• March 3, 2026

ओवैसी का पीएम मोदी पर तीखा प्रहार: ट्रंप ने मादुरो को पकड़ा, तो आप 26/11 के गुनहगारों को पाकिस्तान से क्यों नहीं लाते?

मुंबई/नई दिल्ली: राजनीति में अपने बेबाक बयानों के लिए मशहूर एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार फिर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। शनिवार को मुंबई में आयोजित एक विशाल जनसभा में ओवैसी ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के हालिया घटनाक्रमों, विशेषकर अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई का उदाहरण देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और आतंकवाद के खिलाफ सरकार के दावों पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने सीधे तौर पर पूछा कि यदि अमेरिका दूसरे देश में घुसकर किसी राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर सकता है, तो भारत अब तक 26/11 मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड्स को पाकिस्तान से वापस क्यों नहीं ला सका है।

ट्रंप की कार्रवाई और ओवैसी का रणनीतिक सवाल

ओवैसी का यह हमला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला में किए गए एक सनसनीखेज सैन्य ऑपरेशन के संदर्भ में आया है। हाल ही में अमेरिकी विशेष बलों ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लेकर अमेरिका ले जाने का दावा किया है। ओवैसी ने इसी घटना को आधार बनाकर केंद्र सरकार की ‘मजबूत इच्छाशक्ति’ और ’56 इंच के सीने’ वाले नैरेटिव पर तंज कसा।

उन्होंने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि दुनिया ने देखा कि किस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सेना ने वेनेजुएला जैसे देश में प्रवेश किया और वहां के राष्ट्रपति को पकड़कर अमेरिका की अदालत के सामने खड़ा कर दिया। ओवैसी ने तर्क दिया कि यदि कोई महाशक्ति अपने राष्ट्रीय हितों और न्याय के लिए इस तरह की कार्रवाई कर सकती है, तो भारत, जो खुद को एक उभरती हुई विश्व शक्ति मानता है, पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे आतंकियों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करने से क्यों कतरा रहा है।

26/11 के मास्टरमाइंड्स और इंसाफ का अधूरा इंतजार

असदुद्दीन ओवैसी ने मुंबई की धरती से अपनी आवाज बुलंद करते हुए 26/11 के आतंकी हमलों के घावों को एक बार फिर हरा कर दिया। उन्होंने लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे खतरनाक आतंकी संगठनों का नाम लेते हुए कहा कि मुंबई ने वह भयावह मंजर देखा है जब बेगुनाहों का खून सड़कों पर बहा था। ओवैसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को संबोधित करते हुए सवाल किया कि आखिर कब तक भारत केवल डोजियर सौंपता रहेगा?

ओवैसी ने तीखे लहजे में कहा कि मसूद अजहर और हाफिज सईद जैसे आतंकी, जिन्होंने भारत की संप्रभुता को चुनौती दी और सैकड़ों परिवारों को तबाह कर दिया, वे आज भी पाकिस्तान की सरजमीं पर सुरक्षित हैं। उन्होंने सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि अगर आप वाकई में आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति रखते हैं, तो उन अपराधियों को पकड़कर भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने पेश कीजिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश की जनता आज भी उन आतंकियों के खिलाफ अंतिम और निर्णायक इंसाफ का इंतजार कर रही है।

56 इंच के सीने पर तंज और सैन्य ताकत का आह्वान

ओवैसी के भाषण का सबसे आक्रामक हिस्सा वह था जहां उन्होंने ’56 इंच के सीने’ वाले बहुचर्चित जुमले का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, “मोदी जी, अगर आपका सीना वाकई 56 इंच का है, तो मसूद अजहर जैसे 26/11 के गुनहगारों को पाकिस्तान से उठाकर भारत क्यों नहीं लाते?” उन्होंने आगे कहा कि केवल चुनावी रैलियों में दहाड़ने से आतंकवाद खत्म नहीं होता, इसके लिए वैसी ही ठोस कार्रवाई की जरूरत होती है जैसी अमेरिका या सऊदी अरब जैसे देश अपनी सैन्य ताकत का इस्तेमाल करके दिखाते हैं।

एआईएमआईएम प्रमुख ने सरकार की कूटनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि बार-बार पाकिस्तान को चेतावनी देने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसे अलग-थलग करने के दावों के बावजूद जमीन पर कोई बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है। उनके अनुसार, अगर भारत वास्तव में एक सैन्य और रणनीतिक शक्ति है, तो उसे अपनी सीमाओं के बाहर जाकर उन लोगों को सजा देनी चाहिए जिन्होंने भारतीय नागरिकों की हत्या की साजिश रची थी।

वेनेजुएला में अमेरिकी ऑपरेशन: क्या था पूरा मामला?

