मशीन के दौर में उर्दू अदब को आगे कैसे बढ़ाया जाए: लखनऊ में एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में विद्वानों ने की गहन चर्चा
लखनऊ: ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के उर्दू विभाग ने एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया। विषय था – समकालीन उर्दू साहित्य में प्रगतिशील विचारधाराओं पर फिर से विचार। सेमिनार में उर्दू अदब की प्रगतिशील परंपरा, तरक्की-पसंद तहरीक की प्रासंगिकता और मशीन/टेक्नोलॉजी के दौर में उर्दू साहित्य के भविष्य पर गहन विचार-विमर्श हुआ।
कार्यक्रम का संयोजन और उद्घाटन
सेमिनार के संयोजक प्रो. सौबान सईद ने सभी अतिथि विद्वानों का स्वागत करते हुए उनका परिचय दिया। उन्होंने कहा कि आज के समाज में उर्दू अदब एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और प्रगतिशील सोच को जीवित रखने की जरूरत है।विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा ने मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि उर्दू भाषा 1920 से तरक्की-पसंद विचारधारा को आगे बढ़ाने में सक्रिय है। आजादी की लड़ाई में उर्दू को अंग्रेजों ने ‘विद्रोह की भाषा’ कहा था। आज भी कॉलोनियलिज्म, फेमिनिज्म, मॉडर्निज्म जैसे आंदोलनों में भाषा के माध्यम से समाज सुधार संभव है।
सेमिनार के संयोजक प्रो. सौबान सईद ने सभी अतिथि विद्वानों का स्वागत करते हुए उनका परिचय दिया। उन्होंने कहा कि आज के समाज में उर्दू अदब एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और प्रगतिशील सोच को जीवित रखने की जरूरत है।विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा ने मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि उर्दू भाषा 1920 से तरक्की-पसंद विचारधारा को आगे बढ़ाने में सक्रिय है। आजादी की लड़ाई में उर्दू को अंग्रेजों ने ‘विद्रोह की भाषा’ कहा था। आज भी कॉलोनियलिज्म, फेमिनिज्म, मॉडर्निज्म जैसे आंदोलनों में भाषा के माध्यम से समाज सुधार संभव है।

उन्होंने उर्दू विभाग और आयोजकों को बधाई दी।मुख्य वक्ताओं के विचार
- आमिर मेंहदी (चीफ एडिटर, सहाफत, यू.के.): तरक्की-पसंद सोच समाज के विकास के लिए अनिवार्य है। जब तक जुल्म, ज्यादती और नाइंसाफी रहेगी, तब तक इस आंदोलन की जरूरत बनी रहेगी। महिलाओं की आजादी और बराबरी के बिना समाज का विकास नामुमकिन है।
- प्रो. ख्वाजा इकरामुद्दीन (जे.एन.यू.): उर्दू अब पूरी दुनिया में बोली जाती है। अमीर खुसरो को उर्दू का पहला शायर बताते हुए उन्होंने महबूब के बदलते स्वरूप पर चर्चा की। दक्कन में महबूब को सूरज से जोड़ा गया। मीर का दौर उर्दू का स्वर्णिम काल था। दिल्ली और लखनऊ इसके दो प्रमुख केंद्र बने। उन्होंने सवाल उठाया – मशीन के दौर में उर्दू अदब को आगे कैसे बढ़ाया जाए?
- प्रो. अब्बास रज़ा नैय्यर: टेक्नोलॉजी ने डिक्शन को बदल दिया है। कार्ल मार्क्स की ‘दास कैपिटल’ का जिक्र करते हुए कहा कि समान तनख्वाह की बात अच्छी है, लेकिन व्यावहारिक उदाहरण की कमी है।
- प्रो. सैयद शफीक अहमद अशरफी: तरक्की-पसंद तहरीक को समझने और उस पर और काम करने की जरूरत है। उन्होंने विभाग की लाइब्रेरी को एक महत्वपूर्ण पुस्तक भेंट की।

अन्य प्रमुख उपस्थिति
सेमिनार में सेंट जॉन्स कॉलेज, आगरा से डॉ. सैयद सिब्ते हसन नकवी, प्रो. मसूद आलम (अरबी विभाग), प्रो. रेशमा परवीन (लखनऊ), डॉ. इशरत नाहीद (मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय) सहित बड़ी संख्या में शिक्षाविद, शोधार्थी और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।कार्यक्रम का संचालन उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. फखरे आलम ने किया। धन्यवाद प्रस्ताव डॉ. मो. अकमल ने रखा। आयोजन सचिव डॉ. वसी आजम अंसारी, डॉ. मुर्तजा अली अतहर, डॉ. मुनव्वर हुसैन, डॉ. जफरुन नकी, डॉ. सिद्धार्थ सुदीप, प्रो. तनवीर खदीजा (अंग्रेजी विभाग), डॉ. नलिनी मिश्रा (शिक्षा विभाग) आदि ने सक्रिय भूमिका निभाई।सेमिनार ने समकालीन उर्दू साहित्य में प्रगतिशीलता की प्रासंगिकता और डिजिटल युग में उर्दू की चुनौतियों-संभावनाओं पर सार्थक बहस छेड़ी।
सेमिनार में सेंट जॉन्स कॉलेज, आगरा से डॉ. सैयद सिब्ते हसन नकवी, प्रो. मसूद आलम (अरबी विभाग), प्रो. रेशमा परवीन (लखनऊ), डॉ. इशरत नाहीद (मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय) सहित बड़ी संख्या में शिक्षाविद, शोधार्थी और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।कार्यक्रम का संचालन उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. फखरे आलम ने किया। धन्यवाद प्रस्ताव डॉ. मो. अकमल ने रखा। आयोजन सचिव डॉ. वसी आजम अंसारी, डॉ. मुर्तजा अली अतहर, डॉ. मुनव्वर हुसैन, डॉ. जफरुन नकी, डॉ. सिद्धार्थ सुदीप, प्रो. तनवीर खदीजा (अंग्रेजी विभाग), डॉ. नलिनी मिश्रा (शिक्षा विभाग) आदि ने सक्रिय भूमिका निभाई।सेमिनार ने समकालीन उर्दू साहित्य में प्रगतिशीलता की प्रासंगिकता और डिजिटल युग में उर्दू की चुनौतियों-संभावनाओं पर सार्थक बहस छेड़ी।