• January 19, 2026

एक भारत, श्रेष्ठ भारत: काशी-तमिल संगमम और सोमनाथ का ‘स्वाभिमान पर्व’ बना सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक

नई दिल्ली/वाराणसी: भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के दो छोरों—उत्तर और दक्षिण—को जोड़ने वाला ‘काशी-तमिल संगमम’ अब केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पहल की सफलता पर गहरी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसे ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को सशक्त करने वाला सबसे प्रभावी मंच बताया है। वाराणसी की धरती पर आयोजित इस संगमम ने न केवल कला और साहित्य का आदान-प्रदान किया है, बल्कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से भाषाई बाधाओं को तोड़कर युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़ने का एक नया दृष्टिकोण भी दिया है। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से युवा पीढ़ी के उत्साह और उनकी सांस्कृतिक चेतना की सराहना करते हुए इसे देश के उज्ज्वल भविष्य का संकेत बताया है।

प्रधानमंत्री ने हाल ही में गुजरात के सोमनाथ में आयोजित ‘स्वाभिमान पर्व’ का भी उल्लेख किया, जो वर्ष 1026 में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले विदेशी आक्रमण के एक हजार साल पूरे होने के अवसर पर मनाया गया। यह संयोग ही है कि एक तरफ काशी में संगम की धारा बह रही है, तो दूसरी तरफ सोमनाथ की पवित्र भूमि पर भारत के कभी न हारने वाले साहस का उत्सव मनाया जा रहा है। ये आयोजन सिद्ध करते हैं कि भारतीय समाज अपने गौरवशाली इतिहास और समृद्ध विरासत को संजोने के लिए आज पहले से कहीं अधिक संकल्पित है।

युवाओं का जुनून और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि काशी-तमिल संगमम के दौरान जिस चीज ने उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह था हमारे युवा साथियों का अद्भुत उत्साह। आज का युवा तकनीक के साथ-साथ अपनी संस्कृति को भी गहराई से जानना चाहता है। संगमम ने युवाओं को एक ऐसा मंच प्रदान किया है जहाँ वे शास्त्रीय संगीत, भरतनाट्यम, लोक कलाओं और तमिल साहित्य के माध्यम से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार, युवाओं का यह ‘पैशन’ इस बात का प्रमाण है कि भारत की प्राचीन परंपराएं सुरक्षित हाथों में हैं।

इस संगमम को सुगम बनाने के लिए भारतीय रेल ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तमिलनाडु के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं, छात्रों और कलाकारों को उत्तर प्रदेश के काशी, प्रयागराज और अयोध्या लाने के लिए विशेष ट्रेनें चलाई गईं। इन यात्राओं ने न केवल लोगों को भौगोलिक रूप से जोड़ा, बल्कि उन्हें उत्तर भारत की आध्यात्मिक ऊर्जा का साक्षात्कार करने का अवसर भी प्रदान किया। युवाओं के लिए यह यात्रा केवल सैर-सपाटा नहीं, बल्कि जीवन की खोज और राष्ट्रीय एकता का एक जीवंत अनुभव बन गई है।

सोमनाथ का स्वाभिमान पर्व: साहस और पुनरुत्थान की गाथा

प्रधानमंत्री ने सोमनाथ की अपनी यात्रा का विवरण साझा करते हुए बताया कि ‘स्वाभिमान पर्व’ एक ऐतिहासिक क्षण था। 1026 के आक्रमण के एक हजार साल बाद, आज का भारत अपनी हार को नहीं बल्कि अपनी विजय और पुनरुत्थान की शक्ति को याद कर रहा है। सोमनाथ मंदिर का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि विनाश की हर कोशिश के बाद भारत और भी भव्यता के साथ उठ खड़ा हुआ है।

प्रधानमंत्री ने वहां ऐसे लोगों से मुलाकात की जो पूर्व में सौराष्ट्र-तमिल संगमम और काशी-तमिल संगमम का हिस्सा रह चुके थे। लोगों के बीच बढ़ते इस संवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सांस्कृतिक संगम की यह परिकल्पना देश के कोने-कोने में स्वीकार की जा रही है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि भारत के लोग जहां अपने इतिहास से गहराई से जुड़े हैं, वहीं उनमें चुनौतियों का सामना करने का अदम्य साहस भी है, और यही वह सूत्र है जो पूरे देश को उत्तर से दक्षिण तक एक माला में पिरोता है।

तमिल भाषा के प्रति प्रधानमंत्री का अनुराग और सरकार का संकल्प

प्रधानमंत्री मोदी ने अत्यंत भावुक स्वर में अपने पुराने विचार को दोहराया कि उन्हें इस बात का हमेशा दुख रहता है कि वे अपने जीवन में दुनिया की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक ‘तमिल’ को नहीं सीख पाए। उन्होंने कहा कि तमिल केवल एक भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान और संस्कृति का महासागर है। वर्तमान सरकार का यह निरंतर प्रयास है कि तमिल संस्कृति और साहित्य को पूरे देश में लोकप्रिय बनाया जाए।

‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की संकल्पना को साकार करने के लिए तमिल गौरव को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाना आवश्यक है। प्रधानमंत्री ने कहा कि काशी-तमिल संगमम इसी दिशा में एक अनूठा प्रयास है। यह आयोजन दर्शाता है कि कैसे हम अपनी विविधता के बावजूद एक-दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हैं और उनमें सामंजस्य खोजते हैं। काशी को इस संगम के लिए सबसे उपयुक्त स्थान बताते हुए उन्होंने कहा कि यह नगरी अनादि काल से मोक्ष, ज्ञान और जीवन के अर्थ की खोज करने वालों की धुरी रही है।

