नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने POCSO मामलों में असंवेदनशील भाषा पर सख्त रुख अपनाया, इलाहाबाद हाईकोर्ट के विवादित आदेश पर स्वत: संज्ञान
नई दिल्ली, 10 फरवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों से संबंधित मामलों, खासकर POCSO एक्ट के तहत, अदालतों में इस्तेमाल होने वाली भाषा और टिप्पणियों की संवेदनशीलता पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने मार्च 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा पारित एक विवादित आदेश पर स्वत: संज्ञान लिया, जिसमें 11 साल की नाबालिग बच्ची के साथ छेड़छाड़ के मामले में आरोपों को “रेप के प्रयास” से हटाकर केवल “छेड़छाड़” तक सीमित कर दिया गया था।
इस आदेश में हाईकोर्ट ने कहा था कि आरोपी द्वारा बच्ची के स्तनों को पकड़ना, उसके सलवार/पायजामा का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश “रेप के प्रयास” का अपराध साबित नहीं करती, बल्कि यह गंभीर यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आता है। साथ ही, कुछ टिप्पणियां ऐसी थीं जो पीड़िता की सहमति या व्यवहार को दोषी ठहराने वाली लगती थीं, जैसे “वह आरोपी के साथ जाने के लिए सहमत हो गई थी, इसलिए आपने उसे ऐसी हरकत करने को आमंत्रित किया”।वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता (एमिकस क्यूरी) ने कोर्ट में कहा कि इस तरह की भाषा अपराध की गंभीरता को कमतर दिखाती है और पीड़िताओं पर “चिलिंग इफेक्ट” डालती है। उन्होंने कोलकाता रेप मामले सहित अन्य उदाहरणों का जिक्र किया जहां इसी तरह की असंवेदनशील टिप्पणियां की गईं। उन्होंने बताया कि केरल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के पीड़ित अधिकार केंद्र के सहयोग से उम्र के अनुरूप संवेदनशील भाषा पर काम किया जा रहा है।सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान दो प्रमुख मुद्दों पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “इस संबंध में दो मुद्दे हैं। मुख्य मामला पीड़ित के बारे में है, जहां हम चिंतित हैं। यह अपमानजनक और उम्रभर पीड़ादायक अनुभव बन जाता है। पीड़ित भावनात्मक रूप से टूट जाता है। दूसरा मुद्दा इस तरह के मामलों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा के संबंध में ध्यान में रखे जाने वाले दिशा-निर्देशों और व्यापक सिद्धांतों का है। इस बारे में बार भी सहायता करें।”सीजेआई ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट अदालतों में इस्तेमाल होने वाली भाषा पर न्यायिक दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। उन्होंने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी से न्यायाधीशों को POCSO और यौन अपराधों के मामलों में विशेष प्रशिक्षण देकर संवेदनशील बनाने पर विचार करने को कहा।
वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फूलका ने बताया कि 2021 में भी ऐसी ही कवायद हुई थी और एक हैंडबुक प्रकाशित की गई थी, लेकिन उसका उपयोग नहीं हो रहा। सीजेआई ने जवाब दिया कि वह पुस्तिका “हार्वर्ड भाषा” में जटिल है। उन्होंने कहा कि भाषा का उपयोग कहां, कब और किन परिस्थितियों में करना है, इसका तार्किक संबंध होना चाहिए। यह सिर्फ छोटी पुस्तिका नहीं हो सकती, बल्कि सामाजिक लोकाचार, सांस्कृतिक संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए व्यापक दिशानिर्देश बनाए जाने चाहिए।सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है और ट्रायल को बिना किसी प्रभाव के जारी रखने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी टिप्पणियां पीड़िताओं को शिकायत दर्ज करने या सहयोग करने से रोक सकती हैं और समाज में नकारात्मक प्रभाव डालती हैं।यह मामला POCSO और यौन हिंसा के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कोर्ट ने वकीलों से लिखित सुझाव मांगे हैं और आगे की सुनवाई में व्यापक दिशानिर्देश जारी करने पर विचार करेगा।