• July 5, 2026

यूपी चुनाव 2027 से पहले सियासी हलचल तेज, भाजपा ने सहयोगियों के साथ बनाई रणनीति; सपा-कांग्रेस में सीटों पर खींचतान

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर रणनीति को मजबूत कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर मतभेद सामने आ रहे हैं। दो दिवसीय दौरे पर उत्तर प्रदेश पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने रविवार को स्पष्ट किया कि पार्टी अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी और एक बार फिर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने का लक्ष्य रखती है। उन्होंने कहा कि चुनावी रणनीति में सहयोगी दलों की भूमिका को प्राथमिकता दी जाएगी।

सहयोगी दलों के साथ भाजपा की रणनीति

भाजपा लंबे समय से उत्तर प्रदेश में एनडीए गठबंधन के तहत सहयोगी दलों के साथ मिलकर चुनावी रणनीति अपनाती रही है। 2014 के बाद से पार्टी ने विशेष रूप से पिछड़े समाज के नेताओं को साथ जोड़कर गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने की दिशा में काम किया है। इस रणनीति के तहत भाजपा ने ओम प्रकाश राजभर (सुभासपा), डॉ. संजय निषाद (निषाद पार्टी) और अनुप्रिया पटेल (अपना दल-एस) जैसे नेताओं के साथ गठबंधन कर अपनी राजनीतिक पकड़ को मजबूत किया है। माना जाता है कि इन गठबंधनों ने पार्टी को विभिन्न सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने में मदद की है।

सपा-कांग्रेस में सीटों पर खींचतान

दूसरी ओर, विपक्षी गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं दिख रही है। कांग्रेस की ओर से उत्तर प्रदेश प्रभारी ने हाल ही में सीटों के समान बंटवारे की बात उठाई है, जबकि समाजवादी पार्टी अपने प्रभाव के आधार पर अधिक सीटों की मांग कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि दोनों दलों के बीच सहमति बनने में देरी होती है, तो इससे चुनावी तैयारियों पर असर पड़ सकता है।

भाजपा की समयबद्ध रणनीति पर जोर

भाजपा का फोकस सहयोगी दलों के साथ पहले से ही सीटों और रणनीति को अंतिम रूप देने पर है, ताकि उम्मीदवारों को पर्याप्त समय मिल सके और वे जमीनी स्तर पर तैयारी कर सकें। पार्टी का मानना है कि पहले से तय सीट बंटवारा चुनावी समन्वय और संगठन को मजबूत बनाता है। नितिन नवीन ने लखनऊ में ताज होटल में भी सहयोगी दलों के नेताओं के साथ बैठक की और संयुक्त रूप से चुनाव लड़ने की प्रतिबद्धता दोहराई।

2014 के बाद की रणनीति का असर

विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा ने 2014 के बाद से ही सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए सहयोगी दलों के साथ मिलकर रणनीति बनाई है। गैर-यादव ओबीसी वर्ग को साधने के लिए छोटे और क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन को पार्टी की प्रमुख राजनीतिक रणनीति माना जाता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि भाजपा इसी रणनीति पर आगे बढ़ती है, तो आगामी चुनाव में भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।

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