काशी और तमिलनाडु का प्राचीन आत्मीय संबंध

काशी और तमिलनाडु का संबंध सदियों पुराना और आध्यात्मिक है। यदि काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है, तो तमिलनाडु में भगवान राम द्वारा स्थापित रामेश्वरम तीर्थ है। तमिलनाडु के ‘तेनकासी’ को तो आज भी ‘दक्षिण की काशी’ के रूप में पूजा जाता है। प्रधानमंत्री ने महाकवि सुब्रमण्यम भारती के योगदान को याद करते हुए कहा कि उनके राष्ट्रवाद की जड़ें काशी में ही प्रबल हुई थीं। काशी के बौद्धिक वातावरण ने ही भारती जी की कविताओं को वह धार दी, जिसने स्वतंत्र और अखंड भारत की संकल्पना को एक स्पष्ट दिशा प्रदान की।

इसी प्रकार, पूज्य कुमारगुरुपरर् स्वामी जी ने अपनी आध्यात्म परंपरा के माध्यम से काशी और तमिलनाडु के बीच एक ऐसा सेतु बनाया था जो आज भी अटूट है। काशी के तमिल समाज ने इस शहर की सांस्कृतिक बनावट में अपना अमूल्य योगदान दिया है। यह संगमम वास्तव में उस पुराने रिश्ते को आधुनिक स्वरूप में नई ऊर्जा देने का माध्यम है।

संगमम का क्रमिक विकास और तकनीक का समावेश

वर्ष 2022 में शुरू हुआ काशी-तमिल संगमम हर साल अपने दायरे और तकनीक में विस्तार कर रहा है। पहले संस्करण की सफलता के बाद, इसमें लेखकों, किसानों और विद्यार्थियों की भागीदारी बढ़ाई गई। वर्ष 2023 में आयोजित दूसरे संस्करण में सरकार ने ‘भाषा’ की बाधा को दूर करने के लिए तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग किया। रीयल-टाइम अनुवाद (AI-based translation) के माध्यम से तमिल भाषी लोग काशी के विद्वानों की बात समझ सके और उत्तर भारतीय लोग तमिल ज्ञान परंपरा से रूबरू हो सके।

तीसरे संस्करण में ‘इंडियन नॉलेज सिस्टम’ (IKS) पर विशेष ध्यान दिया गया, जिसमें आयुर्वेद, खगोल विज्ञान और गणित जैसे विषयों पर संवाद हुआ। इन आयोजनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि संगमम केवल एक उत्सव न रहे, बल्कि एक बौद्धिक और रचनात्मक मंच बने जहाँ भविष्य की योजनाओं पर चर्चा हो सके।

चौथा संस्करण: ‘तमिल करकलम्’ और डिजिटल साक्षरता का अभियान

2 दिसंबर, 2025 को शुरू हुए काशी-तमिल संगमम के चौथे संस्करण ने एक नई ऊंचाई छुई है। इस बार की थीम ‘तमिल करकलम्’ यानी ‘तमिल सीखें’ रखी गई। इस पहल के तहत काशी के स्थानीय लोगों और विद्यार्थियों को तमिल भाषा के प्रारंभिक अक्षर और संवाद सीखने का अवसर मिला। तमिलनाडु से आए विशेष शिक्षकों ने इस अनुभव को विद्यार्थियों के लिए यादगार बना दिया।

इसके अतिरिक्त, इस बार ‘तेनकासी से काशी’ तक एक विशेष व्हीकल एक्सपेडिशन (वाहन यात्रा) का आयोजन किया गया, जिसने रास्ते में पड़ने वाले राज्यों में सांस्कृतिक एकता का संदेश फैलाया। काशी में स्वास्थ्य शिविरों और ‘डिजिटल लिट्रेसी कैंप’ के माध्यम से समाज सेवा के कार्यों को भी इस आयोजन से जोड़ा गया। इस अभियान के दौरान पांड्य वंश के महान राजा वीर पराक्रम पांडियन जी को विशेष श्रद्धांजलि अर्पित की गई, जिन्होंने अपने शासनकाल के दौरान सांस्कृतिक एकता के लिए अभूतपूर्व कार्य किए थे।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्र निर्माण का मार्ग

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश के अंत में कहा कि काशी-तमिल संगमम और सोमनाथ के स्वाभिमान पर्व जैसे आयोजन भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के स्तंभ हैं। ये आयोजन बताते हैं कि भारत अपनी विरासत पर गर्व करना सीख गया है। जब हम अपनी जड़ों का सम्मान करते हैं, तभी हम एक विकसित और आधुनिक राष्ट्र के रूप में खड़े हो सकते हैं।

तमिलनाडु की ज्ञान परंपरा और काशी की आध्यात्मिक चेतना का यह मिलन आने वाले समय में देश की अखंडता को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा। प्रधानमंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि यह संगमम आने वाले वर्षों में और अधिक भव्य होगा और भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का एक वैश्विक चेहरा बनकर उभरेगा। यह आयोजन केवल दो राज्यों का मिलन नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के दिलों को जोड़ने वाली एक पवित्र धारा है।

Digiqole Ad

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *