पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची पुनरीक्षण ड्यूटी पर छिड़ा विवाद: बैंक अधिकारियों की सुरक्षा और कामकाज पर एआईबीओसी ने जताई गंभीर चिंता
बैंकिंग क्षेत्र के सबसे बड़े ट्रेड यूनियन संगठन, अखिल भारतीय बैंक अधिकारी परिसंघ (AIBOC) ने पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची की ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) प्रक्रिया के दौरान बैंक अधिकारियों की सुरक्षा और उनके पेशेवर दायित्वों को लेकर एक बड़ा मोर्चा खोल दिया है। करीब 3.25 लाख सदस्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस परिसंघ ने दावा किया है कि राज्य में चुनाव संबंधी ड्यूटी बैंक अधिकारियों के लिए ‘जी का जंजाल’ बन गई है। परिसंघ ने पश्चिम बंगाल के फरक्का में हुई एक हिंसक घटना का हवाला देते हुए भारतीय निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
एआईबीओसी का कहना है कि जिस तरह से बैंक अधिकारियों को उनकी मुख्य बैंकिंग सेवाओं से हटाकर जोखिम भरी चुनावी ड्यूटी में लगाया जा रहा है, वह न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन को खतरे में डाल रहा है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और बैंकिंग प्रणाली को भी बाधित कर रहा है। संगठन ने इस बात पर नाराजगी जताई है कि अधिकारियों को बिना किसी सुरक्षा के उन क्षेत्रों में भेजा जा रहा है जहां कानून-व्यवस्था की स्थिति संवेदनशील है।
फरक्का की घटना और सुरक्षा पर उठते गंभीर सवाल
परिसंघ के महासचिव रूपम रॉय ने एक प्रेस वक्तव्य जारी कर पश्चिम बंगाल के फरक्का में हुई एक डरावनी घटना का विवरण साझा किया। उन्होंने बताया कि मतदाता सूची के सूक्ष्म पर्यवेक्षक (ईआरएमओ) के रूप में तैनात बैंक अधिकारियों पर असामाजिक तत्वों ने जानलेवा हमला किया है। बदमाशों का एक समूह बिना किसी रोक-टोक के संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) के कार्यालय में घुस गया, वहां जमकर तोड़फोड़ की और ड्यूटी पर मौजूद दो सूक्ष्म पर्यवेक्षकों के साथ शारीरिक मारपीट की।
चिंताजनक बात यह रही कि इस हिंसक घटना के दौरान मौके पर कोई पुलिस बल मौजूद नहीं था। एआईबीओसी ने आरोप लगाया है कि बैंक अधिकारियों को उपद्रवी भीड़ के भरोसे छोड़ दिया गया और उन्हें अपनी रक्षा खुद ही करनी पड़ी। इस हमले में कई अधिकारी घायल हुए हैं। परिसंघ का मानना है कि यह घटना केवल एक उदाहरण मात्र है और राज्य के वर्तमान तनावपूर्ण माहौल में बिना सुरक्षा के ऐसी और भी घटनाएं होने की प्रबल आशंका है। विशेष रूप से महिला अधिकारियों की नई नियुक्तियों को लेकर संगठन ने गहरी चिंता व्यक्त की है।
बैंकिंग कामकाज और नियामक अनुपालन में बड़ी बाधा
अखिल भारतीय बैंक अधिकारी परिसंघ ने इस बात पर जोर दिया है कि यह तैनाती (26 दिसंबर 2025 से 14 फरवरी 2026) बैंकिंग कैलेंडर के सबसे महत्वपूर्ण समय के दौरान की गई है। दिसंबर तिमाही का अंत और मार्च के वित्तीय वर्ष के समापन की तैयारियां इसी अवधि के दौरान होती हैं। लगभग डेढ़ महीने की इस लंबी गैर-बैंकिंग ड्यूटी के कारण अधिकारी अपने मुख्य कार्यों जैसे आंतरिक और बाह्य नियामक अनुपालन, लेखा समापन, ऑडिट और वैधानिक व्यावसायिक लक्ष्यों की प्राप्ति से दूर हो गए हैं।
एआईबीओसी को आशंका है कि अधिकारियों के इस तरह लंबे समय तक कार्यालय से बाहर रहने के कारण ग्राहक सेवा और बैंक के परिचालन परिणामों पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसके साथ ही सरकार की अन्य महत्वपूर्ण वित्तीय योजनाओं के कार्यान्वयन में भी बाधा आएगी। संगठन ने तर्क दिया है कि बैंकिंग संचालन विशिष्ट और समयबद्ध होते हैं, जिन्हें इस तरह लापरवाही से बाधित करने के गंभीर व्यवस्थागत परिणाम हो सकते हैं। यह स्थिति न केवल बैंक के लाभ को प्रभावित करती है बल्कि अधिकारियों के करियर की प्रगति और प्रशिक्षण संबंधी दायित्वों को भी बाधित करती है।
रसद की कमी और अनुचित तैनाती के तरीके पर आपत्ति
परिसंघ ने पश्चिम बंगाल में अधिकारियों की तैनाती के तरीके पर भी कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन का कहना है कि कई अधिकारियों को कोलकाता में प्रशिक्षण देने के बाद अचानक उनके घरों से 750-800 किलोमीटर दूर तैनात कर दिया गया। इस लंबी यात्रा के लिए मजबूर किए जाने के दौरान उन्हें किसी भी प्रकार की उचित रसद या परिवहन सहायता नहीं दी जा रही है। अधिकारियों को अक्सर अपने खर्च पर यात्रा करनी पड़ती है और राज्य चुनाव अधिकारियों की ओर से मिलने वाली सुविधाएं अपर्याप्त हैं।
सबसे गंभीर मुद्दा बीमा कवरेज और आपातकालीन छुट्टी के प्रोटोकॉल का अभाव है। एआईबीओसी के अनुसार, इन तैनाती निर्देशों में चिकित्सा या पारिवारिक आपातकाल के समय छुट्टी लेने की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है, न ही किसी अप्रिय घटना की स्थिति में बीमा का कोई प्रावधान किया गया है। यह स्थिति अधिकारियों को अनावश्यक व्यक्तिगत और व्यावसायिक जोखिमों की ओर धकेल रही है, जिससे उनके पारिवारिक जीवन में भारी व्यवधान पैदा हो रहा है।
पीएसबी और निजी बैंकों के बीच भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण
एआईबीओसी ने एक मूलभूत प्रश्न उठाया है कि इस प्रकार के गैर-बैंकिंग कार्यों के लिए केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) के अधिकारियों को ही क्यों चुना जाता है। संगठन का दावा है कि पश्चिम बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य है जहां सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अधिकारियों को बड़े पैमाने पर एसआईआर प्रक्रिया में शामिल किया जा रहा है, जबकि निजी क्षेत्र के बैंकों के कर्मचारियों को इन नियुक्तियों से पूरी तरह दूर रखा गया है।
परिसंघ ने नीति निर्माताओं का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है कि एक तरफ पीएसबी के प्रदर्शन की तुलना नियमित रूप से निजी बैंकों के साथ की जाती है, और दूसरी तरफ उन्हें व्यापक सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक कार्यों का भारी बोझ सौंप दिया जाता है। यह पीएसबी और उनके कर्मचारियों के प्रति एक अनुचित और भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण है। संगठन की मांग है कि यदि अधिकारियों को गैर-बैंकिंग गतिविधियों में लगाया जाता है, तो उनके मूल्यांकन के समय इन व्यावसायिक मापदंडों को उचित रूप से शामिल किया जाना चाहिए ताकि उनके प्रदर्शन का गलत आकलन न हो।
चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की गुहार
परिसंघ ने इस मामले में वित्तीय सेवा विभाग (DFS) और भारतीय निर्वाचन आयोग से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। एआईबीओसी का कहना है कि चुनाव आयोग के अपने निर्देश यह कहते हैं कि बैंकों और एलआईसी जैसे संस्थानों से केवल न्यूनतम आवश्यक सीमा तक ही कर्मचारियों की भर्ती की जानी चाहिए, ताकि महत्वपूर्ण सार्वजनिक सेवाएं प्रभावित न हों। संगठन ने मांग की है कि चुनाव संबंधी नियुक्तियां रोस्टर-आधारित होनी चाहिए और बैंकिंग जैसे समयबद्ध कार्यों को ध्यान में रखते हुए अधिकारियों को छूट दी जानी चाहिए।
एआईबीओसी ने स्पष्ट किया है कि बैंक अधिकारी राष्ट्रीय हित में सार्वजनिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए हमेशा तैयार हैं और उन्होंने पूर्व में भी ऐसा किया है। लेकिन यह सहयोग व्यक्तिगत सुरक्षा, असमान व्यवहार और मुख्य बैंकिंग कार्यों के विनाशकारी अवरोध की कीमत पर नहीं हो सकता। संगठन ने चेतावनी दी है कि वे इस मामले को तब तक सभी उचित स्तरों पर उठाएंगे जब तक कि इन तैनातियों को तर्कसंगत नहीं बनाया जाता और अधिकारियों की सुरक्षा के लिए ठोस नीतिगत उपाय सुनिश्चित नहीं किए जाते।