यूसीसी पर आम सहमति और विश्वास का वातावरण जरूरी, विभाजनकारी राजनीति से बचें: सरसंघचालक मोहन भागवत
मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम के दौरान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने देश के ज्वलंत मुद्दों पर संघ का दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्टता के साथ साझा किया। समान नागरिक संहिता (UCC) से लेकर बांग्लादेश के हिंदू संकट और राजनीति में संघ की भूमिका तक, भागवत ने हर विषय पर गहराई से अपनी बात रखी। उन्होंने विशेष रूप से जोर देकर कहा कि समान नागरिक संहिता जैसे महत्वपूर्ण कानून को लागू करते समय समाज के सभी वर्गों को विश्वास में लेना अनिवार्य है। भागवत के अनुसार, यूसीसी का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, न कि इसके नाम पर किसी भी प्रकार का विभाजन पैदा किया जाना चाहिए।
समान नागरिक संहिता पर चर्चा करते हुए सरसंघचालक ने उत्तराखंड का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में इस कानून को अंतिम रूप देने से पहले लगभग तीन लाख सुझाव लिए गए और समाज के हर हितधारक के साथ विस्तृत चर्चा की गई। उन्होंने सुझाव दिया कि यही लोकतांत्रिक और समावेशी तरीका पूरे देश में अपनाया जाना चाहिए ताकि एक ऐसा कानून बन सके जिसे सभी नागरिक सहर्ष स्वीकार करें। भागवत ने स्पष्ट किया कि समाज में संवाद के माध्यम से ही किसी भी प्रकार के भ्रम को दूर किया जा सकता है और एक न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित की जा सकती है।
देश के भीतर सामाजिक संरचना पर बात करते हुए भागवत ने एक बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भारत में ‘बहुसंख्यक’ या ‘अल्पसंख्यक’ जैसी शब्दावली का कोई स्थान नहीं होना चाहिए क्योंकि हम सभी एक ही साझा समाज और राष्ट्र का अभिन्न हिस्सा हैं। उन्होंने मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ विश्वास, मित्रता और निरंतर संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। धर्म के स्वरूप को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि जब किसी भी धर्म से आध्यात्मिकता लुप्त हो जाती है, तो वह आक्रामक और दूसरों पर हावी होने वाला बन जाता है। उन्होंने वर्तमान संदर्भ में टिप्पणी करते हुए कहा कि आज इस्लाम और ईसाई धर्म के नाम पर जो कट्टरता और संघर्ष दिखाई दे रहा है, वह वास्तव में पैगंबर मोहम्मद और ईसा मसीह की मूल शिक्षाओं के विपरीत है। उन्होंने अनुयायियों से ‘सच्चे इस्लाम’ और ‘सच्ची ईसाइयत’ के मार्ग पर चलने का आह्वान किया, जो शांति और करुणा पर आधारित है।
पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति पर भागवत ने गहरी चिंता व्यक्त की, लेकिन साथ ही एक उम्मीद की किरण भी दिखाई। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में वर्तमान में सवा करोड़ हिंदू मौजूद हैं। उन्होंने हिंदुओं को एकजुट होने का आह्वान करते हुए कहा कि यदि वे अपनी शक्ति को एकीकृत कर लेते हैं, तो वे वहां की राजनीतिक व्यवस्था में अपने हितों और सुरक्षा को सुनिश्चित करने की स्थिति में होंगे। उन्होंने इस बात की सराहना की कि इस बार वहां के हिंदुओं ने पलायन करने के बजाय अपनी मिट्टी पर रहकर संघर्ष करने का साहसी निर्णय लिया है। भागवत ने वैश्विक स्तर पर आश्वासन देते हुए कहा कि भारत की सीमाओं के भीतर और दुनिया भर में मौजूद हिंदू समाज, बांग्लादेशी हिंदुओं की सुरक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करेगा।
राजनीतिक परिदृश्य और ‘अच्छे दिन’ के चर्चित नारे पर टिप्पणी करते हुए सरसंघचालक ने संघ की विचारधारा को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि आरएसएस के लिए ‘अच्छे दिन’ का अर्थ भाजपा का सत्ता में आना नहीं है। संघ के लिए असली अच्छे दिन तब होते हैं जब स्वयंसेवकों की मेहनत सफल होती है और समाज में वैचारिक परिवर्तन आता है। उन्होंने स्वीकार किया कि राम मंदिर आंदोलन में जो लोग संघ के साथ वैचारिक रूप से खड़े रहे, उन्हें उसका राजनीतिक लाभ अवश्य मिला है। हिंदुत्व के प्रखर विचारक विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की पुरानी मांग पर उन्होंने कहा कि सावरकर एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्हें यदि यह सम्मान मिलता है, तो इससे ‘भारत रत्न’ की गरिमा और अधिक बढ़ जाएगी।
संघ और राजनीति के जटिल संबंधों पर चुटकी लेते हुए भागवत ने कहा कि राजनीति में होने वाली गलतियों का दोष अक्सर बेवजह संघ के मत्थे मढ़ दिया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ केवल आवश्यकतानुसार सलाह देने का कार्य करता है, लेकिन वास्तविक राजनीतिक दबाव तो मतदाताओं का होता है। एक दिलचस्प टिप्पणी में उन्होंने वामपंथी आंदोलन पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि पिछले 100 वर्षों में कम्युनिस्टों का आधार भारत में क्यों नहीं बढ़ सका, इस पर यदि वे चाहें तो आरएसएस उन्हें मार्गदर्शन देने के लिए तैयार है।
संगठन के भविष्य और युवाओं की भागीदारी पर भागवत ने उत्साहजनक आंकड़े साझा किए। उन्होंने बताया कि आरएसएस अब एक वृद्ध संगठन नहीं बल्कि ऊर्जावान युवा संगठन है। वर्तमान में स्वयंसेवकों की औसत आयु 28 वर्ष है, जिसे संगठन आने वाले समय में घटाकर 25 वर्ष करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। अंत में, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते जैसे अंतरराष्ट्रीय विषयों पर उन्होंने कहा कि हालांकि उन्होंने तकनीकी विवरण नहीं देखे हैं, लेकिन कोई भी वैश्विक समझौता परस्पर ‘लेन-देन’ और दोनों पक्षों के समान लाभ के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए। भागवत के इस विस्तृत संबोधन ने यह स्पष्ट कर दिया कि शताब्दी वर्ष में संघ न केवल अपने वैचारिक एजेंडे पर अडिग है, बल्कि वह बदलते वैश्विक और सामाजिक परिवेश के साथ सामंजस्य बिठाने के लिए भी पूरी तरह तैयार है।