बिहार चुनाव: विकास या जंगलराज? अमित शाह की वर्चुअल दहाड़ ने गरवाई सियासी जमीन
2 नवंबर 2025, पटना: बिहार की सियासी जंग ने नया रंग ले लिया है। खराब मौसम ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को वर्चुअल रैलियों में उतार दिया, लेकिन उनकी आवाज ने गोपालगंज से समस्तीपुर तक गूंज पैदा कर दी। क्या यह चुनाव सिर्फ विधायकों की जीत-हार का है, या बिहार का भविष्य दांव पर? एक तरफ मोदी-नीतीश की विकास जोड़ी, दूसरी ओर राजद का पुराना ‘जंगलराज’। साधु यादव के अत्याचारों से लेकर नरसंहारों तक—हर पुरानी घाव कुरेदे गए। वादों की बौछार के बीच राहुल पर तंज। क्या बिहार की जनता पुरानी यादों को भूल चुकी है, या विकास का लालच जीतेगा? आइए, इस चुनावी तूफान की परतें खोलें।
वर्चुअल दहाड़: खराब मौसम में भी शाह का संदेश
शनिवार दोपहर पटना एयरपोर्ट पर हेलीकॉप्टर रुका रहा। घने बादल, बारिश और तेज हवाओं ने अमित शाह की गोपालगंज व समस्तीपुर यात्रा रोक दी। लेकिन बीजेपी के दिग्गज ने हार न मानी—वर्चुअल माध्यम से रैलियों को संबोधित किया। गोपालगंज में लालू के गढ़ पहुंचे बिना ही शाह ने कहा, “यह चुनाव बिहार का भविष्य तय करेगा। एक तरफ जंगलराज फैलाने वाले, दूसरी ओर मोदी-नीतीश की विकास जोड़ी।” समस्तीपुर में भी यही संदेश। एनडीए के पांच दलों को पांडवों से जोड़ा, विपक्ष को महाभारत की हारने वाली सेना। गोपालगंज वालों से अपील की—2002 से राजद को नोटा दो। यह वर्चुअल संबोधन सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का नया हथियार साबित हुआ। लाखों ने स्क्रीन पर शाह को सुना, और बहस छिड़ गई।
जंगलराज की यादें: साधु यादव से नरसंहार तक हमला
गोपालगंज में शाह ने सीधा निशाना साधा—राबड़ी देवी के भाई साधु यादव पर। पूर्व विधायक के ‘अत्याचारों’ का जिक्र किया, कहा, “गोपालगंज वाले साधु के कारनामे भूलते नहीं।” 1999 में मीसा भारती की शादी के दौरान शोरूम से जबरन कारें लेने का मामला, 90 के दशक का शिल्पी गौतम हत्याकांड—सब उछाला। हाल ही प्रशांत किशोर का सम्राट चौधरी पर आरोप भी जोड़ा। फिर मध्य बिहार के नरसंहारों का नाम लिया—नक्सलियों और जमींदारों की सेनाओं के खूनी खेल। “विपक्ष सत्ता में आया तो जंगलराज लौटेगा,” चेताया। यह हमला राजद की कमजोरी पर सीधा प्रहार था। लालू के गढ़ में पुरानी कड़वाहटें ताजा कर दीं। जनता में सिहरन दौड़ी—क्या इतिहास दोहराया जाएगा? शाह ने भावनाओं को जगाया, वोट बैंक को हिलाया।
रैलियों में शाह ने एनडीए घोषणापत्र को ताकत दी। 1.41 करोड़ जीविका दीदियों को 10 हजार रुपये ट्रांसफर, अगले चरण में 2 लाख तक सहायता। किसानों को सालाना 6 हजार की जगह 9 हजार। पांच साल में बंद चीनी मिलें चालू—रोजगार का वादा। सीतामढ़ी के पुर्नौरा धाम पर 85 करोड़ का सौंदर्यीकरण, दो साल में पूरा। हाजीपुर में रामविलास पासवान को श्रद्धांजलि, कांग्रेस पर बाबासाहेब आंबेडकर का अपमान करने का आरोप। समस्तीपुर में राहुल गांधी पर तंज—”घुसपैठियों को बचाने की यात्रा निकाली। हर घुसपैठिया बाहर होगा, SIR से मतदाता सूची शुद्ध।” यह वादे विकास की चमक बिखेरते हैं, लेकिन विपक्ष को घायल भी करते। क्या ये लुभावने सपने बिहार को बदल देंगे?