• February 10, 2026

आवाज की टोन से खुलेगा मानसिक सेहत का राज: एम्स के शोधकर्ताओं का बड़ा दावा, अब आपकी वाणी सुनकर होगा डिप्रेशन का सटीक आकलन

नई दिल्ली: चिकित्सा विज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत ने एक ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है, जो आने वाले समय में अवसाद यानी डिप्रेशन की पहचान और उपचार की दिशा बदल सकती है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के शोधकर्ताओं ने एक क्रांतिकारी अध्ययन के बाद यह दावा किया है कि अब किसी व्यक्ति की आवाज सुनकर ही यह पता लगाया जा सकता है कि वह अवसाद से जूझ रहा है या नहीं। यह शोध विशेष रूप से उन लोगों के लिए आशा की नई किरण बनकर उभरा है जो सामाजिक संकोच या जागरूकता की कमी के कारण मानसिक विशेषज्ञों के पास जाने से कतराते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और डेटा वैज्ञानिकों की इस संयुक्त टीम ने अपने शोध के दौरान पाया कि अवसाद न केवल व्यक्ति के व्यवहार और विचारों को प्रभावित करता है, बल्कि उसके बोलने के तरीके, गले से निकलने वाली ध्वनि की तरंगों और शब्दों के चयन को भी गहराई से बदल देता है। एम्स के इस अध्ययन में सैकड़ों प्रतिभागियों की आवाजों के नमूनों का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया, जिसमें स्वस्थ व्यक्तियों और नैदानिक रूप से अवसादग्रस्त पाए गए मरीजों के स्वर-तंत्र का तुलनात्मक अध्ययन शामिल था।

डिप्रेशन में कैसे बदल जाती है व्यक्ति की आवाज?

एम्स के शोधकर्ताओं ने विस्तार से बताया कि जब कोई व्यक्ति मानसिक रूप से अवसाद की स्थिति में होता है, तो उसके मस्तिष्क और स्वर-ग्रंथियों के बीच का सामंजस्य बदल जाता है। शोध में पाया गया कि डिप्रेशन से पीड़ित लोगों की आवाज में कुछ विशिष्ट और स्पष्ट लक्षण होते हैं। ऐसे लोगों की बोलने की गति सामान्य से काफी धीमी हो जाती है। उनकी आवाज में मौजूद ‘वोकल एनर्जी’ या ऊर्जा का स्तर बहुत कम पाया गया। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव भावनाओं की अभिव्यक्ति में देखा गया; अवसादग्रस्त व्यक्ति की आवाज अक्सर ‘सपाट’ (Flat) और ‘थकी हुई’ महसूस होती है। उनकी वाणी में वह उतार-चढ़ाव और उत्साह गायब हो जाता है जो एक मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति में होता है।

अध्ययन के अनुसार, डिप्रेशन से प्रभावित लोग शब्दों के बीच लंबे अंतराल (Pause) लेते हैं और उनकी आवाज में एक प्रकार का भारीपन या कंपन महसूस किया जा सकता है। यह तकनीक इन बारीक परिवर्तनों को पकड़ने में सक्षम है, जिन्हें सामान्य मानवीय कान अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।

तकनीकी सटीकता और भविष्य की संभावनाएं

शोध के परिणामों ने चिकित्सा जगत को अचंभित कर दिया है। प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार, आवाज आधारित इस तकनीक ने 60 से 75 प्रतिशत तक सटीक परिणाम दिए हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति की आवाज का नमूना लंबे समय तक रिकॉर्ड किया जाए, तो इस तकनीक की सटीकता 80 प्रतिशत से भी ऊपर जा सकती है। यह शोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अवसाद की पारंपरिक पहचान के लिए विस्तृत मनोवैज्ञानिक साक्षात्कार और फॉर्म भरने की आवश्यकता होती है, जो काफी समय लेने वाली प्रक्रिया है। इसके विपरीत, आवाज विश्लेषण तकनीक कुछ ही मिनटों में परिणाम दे सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक उन क्षेत्रों के लिए वरदान साबित होगी जहां मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों या मनोचिकित्सकों की भारी कमी है। इसे मोबाइल एप्लिकेशन या टेली-कंसल्टेशन सेवाओं के साथ एकीकृत किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई व्यक्ति हेल्पलाइन पर कॉल करता है, तो कॉल के दौरान उसकी आवाज का विश्लेषण करके शुरुआती स्तर पर ही अवसाद के संकेतों की पहचान की जा सकेगी। इससे स्वास्थ्य कर्मियों को मरीज को समय रहते उचित चिकित्सा सहायता के लिए प्रेरित करने में मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों की सलाह: तकनीक सहायक है, विकल्प नहीं

हालांकि, एम्स के डॉक्टरों और इस शोध दल ने एक महत्वपूर्ण वैधानिक चेतावनी भी साझा की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह आवाज आधारित तकनीक एक ‘सहायक उपकरण’ (Screening Tool) के रूप में कार्य करेगी, न कि किसी मनोचिकित्सक द्वारा की जाने वाली नैदानिक जांच के विकल्प के रूप में। डिप्रेशन एक जटिल बीमारी है जिसके पीछे अनुवांशिक, सामाजिक और जैविक कारण हो सकते हैं। इसलिए, तकनीक द्वारा संकेत मिलने के बाद भी अंतिम पुष्टि और उपचार के लिए विशेषज्ञ की सलाह अनिवार्य होगी।

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ इसकी कम लागत और त्वरित परिणाम हैं। भारत जैसे देश में, जहां आज भी मानसिक रोगों को लेकर एक सामाजिक कलंक (Stigma) जुड़ा हुआ है, वहां यह तकनीक लोगों को बिना किसी संकोच के शुरुआती जांच कराने में मदद करेगी। यदि शुरुआती स्तर पर ही अवसाद का पता चल जाए, तो परामर्श (Counseling) और जीवनशैली में बदलाव के जरिए इसे गंभीर रूप लेने से रोका जा सकता है।

एम्स का यह शोध वर्तमान में अगले चरण के परीक्षणों के लिए तैयार है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के प्रभावों का भी अध्ययन किया जाएगा ताकि इसकी व्यापकता को सुनिश्चित किया जा सके। आने वाले समय में, यह संभव है कि आपका स्मार्टफोन ही आपको आपके मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत कर दे, जिससे अनगिनत जिंदगियों को समय रहते बचाया जा सकेगा।

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