• January 20, 2026

कार्बन बजट और अमीरों की विलासिता: साल के पहले 10 दिनों में ही एक प्रतिशत अमीरों ने खत्म किया अपना वार्षिक कोटा

लंदन/न्यूयॉर्क: साल 2026 की शुरुआत दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी के साथ हुई है। जहां एक ओर पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम करने के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं अंतरराष्ट्रीय चैरिटी संस्था ‘ऑक्सफैम’ की एक नई रिपोर्ट ने वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में व्याप्त भयानक असमानता को उजागर कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के शुरुआती महज 10 दिनों के भीतर ही दुनिया के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों ने अपने पूरे साल के लिए निर्धारित ‘कार्बन बजट’ का उपभोग कर लिया है। यह स्थिति न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने की वैश्विक कोशिशें किस तरह मुट्ठी भर लोगों की जीवनशैली के कारण विफल हो रही हैं।

‘पॉल्यूटोक्रैट डे’: जब प्रदूषण ने तोड़ी सारी मर्यादाएं

ऑक्सफैम की इस रिपोर्ट में एक नया और चिंताजनक शब्द सामने आया है— ‘पॉल्यूटोक्रैट डे’ (Pollutocrat Day)। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत लोगों ने तो साल की शुरुआत के केवल तीन दिनों के भीतर, यानी 3 जनवरी तक ही अपना वार्षिक कार्बन कोटा समाप्त कर दिया। यह दिन उस घड़ी को दर्शाता है जब अत्यधिक संपन्न वर्ग का प्रदूषण पूरी मानवता के भविष्य को दांव पर लगा देता है। कार्बन बजट वह वैज्ञानिक सीमा है, जिसके भीतर रहकर यदि उत्सर्जन किया जाए, तो धरती के तापमान में होने वाली वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सकता है। लेकिन अमीरों द्वारा इस सीमा का साल के पहले हफ्ते में ही उल्लंघन करना यह स्पष्ट करता है कि जलवायु संकट का बोझ पूरी दुनिया पर समान रूप से नहीं है।

आंकड़ों की जुबानी: प्रदूषण की खाई और अमीरों का दबदबा

रिपोर्ट में साझा किए गए आंकड़े जलवायु अन्याय की एक भयावह तस्वीर पेश करते हैं। ऑक्सफैम के विश्लेषण के अनुसार, दुनिया के सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत लोग मात्र एक दिन में उतना कार्बन उत्सर्जन करते हैं, जितना दुनिया की आधी गरीब आबादी मिलकर पूरे साल भर में नहीं कर पाती। एक अत्यधिक संपन्न व्यक्ति का दैनिक औसत उत्सर्जन लगभग 800 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड है। इसके विपरीत, दुनिया के सबसे गरीब वर्ग का एक व्यक्ति प्रतिदिन केवल दो किलोग्राम CO2 उत्सर्जित करता है। यह तुलना बताती है कि एक अमीर व्यक्ति का प्रदूषण स्तर एक साधारण व्यक्ति की तुलना में 400 गुना अधिक है। इस असमानता का असर सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग की दर पर पड़ रहा है, जिससे निपटने के लिए गरीब देश और समुदाय संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।

‘क्लाइमेट प्लंडर’: विलासिता और निवेश का घातक संगम

ऑक्सफैम की इस विस्तृत रिपोर्ट का शीर्षक है— ‘क्लाइमेट प्लंडर: हाउ अ पावरफुल फ्यू आर लॉकिंग द वर्ल्ड इंटू डिजास्टर’। यह रिपोर्ट केवल अमीरों की निजी जीवनशैली को ही दोष नहीं देती, बल्कि उनके आर्थिक प्रभुत्व पर भी सवाल उठाती है। रिपोर्ट के अनुसार, सुपर-रिच वर्ग का कार्बन फुटप्रिंट दो स्तरों पर काम करता है। पहला उनकी लग्जरी जीवनशैली है, जिसमें निजी जेट (Private Jets), सुपर-यॉट, विशाल वातानुकूलित घर और बार-बार की जाने वाली अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्राएं शामिल हैं। दूसरा और अधिक खतरनाक स्तर उनका ‘निवेश’ है। एक औसत अरबपति अपने निवेशों के माध्यम से हर साल लगभग 19 लाख टन कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार होता है, क्योंकि उनका पैसा अक्सर जीवाश्म ईंधन, भारी उद्योगों और उच्च उत्सर्जन वाली कंपनियों में लगा होता है।

जलवायु संकट का दोहरा बोझ: जिम्मेदारी कम, खामियाजा ज्यादा

रिपोर्ट का सबसे दुखद पहलू यह है कि जलवायु संकट का सबसे अधिक प्रभाव उन लोगों पर पड़ रहा है जिनकी इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं है। गरीब और विकासशील देशों के समुदाय, जो न्यूनतम ऊर्जा का उपयोग करते हैं और जिनकी जीवनशैली प्रकृति के सबसे करीब है, वे ही आज भीषण बाढ़, अनियंत्रित सूखे और जानलेवा लू (Heatwaves) का सामना कर रहे हैं। उनके पास इन आपदाओं से बचने के लिए न तो मजबूत बुनियादी ढांचा है और न ही पर्याप्त बीमा कवर। ऑक्सफैम का कहना है कि यह एक ‘नैतिक विफलता’ है जहां अमीरों का मुनाफा और ऐशो-आराम गरीबों के जीवन की कीमत पर आ रहा है। जब तक कार्बन उत्सर्जन के लिए उत्तरदायी इन ‘पावरफुल फ्यू’ (शक्तिशाली मुट्ठी भर लोगों) पर सख्त नियामक लगाम नहीं लगाई जाएगी, तब तक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की बातें बेमानी साबित होंगी।

न्यायपूर्ण भविष्य के लिए कठोर नीतिगत बदलाव की जरूरत

ऑक्सफैम की यह रिपोर्ट वैश्विक नेताओं और नीति निर्धारकों के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया है कि केवल सामान्य उत्सर्जन कटौती से काम नहीं चलेगा, बल्कि ‘प्रदूषण फैलाने वाले अमीरों’ पर विशेष कर (Wealth and Carbon Tax) लगाने की आवश्यकता है। निजी जेट के उपयोग पर भारी प्रतिबंध और उच्च-कार्बन निवेशों से विनिवेश को प्रोत्साहित करना अब समय की मांग है। जलवायु न्याय की अवधारणा तभी सफल हो सकती है जब कार्बन बजट का आवंटन न्यायसंगत हो और अत्यधिक उत्सर्जन करने वालों को उनके द्वारा पहुंचाई गई क्षति के लिए जवाबदेह ठहराया जाए। यदि साल के शुरुआती 10 दिनों में ही बजट खत्म होने का यह सिलसिला जारी रहा, तो 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य केवल एक सपना बनकर रह जाएगा।

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