर्यावरण विभाग और गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट (DM) को नोटिस जारी कर कड़ी फटकार लगाई है।
अदालत ने सेक्टर-150 में वर्षों से लंबित स्टॉर्म वाटर मैनेजमेंट योजना के कार्यान्वयन में हुई देरी पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए सेंथिल वेल की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यह घटना स्पष्ट रूप से पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 का उल्लंघन है। अदालत ने सभी संबंधित विभागों को अगली सुनवाई से पहले हलफनामे के जरिए अपनी सफाई पेश करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल, 2026 को तय की गई है।
कोहरे और जलभराव का घातक संगम: कैसे हुई युवराज की मौत?
यह दर्दनाक हादसा 20 जनवरी, 2026 को हुआ, जब सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता अपनी कार से घर लौट रहे थे। भारी कोहरे के कारण दृश्यता कम होने की वजह से वह रास्ता भटक गए और उनकी कार सेक्टर-150 के पास पानी से भरी एक गहरी खाई में जा गिरी। यह खाई कोई सामान्य गड्ढा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की वजह से बना एक विशाल “मौत का तालाब” था।
हादसे की सूचना मिलने के बाद एनडीआरएफ (NDRF) की टीम को राहत कार्य के लिए बुलाया गया। लगभग तीन दिनों के सघन तलाशी अभियान के बाद, टीम ने पानी के भीतर से युवराज की कार को बाहर निकाला। कार की स्थिति देखकर हादसे की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता था; पानी के अत्यधिक दबाव के कारण कार के शीशे और सनरूफ पूरी तरह टूटे हुए पाए गए थे। इस घटना ने नोएडा की उन हाउसिंग सोसाइटियों की सुरक्षा व्यवस्था और बुनियादी ढांचे पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन्हें ‘प्रीमियम’ श्रेणी में गिना जाता है।
11 साल की लापरवाही: 2015 की योजना फाइलों में रह गई दफन
जांच में सामने आया है कि जिस स्थान पर यह हादसा हुआ, वह जमीन मूल रूप से एक निजी मॉल परियोजना के लिए आवंटित की गई थी। हालांकि, पिछले दस वर्षों से वहां निर्माण कार्य ठप था और बारिश के साथ-साथ आसपास की हाउसिंग सोसाइटियों का गंदा पानी वहां जमा होता रहा। इस जमाव ने एक बड़े और गहरे तालाब का रूप ले लिया था।
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि सिंचाई विभाग ने वर्ष 2015 में इस ‘तूफानी पानी’ (Storm Water) को हिंडन नदी में प्रवाहित करने के लिए एक ‘हेड रेगुलेटर’ बनाने की योजना तैयार की थी। रिकॉर्ड के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के लिए वर्ष 2016 में नोएडा अथॉरिटी ने सिंचाई विभाग को 13.05 लाख रुपये का बजट भी जारी किया था। इसके बावजूद, पिछले 10 वर्षों में यह रेगुलेटर कभी नहीं बना। रेगुलेटर के अभाव में बारिश का पानी बाहर नहीं निकल पाया, जिससे पूरे इलाके में स्थायी जलभराव की स्थिति बन गई। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि उन्होंने कई बार प्राधिकरण को पत्र लिखे, लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत और सुस्ती ने आज एक जान ले ली।
बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई: नोएडा प्राधिकरण के सीईओ हटाए गए
सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत के बाद उपजे जनाक्रोश और एनजीटी के सख्त रुख ने शासन को बड़ी कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया है। मुख्यमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के बाद, नोएडा प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) को उनके पद से हटा दिया गया है। इसे जांच की दिशा में एक महत्वपूर्ण और कड़ा कदम माना जा रहा है।
शासन ने मामले की तह तक जाने के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है। एसआईटी की टीम पहले ही नोएडा पहुँच चुकी है और उसने सेक्टर-150 के उस स्थल का निरीक्षण किया है जहाँ युवराज की मौत हुई थी। सूत्रों के अनुसार, एसआईटी की टीम नोएडा अथॉरिटी के दफ्तरों में भी जांच के लिए पहुँची है, जहाँ 2015 से अब तक इस प्रोजेक्ट से जुड़ी फाइलों को खंगाला जा रहा है। जांच का मुख्य केंद्र यह है कि बजट मिलने के बावजूद प्रोजेक्ट को पूरा क्यों नहीं किया गया और किसके निर्देश पर इसे लंबित रखा गया।
पुलिस की कार्रवाई: दो अभियुक्त गिरफ्तार
हादसे के आपराधिक पहलुओं की जांच कर रही नॉलेज पार्क कोतवाली पुलिस ने भी बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस ने मामले में लापरवाही और गैर-इरादतन हत्या की धाराओं के तहत जांच करते हुए दो अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों की पहचान रवि बंसल (निवासी फरीदाबाद, हरियाणा) और सचिन करनवाल (निवासी साहिबाबाद, गाजियाबाद) के रूप में हुई है।
पुलिस के अनुसार, ये दोनों अभियुक्त उस निजी परियोजना या संबंधित कार्य से जुड़े थे जिसकी लापरवाही की वजह से यह जलभराव हुआ। पुलिस अब उनसे यह पूछताछ कर रही है कि क्या सुरक्षा मानकों का उल्लंघन जानबूझकर किया गया था या यह केवल प्रशासनिक विफलता का परिणाम था। पुलिस आने वाले दिनों में कुछ और अधिकारियों और ठेकेदारों पर शिकंजा कस सकती है।
पर्यावरण और सुरक्षा: एनजीटी की चिंता और भविष्य की राह
एनजीटी ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि केवल एक अधिकारी को हटाना समाधान नहीं है। ट्रिब्यूनल ने स्टॉर्म वाटर मैनेजमेंट की पूरी व्यवस्था पर चिंता जताई है। एनजीटी का मानना है कि शहरी विकास के नाम पर प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है, वह पर्यावरण और मानव जीवन दोनों के लिए खतरा है। नोएडा जैसे शहरों में जल निकासी की समुचित व्यवस्था न होना और प्रोजेक्ट्स का वर्षों तक अधर में लटके रहना भ्रष्टाचार और अक्षमता का प्रमाण है।
अगली सुनवाई 10 अप्रैल, 2026 को होगी, जहाँ नोएडा प्राधिकरण और सिंचाई विभाग को यह बताना होगा कि उन्होंने पिछले 10 वर्षों में 13.05 लाख रुपये का क्या किया और रेगुलेटर न बनने के लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं। युवराज मेहता की मौत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जब तक बुनियादी ढांचे और सुरक्षा मानकों में जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक आधुनिक कहलाने वाले शहर असुरक्षित ही रहेंगे।