आईपीएस अधिकारियों का केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से मोहभंग: 700 से अधिक पद स्वीकृत, फिर भी 200 से ज्यादा रिक्तियां
नई दिल्ली: भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारियों की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को लेकर एक गंभीर संकट गहराता जा रहा है। केंद्र सरकार ने विभिन्न जांच एजेंसियों, खुफिया ब्यूरो और अर्धसैनिक बलों में अपनी प्रशासनिक और सामरिक पकड़ मजबूत करने के लिए आईपीएस अधिकारियों के 700 से अधिक पद स्वीकृत किए हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 200 से अधिक पद अब भी खाली पड़े हैं। रिक्तियों का सबसे बड़ा हिस्सा पुलिस अधीक्षक (SP) और उप महानिरीक्षक (DIG) स्तर के पदों का है। केंद्र सरकार के तमाम प्रयासों, नियमों में संशोधन और सख्त चेतावनियों के बावजूद युवा और मध्य स्तर के आईपीएस अधिकारी राज्यों की सुख-सुविधा छोड़कर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर आने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी 23 दिसंबर 2025 की नवीनतम रिपोर्ट इस संकट की गहराई को स्पष्ट करती है। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र में आईपीएस ‘प्रतिनियुक्ति’ के लिए स्वीकृत पदों की संख्या में लगातार इजाफा किया गया है। जून 2025 में जहां 678 अधिकारी तैनात थे, वहीं अब स्वीकृत पदों का आंकड़ा 700 के पार निकल चुका है। वर्तमान संरचना में महानिदेशक (DG) के 15, विशेष महानिदेशक (SDG) के 17, अतिरिक्त महानिदेशक (ADG) के 30 और महानिरीक्षक (IG) के 158 पद स्वीकृत हैं। हालांकि, समस्या उच्च पदों पर नहीं बल्कि जमीनी स्तर के अधिकारियों यानी डीआईजी और एसपी रैंक पर है, जिनके क्रमशः 256 और 225 पद स्वीकृत किए गए हैं। कुल मिलाकर 212 पद रिक्त पड़े हैं, जिनमें से 104 अकेले एसपी रैंक के हैं।
देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच और खुफिया एजेंसियां इस कमी से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। खुफिया ब्यूरो (IB) में एसपी रैंक के लिए 83 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से 47 पद खाली हैं। इसी तरह, केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) में एसपी के 78 पदों में से 42 रिक्त हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और राष्ट्रीय पुलिस अकादमी (NPA) की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि युवा आईपीएस अधिकारी इन शीर्ष एजेंसियों में काम करने के बजाय राज्यों में जिला पुलिस की कमान संभालना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। डीआईजी रैंक की स्थिति भी उतनी ही चिंताजनक है। बीएसएफ में स्वीकृत 26 पदों में से 8, सीआईएसएफ में 31 में से 9 और आईबी में तो 63 में से 38 पद खाली पड़े हैं। आईबी में डीआईजी स्तर पर रिक्तियों का प्रतिशत 50 से भी अधिक है।
विशेषज्ञों और पूर्व पुलिस अधिकारियों का मानना है कि इस ‘अनिच्छा’ के पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं। सीमा सुरक्षा बल (BSF) के पूर्व एडीजी एसके सूद के अनुसार, राज्य कैडर में एसपी के रूप में एक अधिकारी के पास व्यापक अधिकार, सामाजिक रसूख और बेहतर बुनियादी सुविधाएं होती हैं। जब ये अधिकारी डीआईजी के पद पर पदोन्नत होते हैं, तो वे केंद्र में प्रतिनियुक्ति के बजाय अपने राज्य में ही सुविधाजनक पोस्टिंग की तलाश करते हैं। केंद्रीय पुलिस संगठनों या अर्धसैनिक बलों में डीआईजी का पद अक्सर ‘फील्ड पोस्टिंग’ से जुड़ा होता है, जिसमें अधिकारियों को दूरदराज के सीमावर्ती क्षेत्रों या चुनौतीपूर्ण वातावरण में काम करना पड़ता है। ज्यादातर अधिकारी दिल्ली या राज्यों के मुख्यालयों में रहना पसंद करते हैं, जिसके कारण कठिन इलाकों वाले पदों पर नियुक्तियां नहीं हो पा रही हैं।
डेटा के ऐतिहासिक विश्लेषण से पता चलता है कि यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि पिछले पांच-छह वर्षों में इसमें लगातार वृद्धि हुई है। मार्च 2023 में डीआईजी के 77 पद खाली थे, जबकि जुलाई 2020 में यह संख्या 164 तक पहुंच गई थी। दिसंबर 2021 में एसपी के 104 पद रिक्त थे। आंकड़ों का यह उतार-चढ़ाव दिखाता है कि सरकार द्वारा किए गए नीतिगत बदलावों का बहुत सीमित असर हुआ है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार ने एक अस्थायी रास्ता निकाला है, जिसके तहत आईपीएस के लिए आरक्षित इन रिक्त पदों को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के कैडर अधिकारियों को ‘डायवर्ट’ कर दिया जाता है। हालांकि, यह केवल एक तात्कालिक व्यवस्था है और इससे अखिल भारतीय सेवा के मूल उद्देश्य पर असर पड़ता है।
इस संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने हाल के वर्षों में कई सख्त कदम उठाए हैं। गृह मंत्रालय ने अब 2011 बैच और उसके बाद के सभी आईपीएस अधिकारियों के लिए आईजीपी के पद पर केंद्र में नियुक्ति पाने हेतु कम से कम दो साल की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को अनिवार्य कर दिया है। इसके अलावा, ‘आईपीएस कार्यकाल नीति’ के पैरा 17 को भी कड़ाई से लागू किया जा रहा है। इसके तहत यदि किसी अधिकारी को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए चुन लिया जाता है और वह समय पर कार्यभार ग्रहण करने में विफल रहता है, तो उसे अगले पांच वर्षों के लिए किसी भी केंद्रीय या विदेशी प्रतिनियुक्ति से वंचित कर दिया जाएगा। सरकार ने डीआईजी रैंक के लिए जटिल पैनल प्रक्रिया को भी समाप्त कर दिया है ताकि नियुक्ति में लगने वाले एक साल के समय को कम किया जा सके।
अखिल भारतीय सेवाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए, कुछ समय पूर्व 17 सेवानिवृत्त वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों ने भी सेवारत अफसरों से देशहित में केंद्र में आने की अपील की थी। पूर्व अधिकारियों का तर्क है कि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति न केवल अधिकारी के अनुभव और कौशल को निखारती है, बल्कि यह केंद्र और राज्यों के बीच एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कड़ी का काम करती है। राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक ढांचे में योगदान देने के लिए इन जांच एजेंसियों का पूर्ण क्षमता से कार्य करना अनिवार्य है।
वर्तमान स्थिति यह है कि सरकार ने नियम तो आसान बना दिए हैं और प्रक्रिया में तेजी भी लाई गई है, लेकिन आईपीएस अधिकारियों के बीच ‘राज्य-केंद्रित’ मानसिकता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो आने वाले समय में देश की प्रमुख जांच और खुफिया एजेंसियों की परिचालन क्षमता पर गंभीर असर पड़ सकता है। केंद्र सरकार अब उन अधिकारियों की सूची तैयार कर रही है जो अनिवार्य प्रतिनियुक्ति के दायरे में आते हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि देश की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था के शीर्ष पदों पर अनुभवी नेतृत्व की कमी न हो।