अजित पवार के बाद राकांपा का भविष्य: उत्तराधिकार की जंग, विलय की सुगबुगाहट और महायुति सरकार पर मंडराते संकट के बादल
मुंबई: महाराष्ट्र की सियासत के सबसे कद्दावर और रणनीतिकार नेताओं में शुमार अजित पवार के आकस्मिक निधन ने न केवल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) को अनाथ कर दिया है, बल्कि राज्य की राजनीति में एक बड़ा संवैधानिक और सांगठनिक संकट खड़ा कर दिया है। ‘दादा’ के नाम से लोकप्रिय अजित पवार के बिना राकांपा का अस्तित्व क्या होगा, पार्टी की कमान किसके हाथ में जाएगी और क्या अब शरद पवार के नेतृत्व वाले दोनों गुटों के विलय का रास्ता साफ हो गया है—ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो इस समय महाराष्ट्र के हर राजनीतिक गलियारे में गूंज रहे हैं। 41 विधायकों और एक मजबूत सांगठनिक ढांचे वाली आधिकारिक राकांपा के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे चेहरे को खोजने की है, जो अजित पवार की तरह न केवल पार्टी को एकजुट रख सके, बल्कि महायुति गठबंधन में अपनी बात मनवा सके।
अजित पवार के उत्तराधिकार को लेकर चर्चाएं शुरू होते ही परिवार और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के नाम सामने आने लगे हैं। विरासत की इस जंग में अजित पवार की पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। हालांकि सुनेत्रा पवार के पास सांगठनिक अनुभव की कमी और अजित पवार जैसा व्यापक जनसमर्थन न होना उनके लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है। दूसरी ओर, उनके बड़े बेटे पार्थ पवार का नाम भी चर्चा में है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली हार और उसके बाद सक्रिय राजनीति से उनकी दूरी उनके नेतृत्व कौशल पर सवाल खड़े करती है। छोटे बेटे जय पवार अब तक पर्दे के पीछे रहकर काम करते रहे हैं, ऐसे में पार्टी की कमान सीधे तौर पर अगली पीढ़ी को सौंपना जोखिम भरा साबित हो सकता है।
इस अनिश्चितता के बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों—अजित पवार के नेतृत्व वाली राकांपा और शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा (एसपी)—के विलय की अटकलें तेज हो गई हैं। हाल ही में पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निकाय चुनावों के लिए दोनों गुटों का साथ आना इस बात का संकेत था कि पर्दे के पीछे सुलह की कोशिशें जारी थीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब जबकि अजित पवार नहीं रहे, शरद पवार अपने पोतों (पार्थ और जय) और पुराने साथियों को वापस बुलाकर पार्टी को फिर से एक कर सकते हैं। शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत के हालिया बयानों ने भी इन संभावनाओं को बल दिया है कि पवार साम्राज्य को बिखरने से बचाने के लिए ‘साहब’ एक बार फिर अपनी सक्रियता बढ़ा सकते हैं।
शरद पवार, जिन्होंने पूर्व में संकेत दिया था कि वे 2026 के अंत तक सक्रिय राजनीति से अलग हो सकते हैं, अब अपनी योजनाओं में बदलाव कर सकते हैं। अपने परिवार की अगली पीढ़ी और सुप्रिया सुले के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए वे दोनों गुटों को एकजुट करने का प्रयास कर सकते हैं। हालांकि, अजित गुट के उन विधायकों के लिए यह स्थिति धर्मसंकट जैसी होगी जो भाजपा और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के करीबी रहे हैं। यदि विलय की प्रक्रिया तेज होती है, तो इसका सीधा असर मौजूदा महायुति सरकार (भाजपा, शिंदे शिवसेना और राकांपा) की स्थिरता पर पड़ सकता है। बिना किसी मजबूत नेतृत्व के, अजित गुट के 41 विधायकों पर शरद पवार के खेमे में लौटने का दबाव बढ़ेगा, जिससे गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है।
जहां तक उपमुख्यमंत्री (डिप्टी सीएम) पद के दावेदारों का सवाल है, राकांपा के भीतर कई अनुभवी चेहरे मौजूद हैं जो अजित पवार की जगह लेने की क्षमता रखते हैं। प्रफुल्ल पटेल इस सूची में सबसे ऊपर हैं। अजित पवार के सबसे भरोसेमंद साथियों में से एक प्रफुल्ल पटेल न केवल पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के चेहरे हैं, बल्कि उनके पास व्यापक प्रशासनिक अनुभव भी है। उनके अलावा छगन भुजबल एक और मजबूत नाम हैं। करीब 40 वर्षों का राजनीतिक अनुभव रखने वाले भुजबल महाराष्ट्र में ओबीसी राजनीति का बड़ा चेहरा हैं। उनकी पकड़ और अनुभव उन्हें इस पद का स्वाभाविक दावेदार बनाते हैं, हालांकि उनकी उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां आड़े आ सकती हैं।
मराठवाड़ा क्षेत्र के प्रभावशाली नेता धनंजय मुंडे भी इस दौड़ में शामिल माने जा रहे हैं। गोपीनाथ मुंडे की विरासत और अजित पवार के साथ उनकी निकटता उन्हें युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाती है। मुंडे को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का भी करीबी माना जाता है, जो गठबंधन सरकार में उनके लिए प्लस पॉइंट साबित हो सकता है। इसके अलावा, वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे का नाम भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रायगढ़-कोकण क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखने वाले तटकरे वर्तमान में लोकसभा में पार्टी के एकमात्र सांसद हैं और संगठन को चलाने का गहरा अनुभव रखते हैं।
अजित पवार केवल एक नेता नहीं, बल्कि राकांपा के लिए एक ‘संकटमोचक’ और ‘फंड रेजर’ की भूमिका में भी थे। उनके बिना पार्टी के लिए आगामी चुनावों में उसी आक्रामकता के साथ उतरना मुश्किल होगा। आने वाले कुछ दिन महाराष्ट्र की राजनीति के लिए बेहद निर्णायक होने वाले हैं। क्या पार्टी प्रफुल्ल पटेल या छगन भुजबल जैसे किसी अनुभवी नेता को कमान सौंपेगी, या फिर शरद पवार एक बार फिर ‘चाणक्य’ की भूमिका निभाते हुए पूरे परिवार और पार्टी को एक झंडे के नीचे ले आएंगे—यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल, महाराष्ट्र की जनता और राकांपा कार्यकर्ता अपने प्रिय नेता के निधन के शोक से उबरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सत्ता की बिसात पर चालें चलना शुरू हो चुकी हैं।