केरल विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में रार: शशि थरूर की ‘नाराजगी’ पर रमेश चेन्निथाला ने दी सफाई, संदीप दीक्षित के बयान ने बढ़ाई तल्खी
केरल विधानसभा चुनावों की आहट के बीच कांग्रेस पार्टी के भीतर मचे आंतरिक घमासान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। तिरुवनंतपुरम से सांसद और कांग्रेस के कद्दावर नेता शशि थरूर की पार्टी से कथित नाराजगी को लेकर चल रही अटकलों पर अब पार्टी के वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथाला ने विराम लगाने की कोशिश की है। दिल्ली में मीडिया से बातचीत करते हुए चेन्निथाला ने उन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें कहा जा रहा था कि थरूर पार्टी नेतृत्व से असंतुष्ट हैं और इसी वजह से वे महत्वपूर्ण बैठकों से दूरी बनाए हुए हैं। हालांकि, चेन्निथाला की इस सफाई के बावजूद पार्टी के ही एक अन्य नेता संदीप दीक्षित के तीखे बयान ने विवाद को नया मोड़ दे दिया है, जिससे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।
रमेश चेन्निथाला ने थरूर का बचाव करते हुए स्पष्ट किया कि सांसद की अनुपस्थिति के पीछे कोई राजनीतिक नाराजगी नहीं बल्कि पूर्व निर्धारित सामाजिक प्रतिबद्धताएं थीं। उन्होंने बताया कि शशि थरूर ने केरल साहित्य मंच के एक कार्यक्रम में शामिल होने का वादा बहुत पहले ही कर दिया था, जिसके कारण वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की हालिया बैठकों में शामिल नहीं हो सके। चेन्निथाला के अनुसार, थरूर ने अपनी इस व्यस्तता के बारे में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पहले ही सूचित कर दिया था। चेन्निथाला का यह बयान ऐसे समय में आया है जब केरल में कुछ ही महीनों बाद चुनाव होने हैं और पार्टी को एकजुट दिखाने की भारी चुनौती है, लेकिन थरूर की अनुपस्थिति ने पार्टी की चुनावी तैयारियों और एकजुटता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
इस पूरे विवाद में नया और विवादास्पद मोड़ तब आया जब कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने थरूर की अनुपस्थिति पर बेहद तल्ख टिप्पणी की। जब दीक्षित से थरूर के बैठकों में न आने को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि पार्टी की बैठकों में वे सभी वरिष्ठ नेता शामिल हो रहे हैं जिनका अपना जनाधार है और जो पार्टी के लिए जरूरी हैं। दीक्षित ने दो टूक शब्दों में कहा कि जो लोग महत्वपूर्ण हैं वे आ रहे हैं, और अगर कोई बड़ा नेता नहीं आ रहा है जिसकी पार्टी को फिलहाल जरूरत नहीं है, तो उसके न आने से संगठन पर कोई फर्क नहीं पड़ता। दीक्षित के इस बयान को सीधे तौर पर शशि थरूर के अपमान और उन्हें दरकिनार करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिसने पार्टी के भीतर गुटबाजी को और हवा दे दी है।
शशि थरूर और कांग्रेस नेतृत्व के बीच मतभेद की खबरें नई नहीं हैं, लेकिन चुनाव के मुहाने पर इनका उभरना पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। थरूर कई बार सार्वजनिक मंचों पर यह संकेत दे चुके हैं कि वे पार्टी में अपनी वर्तमान भूमिका से संतुष्ट नहीं हैं। उनकी नाराजगी केवल बैठकों से दूरी तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके वैचारिक रुख में भी बदलाव देखा गया है। थरूर अक्सर केंद्र की एनडीए सरकार की कुछ नीतियों की सराहना करते नजर आए हैं, विशेष रूप से ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर उन्होंने सरकार के प्रयासों की खुलकर तारीफ की थी। उनके इन बयानों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह कयास लगाए जाने लगे हैं कि क्या थरूर कांग्रेस का हाथ छोड़कर एनडीए का रुख कर सकते हैं।
केरल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व के संकट को लेकर भी थरूर मुखर रहे हैं। उन्होंने हाल ही में कहा था कि कई जमीनी कार्यकर्ताओं को ऐसा महसूस होता है कि राज्य इकाई में प्रभावी नेतृत्व की कमी है। थरूर का यह रुख दर्शाता है कि वे राज्य की राजनीति में बड़ी भूमिका की तलाश में हैं, जबकि पार्टी का एक धड़ा उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक ही सीमित रखना चाहता है। थरूर ने यहां तक कह दिया था कि अगर कांग्रेस पार्टी को उनकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं है, तो उनके पास अन्य कई विकल्प खुले हैं। उन्होंने अपनी लेखनी और किताबों का जिक्र करते हुए यह स्पष्ट किया कि वे राजनीति के अलावा भी सक्रिय रह सकते हैं, जो एक तरह से पार्टी नेतृत्व को उनकी सीधी चेतावनी मानी जा रही है।
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले थरूर का इस तरह से परिदृश्य से गायब होना और पार्टी के अन्य नेताओं द्वारा उन्हें ‘गैर-जरूरी’ बताना कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। थरूर का केरल, विशेषकर तिरुवनंतपुरम और शिक्षित मध्यम वर्ग के बीच गहरा प्रभाव है। ऐसे में उन्हें नजरअंदाज करना या उनके खिलाफ बयानबाजी करना कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा सकता है। फिलहाल रमेश चेन्निथाला स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन संदीप दीक्षित जैसे नेताओं के बयान और थरूर की अपनी बेबाकी ने केरल कांग्रेस के भीतर एक ऐसा गतिरोध पैदा कर दिया है जिसे सुलझाना हाईकमान के लिए आसान नहीं होगा। अब देखना यह होगा कि आगामी हफ्तों में थरूर पार्टी के प्रचार अभियान में सक्रिय होते हैं या फिर कोई नया रास्ता चुनते हैं।