पृथ्वी के तापमान का ‘रिमोट कंट्रोल’ हैं टेक्टोनिक प्लेटें: 54 करोड़ वर्षों के जलवायु इतिहास पर नए शोध में बड़ा खुलासा
वॉशिंगटन/लंदन: पृथ्वी का इतिहास जलवायु के उतार-चढ़ाव की एक ऐसी रोमांचक कहानी है, जिसमें हमारा ग्रह कभी ‘आइसहाउस’ यानी पूरी तरह बर्फ से ढकी गेंद बन गया, तो कभी ‘ग्रीनहाउस’ की तरह भीषण गर्म रहा। अब तक वैज्ञानिक इन बदलावों के लिए मुख्य रूप से वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_{2}$) के स्तर को जिम्मेदार मानते थे। लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक क्रांतिकारी अध्ययन ने इस धारणा को नया विस्तार दिया है। ‘जर्नल कम्युनिकेशन्स, अर्थ एंड एनवायरनमेंट’ में छपे इस शोध के अनुसार, पृथ्वी की सतह के नीचे लगातार खिसकने वाली टेक्टोनिक प्लेटें ही करोड़ों वर्षों से जलवायु के इस ‘रिमोट कंट्रोल’ को संचालित कर रही हैं।
वैज्ञानिकों ने पिछले 540 मिलियन (54 करोड़) वर्षों के भूगर्भीय आंकड़ों का विश्लेषण कर यह निष्कर्ष निकाला है कि टेक्टोनिक प्लेटों की गति केवल भूकंप या ज्वालामुखी पैदा नहीं करती, बल्कि वे वायुमंडल में कार्बन के उत्सर्जन और उसके अवशोषण की प्रक्रिया को भी गहराई से नियंत्रित करती हैं। यह शोध इस बात पर नई रोशनी डालता है कि कैसे इन विशाल प्लेटों के टकराने या एक-दूसरे से दूर जाने वाले स्थानों ने पृथ्वी के दीर्घकालिक तापमान को आकार दिया है।
प्लेटों का टकराव और ज्वालामुखीय चापों की भूमिका
अध्ययन में बताया गया है कि जहां टेक्टोनिक प्लेटें आपस में मिलती हैं, वहां ज्वालामुखियों की लंबी श्रृंखलाएं बनती हैं, जिन्हें वैज्ञानिक ‘ज्वालामुखीय चाप’ (Volcanic Arcs) कहते हैं। जब एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे दबती है, तो अत्यधिक तापमान के कारण चट्टानें पिघलने लगती हैं। इस पिघलन प्रक्रिया के दौरान चट्टानों के भीतर करोड़ों वर्षों से बंद कार्बन मुक्त होकर गैस के रूप में ज्वालामुखियों के जरिए वायुमंडल में पहुंच जाता है।
अब तक माना जाता था कि यही ज्वालामुखीय चाप कार्बन उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत हैं, लेकिन इस नए शोध ने एक नई परत जोड़ी है। शोधकर्ताओं ने पाया कि कार्बन उत्सर्जन केवल वहीं नहीं होता जहां प्लेटें टकराती हैं, बल्कि उन क्षेत्रों की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण रही है जहां प्लेटें एक-दूसरे से दूर खिसकती हैं, जिन्हें ‘मध्य-महासागरीय रिज’ या ‘महाद्वीपीय दरारें’ कहा जाता है।
समुद्र की तलछट और सूक्ष्म जीवों का प्रभाव
शोध के अनुसार, पृथ्वी के ग्रीनहाउस और आइसहाउस कालखंडों का निर्धारण उत्सर्जन और अवशोषण के संतुलन से हुआ। ग्रीनहाउस दौर में जब पृथ्वी अधिक गर्म थी, तब ज्वालामुखी और दरारों से निकलने वाला कार्बन उत्सर्जन उसके अवशोषण की क्षमता से कहीं अधिक रहा। इसके विपरीत, आइसहाउस काल के दौरान महासागरों द्वारा कार्बन को अपनी तलछट (Sediments) में कैद करने की प्रक्रिया हावी हो गई। इससे वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा घटी और वैश्विक स्तर पर ठंड बढ़ी।
इस पूरे चक्र में सूक्ष्म समुद्री जीवों, जिन्हें ‘प्लैंक्टिक कैल्सिफायर्स’ कहा जाता है, की भूमिका ने वैज्ञानिकों को सबसे ज्यादा चौंकाया। ये जीव लगभग 200 मिलियन वर्ष पहले विकसित हुए और करीब 150 मिलियन वर्ष पहले पूरे समुद्र में फैल गए। ये सूक्ष्म जीव समुद्र के पानी में घुले हुए कार्बन को कैल्साइट में बदल देते हैं, जो बाद में समुद्र तल पर जमा हो जाता है।
अध्ययन बताता है कि पिछले 120 मिलियन वर्षों में ज्वालामुखीय चापों से निकलने वाला कार्बन अधिक प्रभावी इसलिए हुआ क्योंकि इन सूक्ष्म जीवों ने कार्बन चक्र की गतिशीलता बदल दी थी। इससे पहले के कालखंड में, यानी जब ये जीव व्यापक रूप से मौजूद नहीं थे, तब मध्य-महासागरीय दरारों से निकलने वाला कार्बन वायुमंडल को गर्म करने में अधिक बड़ी भूमिका निभाता था।
जलवायु परिवर्तन की समझ में नई दिशा
यह अध्ययन हमें बताता है कि कार्बन का स्रोत और उसे नियंत्रित करने वाली ताकतें उम्मीद से कहीं अधिक जटिल हैं। यह केवल एक गैस के उतार-चढ़ाव का मामला नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की आंतरिक हलचलों और जैविक विकास के बीच का एक गहरा तालमेल है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस शोध से हमें न केवल पृथ्वी के अतीत को समझने में मदद मिलेगी, बल्कि भविष्य के जलवायु मॉडलों को और अधिक सटीक बनाने में भी सहायता मिलेगी।
टेक्टोनिक प्लेटों के फैलने और सिकुड़ने की दर में मामूली बदलाव भी करोड़ों वर्षों के पैमाने पर पृथ्वी को एक रहने योग्य ग्रह बनाने या उसे रहने के अयोग्य बनाने की क्षमता रखते हैं। यह शोध यह भी रेखांकित करता है कि पृथ्वी एक सक्रिय और जीवित तंत्र है, जहां गहरी परतों में होने वाली हलचलें हमारे आकाश के रंग और तापमान को निर्धारित करती हैं।