ओवैसी के इस बयान के पीछे की पृष्ठभूमि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह हालिया सोशल मीडिया दावा है, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया था। ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिकी विशेष बलों (Special Forces) ने एक गुप्त ऑपरेशन को अंजाम देते हुए वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को उनके देश से हिरासत में ले लिया है। ट्रंप के मुताबिक, मादुरो पर लंबे समय से ड्रग तस्करी, नार्को-टेररिज्म और अमेरिका के खिलाफ आपराधिक साजिश रचने के गंभीर आरोप थे।

अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई कानून प्रवर्तन एजेंसियों और सैन्य बलों के संयुक्त प्रयास का परिणाम थी। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संप्रभुता और विदेशी हस्तक्षेप की एक नई बहस छेड़ दी है। हालांकि, ओवैसी ने इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम को भारतीय संदर्भ में जोड़ते हुए इसे घरेलू राजनीति और सुरक्षा नीति का एक बड़ा मुद्दा बना दिया है। उन्होंने इसे एक बेंचमार्क की तरह पेश किया, जिसे पार करने की उम्मीद वह मोदी सरकार से कर रहे हैं।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और सुरक्षा नीति पर बहस

ओवैसी के इस बयान के बाद महाराष्ट्र और केंद्र की राजनीति में सरगर्मी बढ़ गई है। जहां विपक्षी दल इसे सरकार की ‘कमजोर’ विदेश नीति का परिणाम बता रहे हैं, वहीं भाजपा समर्थकों और सरकारी हलकों में इसे ओवैसी की ‘राजनीतिक बयानबाजी’ करार दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और अन्य नेताओं ने अक्सर आतंकवाद के खिलाफ की गई सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक का हवाला देकर सरकार का बचाव किया है, लेकिन ओवैसी का तर्क है कि जब तक मास्टरमाइंड्स को भारत की जेलों में नहीं लाया जाता, तब तक कार्रवाई अधूरी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ओवैसी ने इस बयान के जरिए न केवल केंद्र सरकार को घेरा है, बल्कि मुंबई के मतदाताओं की भावनाओं को भी छूने की कोशिश की है, जो 26/11 के हमलों के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि राष्ट्रवाद के दावों और हकीकत के बीच एक बड़ी खाई है, जिसे पाटने में मौजूदा सरकार विफल रही है।

निष्कर्ष: क्या भारत बदल पाएगा अपनी रणनीति?

असदुद्दीन ओवैसी का यह सवाल भारतीय सुरक्षा और विदेश नीति के उन बुनियादी पहलुओं को छूता है, जिनका जवाब देना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं है। पाकिस्तान जैसे परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी देश में घुसकर किसी आतंकी को उठाकर लाना और वेनेजुएला जैसे देश में अमेरिकी कार्रवाई के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। हालांकि, ओवैसी का उद्देश्य कूटनीतिक जटिलताओं को समझना नहीं, बल्कि सरकार के उन दावों की सत्यता की जांच करना है जो वे जनता के बीच करते आए हैं।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या केंद्र सरकार ओवैसी के इन तीखे सवालों का कोई आधिकारिक जवाब देती है या फिर भारत की सुरक्षा एजेंसियां भविष्य में किसी ऐसे ‘डॉकिंग ऑपरेशन’ की योजना बनाती हैं जो आतंकियों के मन में खौफ पैदा कर सके। फिलहाल, ओवैसी के इस बयान ने देश की राजनीति में ‘राष्ट्रवाद’ और ‘सुरक्षा’ की बहस को एक नया मोड़ दे दिया है।

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