‘डील’ नहीं यह सरकार का ‘ढीलापन’ है: अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर अखिलेश यादव का तीखा हमला, डेयरी आयात और सनातन व्रत पर उठाए सवाल
लखनऊ/नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में संपन्न हुए व्यापार समझौते को लेकर देश की राजनीति में उबाल आ गया है। जहाँ केंद्र सरकार इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है, वहीं विपक्ष ने इस पर तीखा हमला बोला है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव ने इस ट्रेड डील को लेकर सरकार को आड़े हाथों लेते हुए इसे देश के हितों के साथ खिलवाड़ करार दिया है। अखिलेश यादव ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में तंज कसते हुए कहा कि अमेरिका के साथ की गई यह संधि वास्तव में कोई ‘डील’ नहीं, बल्कि सरकार का ‘ढीलापन’ है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस समझौते की आड़ में सरकार ने भारत का विशाल बाजार पूरी तरह से अमेरिकी कंपनियों को परोस दिया है, जिससे न केवल अर्थव्यवस्था बल्कि देश की सांस्कृतिक मान्यताओं पर भी संकट खड़ा हो गया है।
सपा प्रमुख ने इस मुद्दे को उठाते हुए विशेष रूप से डेयरी उत्पादों के आयात पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने इस आर्थिक विषय को भारतीय समाज की धार्मिक भावनाओं और ‘सनातन धर्म’ के रीति-रिवाजों से जोड़ते हुए सरकार को घेरा। अखिलेश यादव ने तर्क दिया कि भारत में दूध और उससे बने उत्पादों का महत्व केवल खान-पान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे व्रत, त्योहारों और पवित्र अनुष्ठानों का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि डेयरी उत्पाद भारी मात्रा में अमेरिका से आयात किए जाएंगे, तो भारतीय नागरिकों और विशेषकर सनातन धर्म को मानने वालों की आस्था की शुद्धता का क्या होगा? उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि सनातनियों को अब गंभीरता से सोचना होगा कि विदेशी डेयरी उत्पादों के आने के बाद उनका व्रत ‘सनातन’ कैसे बना रहेगा। उनके अनुसार, यह केवल व्यापार का मामला नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीयों की पारंपरिक शुचिता और जीवनशैली पर सीधा प्रहार है।
अखिलेश यादव ने अपनी दलीलों को विस्तार देते हुए कहा कि डेयरी उत्पादों का आयात भारतीय किसानों और पशुपालकों की कमर तोड़ देगा। उन्होंने सरकार से सवाल किया कि जो देश ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा देता है, वह अपनी सबसे बुनियादी जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता क्यों बढ़ा रहा है? उनका आरोप है कि अमेरिकी डेयरी बाजार के लिए भारत के दरवाजे खोलकर सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को असुरक्षित कर दिया है। यादव का मानना है कि विदेशी उत्पादों की गुणवत्ता और उनके प्रसंस्करण की प्रक्रिया भारतीय मानकों और धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं हो सकती, जिससे व्रत और उपवास रखने वाले लोगों के मन में हमेशा एक संदेह बना रहेगा।
व्यापार समझौते के साथ-साथ अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय सुरक्षा और चीन के साथ भारत के संबंधों पर भी भाजपा सरकार को जमकर घेरा। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह महत्वपूर्ण मुद्दों पर संसद और जनता के सामने चर्चा करने से कतराती है। यादव ने कहा कि जब भी विपक्ष ने चीन सीमा पर मौजूदा स्थिति या द्विपक्षीय संबंधों के बारे में विस्तार से जानना चाहा है, भाजपा सरकार हमेशा पीछे हट गई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा जैसे गंभीर विषयों पर फैसले हमेशा बहुत सोच-समझकर और पारदर्शी तरीके से लिए जाने चाहिए, क्योंकि यह देश की संप्रभुता का सवाल है।
सपा नेता ने एक गंभीर दावा करते हुए कहा कि भारत न केवल चीन के सामने अपनी जमीन खो रहा है, बल्कि अपना बाजार भी खोता जा रहा है। उन्होंने कहा कि देश के नागरिकों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि सीमा पर असल स्थिति क्या है और भारतीय सेना का इस मुद्दे पर क्या रुख है। उनके अनुसार, एक तरफ चीन हमारी सीमाओं पर अतिक्रमण कर रहा है और दूसरी तरफ सरकार अमेरिका जैसी महाशक्तियों के सामने बाजार खोलकर देश की आर्थिक स्वायत्तता को कमजोर कर रही है। उन्होंने सवाल किया कि यदि हम अपनी जमीन और बाजार दोनों ही खोते रहेंगे, तो भविष्य में भारत किस दिशा में जाएगा?
यादव ने अपने संबोधन में यह भी रेखांकित किया कि सरकार द्वारा पेश किए जा रहे सुनहरे आंकड़े हकीकत से कोसों दूर हैं। उन्होंने कहा कि टैरिफ कम करने और विदेशी निवेश की बातें सुनने में अच्छी लग सकती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर यह हमारे छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्गीय उद्यमियों के लिए विनाशकारी साबित होंगी। उनके मुताबिक, इस ‘ढीलेपन’ वाली नीति के कारण स्थानीय उद्योग प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएंगे और भारत विदेशी सामानों के लिए केवल एक खपत केंद्र (Consuming Hub) बनकर रह जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने अपनी नीतियों पर पुनर्विचार नहीं किया, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव देश की सुरक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता पर पड़ेगा।
विपक्ष के इन तीखे हमलों ने अब इस व्यापारिक समझौते को एक बड़ा राजनीतिक रंग दे दिया है। जहाँ एक तरफ वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल इसे नई तकनीकों और निर्यात के अवसरों से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं अखिलेश यादव इसे एक ऐसी भूल बता रहे हैं जिसकी कीमत देश के किसानों और सनातन धर्म को मानने वाले लोगों को चुकानी पड़ेगी। समाजवादी पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाएगी और सरकार की ‘कमजोर’ विदेश नीति और व्यापारिक फैसलों के खिलाफ विरोध जारी रखेगी। आने वाले दिनों में यह विवाद संसद से लेकर सड़क तक और भी गहराने की संभावना है, क्योंकि यह सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और धार्मिक पहचान से जुड़ गया है।