गरियाबंद में तीन दिवसीय अनूठे होली पर्व की शुरुआत
गरियाबंद की कांडसर गौ शाला में शनिवार सुबह ब्रम्हमुहूर्त में प्रकृति प्रेम और पर्यावरण को संरक्षित करने का संदेश देने वाली परम्परागत ढंग से अनूठी होली के उत्सव की हवन से शुरुआत हुई। जिसकी पूर्णाहुति पूर्णिमा के दिन होगी। इस आयोजन में क्षेत्र में मौजूद बाबा उदय नाथ के अनुयाई, जिनकी संख्या सात हजार है, वे सभी और उसके अलावा प्रदेश के विभिन्न स्थानों से आए हिंदू संगठन, संघ और गौसेवक भी शामिल हुए। इस बार बनाए गए पलास वृक्ष, गुबरैल कीट और चमगादड़ को अतिथि बनाया गया है। पिछली बार वर्ष 2023 के होली पर्व के अवसर पर आम वृक्ष, गौरैया चिड़िया व बड़ी चींटी को विशिष्ट अतिथि बनाया गया था।
तेईस मार्च से शुरू यज्ञ तीन दिन तक चलेगा। प्रकृति की महत्ता को बढ़ावा देने और पर्यावरण को संरक्षित करने कांडसर के गौ शाला में पिछले 18 वर्षों से अनूठे तरीके से होली मनाई जा रही है। होली में इस बार गौ माता के साथ गुबरेल कीट, चमगादड़ और पलास के पेड़ को अतिथि बनाया गया है। स्थानीय निवासी तुलाराम धीवर बताते हैं कि गोबर कंडा व औषधीय गुण वाले लकड़ियों को घी के साथ आहुति दी जाती है। होलिका दहन के मुहूर्त पर पूर्णाहुति होती है और फिर अगली सुबह तिलक लगाकर होली खेली जाती है।
इसके दो दिन पहले गौ माताओं का पूरे क्षेत्र में भ्रमण कराया गया और आज उनकी वापसी हुई। शनिवार सुबह ब्रम्हमुहूर्त में होने वाले यज्ञ के शुभारंभ के पूर्व गौमाता समेत इस बार बनाए गए अतिथि पलास वृक्ष, गुबरैल कीट और चमगादड़ के स्वागत के लिए लोग आश्रम से तीन किमी दूर पर काडसर बस्ती में जुटे। बहनों और माताओं ने कलश यात्रा निकाली। 25 मार्च को ब्रम्ह मुहूर्त में हवन की पूर्णाहुति दी जाएगी। फिर इसी आहुति की राख से तिलक लगाकर शांति पूर्ण ढंग से गौ शाला परिसर में होली खेली जाएगी। तीन दिन तक विशेष भंडारे का आयोजन होगा।
बाबा उदय नाथ ने बताया कि किसी न किसी बहाने हमें प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। होली हमारी सनातन परंपरा है, लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप लोग बदलने लगे है। हुडदंग, मास मदिरा सेवन के चलते निर्मित दूषित वातावरण से अपने अनुयाई को दूर रखने के साथ ही प्रकृति को सहजने वाले जीव जंतु के महत्ता को समझाने व उनके प्रति आस्था बनाएं रखने इसकी शुरुआत किया और आज हजारों लोग इससे जुड़ भी रहे हैं। वातावरण में मौजूद समस्त मित्र जीव जंतु पेड़ पौधे को बारी बारी से प्रति वर्ष के आयोजन में अतिथि बनाया जाता है। गौ माता सदैव मुख्य अतिथि की भूमिका में होती हैं।
स्थानीय निवासियों के अनुसार बाबा उदयनाथ ने अपने 150 गौ सेवकों के साथ इसकी शुरुआत 2005 से किया था। तब आयोजन का स्वरूप सीमित था। बीते 18 वर्ष में आयोजन की ख्याति दूर दूर तक फैली, प्रदेश के कोने कोने से भारी संख्या में यहां लोग जुटते हैं। धर्म व प्रकृति प्रेम रखने वाले कई संगठन इस आयोजन को सफल बनाने पहुचंते हैं। इस आयोजन में अतिथि बन कर आ रहे गौ माता के राह में जमीन पर लेट कर पग बाधा बनने का भी रिवाज है।




